आरती जेरथ का कॉलम: क्या हम महिला सशक्तीकरण के सही मायने समझ पाए हैं? Politics & News

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संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की प्रबल हिमायती होने के तौर पर मेरे लिए वो एक बहुत बड़ा दिन था, जब सितम्बर 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पारित किया गया। हालांकि 33% आरक्षण उम्मीद से कम था, लेकिन अहम यही था कि एक रास्ता खुला तो सही, बढ़ोतरी की गुंजाइश आगे बन सकती है। लेकिन इसमें एक शर्त थी। संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू तभी होगा, जब नई जनगणना हो जाएगी और आबादी के ताजा आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने वाली परिसीमन प्रक्रिया भी निपट जाएगी। इस शर्त ने आरक्षण लागू होने की समय-सीमा को लेकर चिंताएं पैदा की। जनगणना पहले ही दो साल काफी समय टल चुकी थी और उस वक्त यह भी स्पष्ट नहीं था कि यह कब शुरू होगी। परिसीमन की शर्त तो और भी चिंताजनक थी। क्योंकि यह प्रक्रिया पहले भी दो बार स्थगित हो चुकी थी, ताकि वो राज्य नुकसान में न रहें, जिन्होंने परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता से जनसंख्या वृद्धि को स्थिर किया था। चूंकि कोई सरकार उत्तर-दक्षिण में टकराव और संवैधानिक संकट का जोखिम नहीं लेना चाहती थी, इसलिए 1976 में ही संसद में सीटों की संख्या फ्रीज कर दी गई। अब सरकार ने अचानक से 16 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुला लिया है, ताकि महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया तेज की जा सके और इसे 2029 के लोकसभा चुनावों से जोड़ा जा सके। विशेष सत्र का समय और एजेंडा, दोनों ही चिंताजनक हैं। चिंता का पहला विषय है- पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के बीच ही विशेष सत्र बुलाना। दोनों अहम राज्यों में 29 अप्रैल तक मतदान सम्पन्न होगा। कई लोगों को संदेह है कि कहीं यह महिला वोटरों को लुभाने की कवायद न हो, क्योंकि यह विशेष सत्र चुनाव बाद भी बुलाया जा सकता था। पश्चिम बंगाल चुनाव के संदर्भ में यह बात और प्रासंगिक हो जाती है, जहां भाजपा ‘करो या मरो’ की लड़ाई लड़ रही है। महिला सशक्तीकरण एक गम्भीर मुद्दा है और इसके फायदे अब तक लक्षित वर्ग भी ठीक-से समझ नहीं पाया है। चुनावी अभियान के चरम पर इसे राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए। इससे अविश्वास गहरा होगा। महिला आरक्षण विधेयक पहले ही पारित हो चुका है। विशेष सत्र में महज इसे लागू करने की समय-सीमा में संशोधन होगा। आरक्षण तो 2029 में ही प्रभावी हो सकेगा। उसके तीन साल पहले ही घोषणा करने की जल्दबाजी महिला आरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता से ज्यादा वोटों की राजनीति को दर्शाती है। दूसरी बड़ी चिंता महिला आरक्षण बिल में संशोधन को परिसीमन के साथ जोड़ने को लेकर है। किसी भी लोकतांत्रिक मानक के अनुसार परिसीमन ताजा जनगणना से संबंधित होना चाहिए। यह प्रक्रिया अभी 1 अप्रैल से ही शुरू हुई है और जल्दबाजी में राजनीतिक दलों को भेजी गई ब्रीफिंग के अनुसार इसे पूरा होने में 2029 तक का या और अधिक समय भी लग सकता है। सरकार का तर्क है कि महिला आरक्षण और परिसीमन, दोनों के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं किया जा सकता है। इसीलिए सरकार ने दोनों को मौजूदा जनगणना प्रक्रिया से डी-लिंक करके मनमाने ढंग से संसद की सीटों को 542 से 813 करने का फैसला कर लिया, जो नई संसद में लोकसभा भवन की लगभग पूरी बैठक-क्षमता के बराबर है। इसके पीछे यह तर्क दिया गया है कि दक्षिणी राज्यों के सांसदों का अनुपात नहीं बदलेगा, तो उन्हें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उत्तरी राज्यों में प्रभुत्व ​की स्थिति वाले दल को महज संख्या का फायदा पहुंचाने के लिए अगर लोकतंत्र में महिलाओं की सहभागिता को जुमला बनाया जाता है तो यह कोई बहुत शोभनीय बात नहीं होगी। महिला सशक्तीकरण एक गम्भीर मुद्दा है और इसके फायदे अब तक लक्षित वर्ग भी ठीक-से समझ नहीं पाया है। महिला आरक्षण विधेयक पहले ही पारित हो चुका है। विशेष सत्र में महज इसे लागू करने की समय-सीमा में संशोधन होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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आरती जेरथ का कॉलम: क्या हम महिला सशक्तीकरण के सही मायने समझ पाए हैं?