[ad_1]
1960 के दशक में तमिलनाडु में नानाजी के गांव में बिताई गर्मी की छुट्टियां असल में समर क्लासेस ही होती थीं। आमतौर पर हमें सुबह 4 से 4.30 बजे के बीच जगा कर सभी भाई-बहनों को कोई काम दिया जाता था। जैसे, सबसे बड़ा बच्चा कुएं से पानी निकालकर बैकयार्ड में रखे ‘हुंडा’ नाम के बर्तनों को भरेगा, जबकि छोटे बच्चे बड़ों की मदद करेंगे। बच्चों के लिए चाय-कॉफी नहीं होती थी। हमेशा रागी का दलिया मिलता था। इससे पेट इतना भरा महसूस होता कि 10 बजे लंच होने तक कुछ और खाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। 4.30 से 10 बजे के बीच बच्चों को कुएं के ठंडे पानी से नहाना होता था। फिर मंदिर जाकर आसपास की सफाई, हाथ-पैर धोकर नाना के साथ श्लोक बोलना, पुजारी से मिला गरम-गरम प्रसाद खाना और घर लौटते वक्त बाजार से नानी के लिए खाना पकाने का कुछ सामान लाना होता था। घर पहुंचकर इडली-डोसा के लिए ‘गन पाउडर’ जैसे मसाले कूटने में नानी की मदद करते। अपने कपड़े तह करके सूटकेस में जमाते, ताकि ताजा धुले कपड़ों के लिए रस्सी पर जगह बन सके। ये कुछ रोजमर्रा के काम थे, जो लंच से पहले पूरे करने होते थे। इसके बाद हमें आध्यात्मिक किताबें पढ़नी होती थीं, जहां हमारे संस्कृत उच्चारण की जांच होती थी। अर्थ पूछे जाते थे और क्विज तक भी होते थे। नानाजी पूछते थे कि ‘वेद दुनिया के सबसे पुराने धार्मिक ग्रंथ हैं, इन्हें किसने संकलित किया?’ हम जवाब नहीं दे पाते तो वे विकल्प देते थे, जैसे ‘विश्वामित्र, व्यास, वाल्मीकि और वशिष्ठ।’ हम फिर भी चुप रहते तो वे न सिर्फ सही जवाब (व्यास) बताते, बल्कि पूरी कहानी भी सुनाते थे- ताकि हम कभी भूलें नहीं। वे बताते कि पहले कैसे वेद ही एकमात्र ज्ञान के स्रोत थे और कैसे वेदव्यास ने उन्हें चार भागों में बांटा। नानीजी भी थोड़ी देर के लिए रसोई बंद करने के बाद हमारे साथ बैठतीं और फिर खेल शुरू होते थे। दोपहर में बड़े लोग कॉफी पीते, जबकि बच्चे बैकयार्ड से नारियल लाकर उसके पानी और फिर बचे नारियल का लुत्फ उठाते थे। शाम को फिर मंदिर जाना, आरती करना और शाम 7 बजे से पहले घर लौट कर भोजन करना होता था। फिर नानाजी के साथ कहानी सुनने का समय होता था। सामान्यत: 8.30 बजे तक गांव में शांति हो जाती और सभी गहरी नींद में सो जाते थे। हमारा घर किसी गुरुकुल से कम नहीं था, जहां बच्चे जल्दी उठते, पढ़ाई करते, घर के काम में हाथ बंटाते थे- फिर भी सोने तक उनमें उत्साह बना रहता होगा। अब 2026 पर आते हैं। अगर आप टीनेजर्स के पैरेंट्स हैं तो सोने का वक्त घर में जंग का मैदान बन सकता है। आधुनिक पैरेंट्स ‘स्लीप कॉप’, या कहें ‘बैडटाइम कॉप’ बन जाते हैं- क्योंकि हर पैरेंट्स को चिंता रहती है कि बच्चे ठीक से सो तो रहे हैं या अगले दिन स्कूल/कॉलेज के लिए थक तो नहीं जाएंगे। हम जानते हैं कि हम उन्हें विफलता की दिशा में धकेल रहे हैं, फिर भी हम उन्हें बिस्तर पर जाने को कहते हैं, जबकि उनका शरीर नींद के लिए तैयार ही नहीं होता। सरलता से कहें तो हम बच्चों से उम्मीद करते हैं कि वे नेचरल बॉडी क्लॉक को नजरअंदाज कर दें। तो पैरेंट्स क्या कर सकते हैं? बच्चों को आराम का नियमित समय तय करने के लिए प्रोत्साहित करें। प्री-स्लीप एक्टिविटीज करें, जिनमें स्क्रीन शामिल न हो। इस बारे में व्यावहारिक उम्मीदें रखें कि उनका शरीर सोने के लिए कब तैयार होता है। ऐसे एप्स भी हैं, जो युवाओं को नींद और बॉडी क्लॉक के लिए पर्सनलाइज्ड-प्लान बनाने में गाइड करते हैं। धीरे-धीरे ऐसी गतिविधियां बढ़ाएं, जो सोने और जागने का समय स्थिर करने में उनकी मदद करें और नींद की अवधि बढ़ाएं। फंडा यह है कि कम से कम इस गर्मी की छुट्टी अपने घर में गुरुकुल जैसी जीवनशैली अपनाएं, ताकि आपको शेष पूरे साल ‘स्लीप कॉप’ न बनना पड़े।
[ad_2]
एन. रघुरामन का कॉलम: गुरुकुलों में बच्चों को 4 बजे उठा देते हैं, जबकि हम घर में ‘स्लीप कॉप’ बने रहते हैं

