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बंगाल में चुनाव हैं और होर्मुज में महाभारत। ममता बनर्जी मान नहीं रही हैं। भाजपा पूरा जोर लगा रही है। उधर होर्मुज (जलडमरूमध्य) में न ईरान हार मानने को तैयार है, न अमेरिका। इजराइल और ईरान के झगड़े में अमेरिका को बहुत कुछ मिल नहीं पा रहा है। वैसे ही जैसे बंगाल में ममता और भाजपा के बीच कांग्रेस फांके मार रही है। जिस बंगाल में कभी कांग्रेस की तूती बोलती थी, आज वहां उसका कोई नामलेवा नहीं है। ऊपर से चुनाव के वक्त कुछ नेता हमेशा ऐसा कुछ कर बैठते हैं, जिसके कारण पार्टी का पलीता निकल जाता है।
अभी हाल ही में कांग्रेस के एक शीर्ष नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आतंकवादी कह डाला। हालांकि बाद में सफाई भी दे दी। पलट भी गए। लेकिन ऐसे बयान देना ही क्यों कि बाद में पछताना पड़े? सफाई देनी पड़े? खैर, कांग्रेस ही क्यों, ऐसे बयानवीर बाकी पार्टियों में भी हैं। भाजपा में तो भरमार है। दरअसल, पार्टियां जब तक ऐसे बयानों पर खुद अंकुश नहीं लगाएंगी, यह सब होता रहेगा। बयानों में तो ट्रम्प महाराज का भी कोई जवाब नहीं। एक दिन कुछ कहते हैं। दूसरे दिन पलट जाते हैं। फिर और कुछ कह देते हैं। कहते हैं ईरान में पूरी नस्ल को ही मिटा देंगे। क्यों भाई? ऐसा क्या हो गया है? बातचीत आप करना नहीं चाहते। केवल बातचीत का ढोंग करते रहते हैं! बातचीत की जगह भी चुनी तो पाकिस्तान। जो खुद ही सबसे बड़ा पलटू राम है। राम मिलाई जोड़ी, एक काणा एक कोढ़ी!
अब आते हैं वापस बंगाल चुनाव पर। यहां यकीनन भाजपा अप्रत्याशित रूप से मजबूत होती जा रही है। जीतेगी या नहीं, यह तो अभी से नहीं कहा जा सकता लेकिन पहले से ज्यादा सीटें मिलने की गुंजाइश पूरी तरह बनी हुई है। ममता की दिक्कत यह है कि जिस वामपंथ की दादागीरी को मुद्दा बनाकर वे सत्ता में आई थीं, वही सब उनकी तृणमूल कांग्रेस ने भी किया। उसके कार्यकर्ताओं की दादागीरी, गुंडागर्दी जगजाहिर है। लोगों को घरों से निकालकर बेटे के माथे पर हाथ रखकर कसम खिलाना कि वोट तृणमूल को ही देंगे, जो वाकई कभी तृणमूल को वोट नहीं देते उनमें से ज्यादातर को पोलिंग बूथ तक पहुंचने ही नहीं देना, गली में खड़ी गाड़ी का किराया वसूलना, यह सब तृणमूल कार्यकर्ताओं के लिए सामान्य बात है। मुस्लिम बहुल इलाकों में तो तृणमूल का सिक्का चलता है। वहां बूथ तक पहुंचना आम आदमी के बस की बात नहीं है। कोई पहुंच भी जाए तो तृणमूल वाले उसे अच्छी तरह समझ लेते हैं या समझा देते हैं। वैसे बंगाल का मूल स्वभाव सत्ता विरोधी है। ज्यादातर लोग यहां विपक्ष में, विरोध में बैठे नजर आते हैं। लेकिन चुनाव और सरकारों के मामले में यह स्वभाव कहां चला जाता है, पता नहीं। वर्षों यहां वामपंथियों ने एकछत्र राज किया। अभी 2011 से ममता निष्कंटक राज कर रही हैं। कोई विरोध नजर नहीं आया। पहले कांग्रेस थी और कोई नहीं था। कांग्रेस का झंडा भी कभी ममता ने ही उठा रखा था। फिर उन्होंने खुद की पार्टी बना ली। केंद्र में भाजपा सरकार का समर्थन भी किया, लेकिन अब वे भाजपा की धुर विरोधी बन चुकी हैं। खैर, राजनीति में, खासकर क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय पार्टी का विरोध करना ही पड़ता है। करते रहे भी हैं। बात सिर्फ निष्पक्ष चुनाव की है। अगर बंगाल में निष्पक्ष चुनाव हो जाएं तो चुनाव परिणाम कुछ और ही हो सकते हैं। चुनाव आयोग और केंद्रीय सत्ता ठान ले तो यह संभव हो सकता है लेकिन कोई क्यों यह नहीं कर पा रहा है, पता नहीं। ममता को एक राज्य में बनाए रखने के लिए भी इस तरह की राजनीति हो सकती है, क्योंकि वही हैं जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को गांठती नही हैं। भाव ही नहीं देतीं। जब भी एकजुट विपक्ष की बात चलती है, ममता ही हैं, जो सारा ताना-बाना बिगाड़ देती हैं। अकेले बंगाल में राज करती हैं, फिर भी उनके पास लोकसभा सीटों की कमी नहीं होती और राज्य में तो सत्ता है ही। केंद्रीय मशीनरी के लोगों, अफसरों को तो कोलकाता से वे ऐसे खदेड़ती हैं, जैसे कोई जानवर उनके चौके में घुस आया हो! ममता को एक राज्य में बनाए रखने के लिए भी इस तरह की राजनीति हो सकती है। वही हैं जो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को गांठती नही हैं। भाव ही नहीं देतीं। जब भी एकजुट विपक्ष की बात चलती है, ताना-बाना बिगाड़ देती हैं।
खैर, इस बार बंगाल में टक्कर कांटे की है।
अभी 29 अप्रैल को मतदान का आखिरी चरण है। 4 मई को चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि कौन कांटा है और कौन फूल!
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नवनीत गुर्जर का कॉलम: बंगाल में चुनाव और होर्मुज में महाभारत!


