नीरज कौशल का कॉलम: सबरीमाला मंदिर के मामले में एक तीसरा पक्ष भी मौजूद है Politics & News

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नौ न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ सबरीमाला मामले में सुनवाई कर रही है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक असंवैधानिक है और यह समानता तथा धर्मपालन की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। अब संविधान पीठ के समक्ष उद्देश्य यह है कि अन्य धर्मों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं की भी समीक्षा की जाए और इन मुद्दों पर संवैधानिक सिद्धांत स्थापित किए जाएं। अभी तक तो धार्मिक संगठनों- हिंदू और मुस्लिम दोनों ने ही यह रुख अपनाया है कि न्यायालयों के पास मूल धार्मिक प्रथाओं को निर्धारित करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि ये आस्था से जुड़े विषय हैं। लेकिन सबरीमाला मामले में प्रश्न यह उठता है कि किसकी धार्मिक प्रथाएं? माला अरयन आदिवासी समुदाय केरल में सबरीमाला मंदिर का पारम्परिक संरक्षक हुआ करता था। 19वीं सदी के प्रारम्भ में मंदिर का नियंत्रण अपने हाथ में लेने से पहले ब्राह्मण उन अनुष्ठानों का पालन नहीं करते थे, जिन्हें वे आज संरक्षित करना चाहते हैं। माला अरयन आदिवासी मासिक धर्म वाली आयु की महिलाओं के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते थे। वे उस शुद्धिकरण अनुष्ठान में भी विश्वास नहीं रखते थे, जिसे वर्तमान में मंदिर के तंत्रियों द्वारा किया जाता है। सबरीमाला मामला अब एक ऐसे परिदृश्य के रूप में उभरता है, जहां एक समूह दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है, जबकि यह दूसरा समूह इस मंदिर का पारम्परिक संरक्षक रहा है। दोनों समूहों के अनुष्ठान भी अलग-अलग हैं : एक लैंगिक रूप से तटस्थ है, जबकि दूसरा महिलाओं- विशेषकर मासिक धर्म वाली आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को मान्य नहीं करता है। माला अरयन आदिवासी समुदाय का दावा है कि सबरीमाला मंदिर के देवता अय्यप्पन उनके पूर्वजों के आराध्य हैं। उनका कहना है कि लगभग 1800 ई. के आसपास उन्हें उनकी भूमि से बेदखल कर दिया गया। इसके बावजूद, उनके सदस्य मंदिर में लौटकर अपने अनुष्ठानों का पालन करते रहे हैं और आज भी सबरीमाला को अपने पूर्वजों का देवता मानते हैं। 2013 से वे केरल उच्च न्यायालय और राज्य सरकार के समक्ष कई बार याचिकाएं दायर कर चुके हैं, ताकि मंदिर के एक वार्षिक अनुष्ठान के तहत मकरविलक्कु प्रज्वलित करने के अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त कर सकें। लेकिन न तो सरकार और न ही न्यायालयों ने अब तक कोई स्पष्ट निर्णय दिया है। ऐतिहासिक साक्ष्य संकेत देते हैं कि माला अरयन समुदाय के दावे उचित हैं। 19वीं सदी के मध्य में दक्षिण भारत की यात्रा करने वाले सैम्युअल मतीर ने अपनी पुस्तक नेटिव लाइफ इन त्रावणकोर (1883) में इस समुदाय और सबरीमाला मंदिर के बीच संबंध का उल्लेख किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि 19वीं सदी में भी मंदिर लंबे समय तक लैंगिक रूप से तटस्थ रहा था और 1950 के दशक तक भी इसमें महिलाओं को प्रवेश की अनुमति थी। मंदिर के अनुष्ठानों में पुरुषवादी प्रवृत्तियां 20वीं सदी के मध्य के आसपास बढ़ने लगीं और 1965 में 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 2018 में सर्वोच्च अदालत के निर्णय के बावजूद, 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की बहुत कम महिलाओं ने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया है। यानी अदालत का निर्णय भी व्यावहारिक स्तर पर वस्तुस्थिति बदलने में सक्षम नहीं हो पाया है। केरल में सत्तारूढ़ एलडीएफ सरकार ने सबरीमाला मामले पर अपने रुख में यू-टर्न ले लिया है। उसे इस निर्णय पर पछतावा हो सकता है, क्योंकि इससे महिलाओं, उदारवादी पुरुषों और आदिवासी मतदाताओं- तीनों के अलग-थलग पड़ने का जोखिम है। माला अरयन आदिवासी समुदाय का दावा है कि सबरीमाला मंदिर के देवता अय्यप्पन उनके पूर्वजों के आराध्य हैं। उनका कहना है कि लगभग 1800 ईस्वी के आसपास उन्हें उनकी भूमि से बेदखल कर दिया गया था।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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नीरज कौशल का कॉलम: सबरीमाला मंदिर के मामले में एक तीसरा पक्ष भी मौजूद है