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- Shekhar Gupta Column: Use Opportunity To Strengthen India | Global Tensions
2 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
दुनिया कई युद्धों में उलझी हुई है, गठबंधनों के स्वरूप बदल और बिखर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जोर-जबर्दस्ती बढ़ रही है। इन वजहों का तकाजा है कि हम अपने भीतर झांक कर देखें। क्योंकि महाशक्तियों और आक्रामक पड़ोसियों की हरकतों के चलते हमें एक ऐसा मौका उपलब्ध हुआ है, जिसका हमें इंतजार रहा होगा। यह कुछ बड़ी कमजोरियों को दूर करने, दुश्मन में खौफ पैदा करने की ताकत बनाने और अगले संकट के लिए खुद को तैयार करने का समय उपलब्ध करा रहा है।
इसका बेशक यह मतलब भी है कि भारत खुद को अनुशासित रखे कि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें। हम तो यह विचार करें कि हमारे लिए सबसे जरूरी क्या है। पहले यह समझें कि जब हम यह कह रहे हैं कि दुनिया उलझी हुई है, तो इसका क्या मतलब है।
पाकिस्तान पीस-ब्रोकर की भूमिका निभाकर खुश है। इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती मगर यह संभावना नहीं दिखती कि वह हमारे खिलाफ जल्द ही कोई दुस्साहस करेगा। उसके पिछले रिकॉर्ड को देखें तो यही कहा जा सकता है कि वह इस नए मौके को मुकम्मल बनाने और इसका पूरा आर्थिक और सैन्य लाभ उठाने की कोशिश करेगा।
ट्रम्प ने ईरान में जो दुस्साहस शुरू किया था, उसे अपनी जीत के कुछ विश्वसनीय दावे के साथ खत्म करने का उन्हें कोई रास्ता खोजना है। इजराइल भी युद्ध के बाद की अपनी रणनीतिक चालों पर पुनर्विचार कर रहा है। अरब की खाड़ी के देश अब विचार करने लग गए हैं कि कौन दुश्मन है और कौन दोस्त है। हमारा नया दोस्त यूरोप और सबसे पुराना साझेदार रूस भी अपने निकट के पड़ोस को नई नजर से देख रहा है। यह हमारे दोस्तों को हमें लेकर उलझन में पड़ने से रोक रहा है।
दूसरी आक्रामक ताकत चीन खामोशी से देख रहा है कि ज्यादा बड़ी ताकत ने किस तरह खुद को फंसा लिया है और वह ‘उबरने’ के लिए चीन से किस तरह संरक्षण की आस लगाए है। अब चीन नेपोलियन के सिद्धांत पर अमल करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को गलती करने से रोकने की कोशिश तो नहीं ही करेगा, बल्कि युद्ध से त्रस्त पश्चिम एशिया, खासकर ईरान के हालात का फायदा उठाने के लिए खुद को तैयार करेगा।
अमन कायम होता है तो उसके बाद पुनर्निर्माण के लिए हजारों अरब डॉलर के वारे-न्यारे होंगे। उस क्षेत्र में ठेकेदारों की फौज उतर आएगी और निर्माण की क्रेनों की विश्वव्यापी कमी पड़ जाएगी। चीन इनमें से सारे तो नहीं मगर अधिकतर पर अपना कब्जा चाहेगा। जाहिर है, वह बड़ी उम्मीदें लगाए बैठा है। इसलिए भारत के साथ कोई नई गड़बड़ी अब उसकी प्राथमिकता में नहीं होगी।
करीबी दोस्त, संभावित दोस्त और प्रतिद्वंद्वी जब इस तरह अपने में ही उलझे हुए हैं, तब भारत फिर से ऐसे दौर से गुजर रहा है जब वह शांति के साथ अपनी ताकत में इजाफा कर सकता है। आजादी के बाद से प्रायः हर पांच साल पर हम सुरक्षा को लेकर बड़े खतरे या युद्ध जैसी स्थिति का सामना करते रहे हैं।
शुरुआत जम्मू-कश्मीर को लेकर दो लड़ाइयों से हुई; इसके बाद गोवा का मामला आया जहां पुर्तगाल ‘नाटो’ के अनुच्छेद 5 की आड़ में जमा हुआ था, उसे 1961 में मुक्त कराया गया; 1962, 1965, 1971 में चीन और पाकिस्तान से जंगें लड़नी पड़ीं, 1967 में नाथुला में भी अच्छी-खासी झड़प का सामना करना पड़ा।
1971 में पाकिस्तान की शिकस्त और उसके विभाजन से थोड़ी राहत तो मिली लेकिन 1986 के बाद से रणनीतिक खतरे लगातार उभरते रहे। चीन के साथ वांगडुंग/सुमदोरोंग चू में टक्कर और 1986-87 में ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’, कश्मीर को लेकर 1990 में भी पाकिस्तान की ओर से युद्ध की धमकी और पहली बार परमाणु युद्ध की चेतावनी।
इसके बाद आप गिनती जारी रख सकते हैं : करगिल युद्ध (1999), संसद पर हमला और ऑपरेशन पराक्रम (2001), 26/11 के हमले (2008) और इसके बाद उड़ी (2016), पुलवामा (2019), पहलगाम (2025)। इन सबके बीच चीन भी तनाव में इजाफा करता रहा, दो बार यूपीए के दौर में 2009 में दलाई लामा के अरुणाचल दौरे को लेकर और 2013-14 में देप्सांग और चूमर में झड़पों के कारण। इसके बाद पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध पैदा हुआ जिसे शांत तो कर दिया गया है मगर सुलझाया नहीं गया है। मामूली गणित बता देगा कि हर पांच साल पर संकट का सामना करना पड़ा।
ऊपर जिन भटकावों का जिक्र किया गया है उन्होंने पांच-पांच साल के अमन वाले दौरों की शुरुआत भी की। मैं पांच साल वाले अंतराल पर ही इसलिए जोर दे रहा हूं क्योंकि आसिम मुनीर के कार्यकाल को विस्तार दिए जाने का सिलसिला 2030 में खत्म होगा। तब वे सिर्फ 62 साल के होंगे, जिस उम्र में भारत के सेनाध्यक्ष अपने नियमित कार्यकाल के बाद प्रायः रिटायर हो जाते हैं।
लेकिन 2030 तक मुनीर पांच नहीं तो चार सेनाध्यक्षों के कार्यकाल के बराबर तो सेवा दे ही चुके होंगे। उनके मुल्क की जो हालत है और उसकी अर्थव्यवस्था की जो दशा है, उसके मद्देनजर हम कल्पना कर सकते हैं कि तब तक वे बुरी तरह अलोकप्रिय हो चुके होंगे।
अगर कोई पाकिस्तानी तानाशाह अपने यहां असंतोष से निबटने के लिए भारत के साथ युद्ध के हालात पैदा करने के सिवा दूसरा कोई तरीका जानता है, तो वह अभी तक सामने नहीं आया है। चीन देख रहा है कि ट्रम्प अमेरिका को कमजोर कर रहे हैं और अपने गठबंधनों को तोड़ रहे हैं, ऐसे में उसे भी समय की जरूरत होगी। इसलिए हमने अपना आशावाद पांच साल तक ही सीमित रखा है।
सेना का आधुनिकीकरण, ऊर्जा के मामले में निर्भरता, स्पेस इंटेलिजेंस व्यवस्था में खामी, खाद और अहम खनिज- इन चुनौतियों को पांच साल में दुरुस्त करना मुमकिन नहीं है, लेकिन आप खाइयों को पाट कर अगले संकट का सामना करने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकते हैं।
सेना के मामले में कुछ परिवर्तन तो आया है लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद भी बातें ज्यादा हुई हैं, काम कम हुआ है। परिवर्तन की गति बढ़नी चाहिए। ऊर्जा का मामला ज्यादा जटिल चुनौती है। नई खोज से नतीजे हासिल होने में समय लगेगा। 1991 में हमने आर्थिक सुधारों को लागू किया और एक उभरती शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाई। ऐसे में आर्थिक वृद्धि ही हमारा सबसे कारगर रणनीतिक प्रतिरोध है।
अभी हमारे दोस्त और प्रतिद्वंद्वी दोनों ही उलझे हुए हैं… भारत के साथ कोई नई गड़बड़ी चीन और पाकिस्तान की प्राथमिकता में अभी नहीं होगी। इस तरह हम अपने प्रतिद्वंद्वियों की ओर से फिलहाल तो निश्चिंत हो सकते हैं। जब दोस्त और प्रतिद्वंद्वी सभी उलझे हुए हों, तब भारत चुपचाप अपनी ताकत में इजाफा कर सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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