एन. रघुरामन का कॉलम: खेल-खेल में बहुत कुछ सिखाया जा सकता है Politics & News

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एक कमरा चमकती स्क्रीनों से भरा है। लगातार कोड स्क्रॉल हो रहे हैं, जैसा मैट्रिक्स फिल्म में होता है। पूरा कमरा शीतल नीली रोशनी में नहाया है। टीम कांच का भारी दरवाजा धकेलती है और वह सरसराहट करता हुआ खुल जाता है। ब्रीफिंग के लिए तैयार एक सीनियर एजेंट नए रिक्रूट्स को उनके ‘ऑफिशियल इन्वेस्टिगेटर वेस्ट्स’ देता है। एजेंट कमांड देता है, ‘टीम, ध्यान से सुनो। शहर के सेंट्रल नेटवर्क में बड़ा डेटा ब्रीच हुआ है। जब हम बात कर रहे हैं तो वहां डार्क वेब पर निजी पहचानें नीलाम हो रही हैं। हमारे पास सोर्स पता लगाने, मालवेयर खत्म करने और वॉल्ट लॉक करने के लिए महज 20 मिनट हैं।’ और ‘ऑपरेशन डिजिटल शील्ड’ शुरू होता है। जूनियर इन्वेस्टिगेटर्स अपने वर्क-स्टेशनों पर दौड़ते हैं। बाहर से ये महज बटनों को दबाने जैसा लगता है, लेकिन असल में यह टचस्क्रीन के जरिए कोड का अर्थ समझने के लिए एक फिजिकल और मेंटल पजल है। उन्हें ‘करप्टेड’ फाइल्स को स्कैन करना ही है। वे अजीब से संकेत और ईमेल्स में छिपे अटैचमेंट्स जैसी विसंगतियां ढूंढते हैं। अचानक स्क्रीन पर एक ‘अर्जेंट मैसेज’ पॉप-अप होता है- ‘आपने फ्री गोल्डन टिकट जीता है। यहां क्लिक करें।’ सभी चिल्लाते हैं- ‘इसे न छूना, यह एक जाल है।’ उन्हें ऐसे ही प्रशिक्षित किया गया है। यह एक फिशिंग ट्रैप था। इसीलिए वे उस संदिग्ध फाइल को डिजिटल क्वारंटाइन जोन में डालते हैं। जैसे ही फिजिकल खोज शुरू होती है, अचानक अलार्म लाल हो जाते हैं। ‘घुसपैठिया लोकल है।’ जूनियर इन्वेस्टिगेटर्स को हरकत में आना होगा। वे हाथ में पकड़ने वाले स्कैनर्स का इस्तेमाल करके कमरे में छिपे ‘फिजिकल नोड्स’ ढूंढते हैं। यह स्कैवेंजर हंट जैसा है, जिसमें पैनल के पीछे छिपे ‘इन्फेक्टेड सर्वर’ को खोजना है। इसके मिलते ही वे ‘कास्परस्की सिक्योरिटी-की’ के जरिए क्लीन-अप प्रक्रिया शुरू करते हैं। अब मेन कंसोल पर लौटते हैं, जहां एक बड़ा प्रोग्रेस बार ‘मालवेयर अटैक’ आइकन से संघर्षरत है। जूनियर्स साथ मिलकर एक तेज मल्टी-प्लेयर जैसा काम कर रहे हैं। एक जूनियर आने वाले वायरस पैकेट्स को टैप करके ‘ब्लॉक’ करता है। दूसरा लॉजिक पजल्स हल करके एन्क्रिप्टेड पासवर्ड फिर-से बनाता है। टीम लीडर समन्वय करता है- ‘फायरवॉल पर ध्यान दो। एन्क्रिप्शन लेयर में हमें और पावर चाहिए।’ आखिरी क्लिक के साथ स्क्रीन हरी हो जाती है। उनका सिस्टम अब सुरक्षित है। इन्वेस्टिगेटर्स हाथ उठाते हैं, यानी ‘मिशन पूरा’ हुआ। चोरी हुआ डेटा वापस मिल गया और दूरदराज में बैठा ‘हैकर’ भी ट्रैक हो गया। इन्वेस्टिगेटर्स खुशी से चिल्लाते हैं। इसलिए नहीं कि उनकी सर्विस के लिए उन्हें ‘किडजो’ (किडजानिया करेंसी) मिले हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे बच्चे हैं और एक सिमुलेशन गेम खेल रहे हैं। वे किसी असल साइट पर नहीं, मुंबई के एक मॉल में हैं। जाते समय सीनियर एजेंट उन्हें असल दुनिया के लिए आखिरी टिप देता है- ‘याद रखना इन्वेस्टिगेटर्स, मजबूत पासवर्ड आपका सबसे बड़ा बचाव है। और जिस लिंक को आपने नहीं मांगा, उस पर कभी भरोसा मत करो।’ 20 मिनट के इस मिशन के अंत तक ये ‘जूनियर साइबर हीरोज’ समझ जाते हैं कि हैकर्स भले तेज हों, लेकिन सही टूल्स के साथ एक बेहतर प्रशिक्षित इन्वेस्टिगेटर उनसे भी तेज होता है। यह मुम्बई में पिछले माह खुले एक मॉल में स्थित ‘किडजानिया’ का हिस्सा है, जहां बच्चे वयस्कों की तरह डिजिटल इन्वेस्टिगेटर की भूमिका निभाते हैं। इस गेम में बच्चे तीन सबक सीखते हैं। 1. फिशिंग स्कैम्स : फर्जी फ्री-ट्रिप ऑफर या गेमिंग करेंसी गिवअवे जैसे ट्रैप्स पहचानना। निजी जानकारियां चुराने वाले संदिग्ध लिंक व ईमेल पहचानना। 2. आइडेंटिटी थेफ्ट : गेम सिखाता है कि डिजिटल पहचान (जैसे घर का पता या फोटो) कितनी आसानी से चोरी हो सकती है और घुसपैठिया कैसे निजी डेटा तक पहुंच सकता है। 3. साइबरबुलीइंग : हानिकारक ऑनलाइन व्यवहार को पहचानना और सीखना कि प्राइवेट चैट या सोशल मीडिया पर उत्पीड़न से कैसे निपटा जाए। फंडा यह है कि जब हम बच्चों को खेल-खेल में जीवन के महत्वपूर्ण सबक देते हैं तो उनके लिए असली दुनिया को समझना अधिक आसान हो जाता है।

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एन. रघुरामन का कॉलम: खेल-खेल में बहुत कुछ सिखाया जा सकता है