शेखर गुप्ता का कॉलम: ईरान में अमेरिका के तमाम कथित लक्ष्य अधूरे रह गए हैं Politics & News

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2 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

इजराइल और अमेरिका ईरान के खिलाफ जो जंग लड़ रहे हैं, उसकी शुरुआत उन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से की थी। लेकिन आज इस जंग को जीतने का दावा करने वाले- खासकर अमेरिका- जिस तरह गतिरोध वाली हालत में फंसे हैं, वह भी उतना ही नाटकीय है। ‘नाटकीयता’ का तत्व ईरान के शीर्ष आध्यात्मिक, सैन्य, वैचारिक एवं बौद्धिक नेतृत्व की हत्या में निहित था और गतिरोध का तत्व हार मानने से ईरान के जिद्दी इनकार में निहित है। इन सबसे कुछ सवाल उभरते हैं।

हत्याएं क्या आपके दुश्मन के सफाए की गारंटी हो सकती हैं? क्या इससे बेहतर कोई समझदारी वाला तरीका हो सकता है? क्या इजराइल-अमेरिका गठबंधन अपनी खास चाल चलना भूल गया? क्या ऐसे किसी और युद्ध का इतिहास हमें कुछ और सिखाता है? भारत के जो अनुभव रहे हैं उनसे क्या कुछ सीख मिलती है? इनमें से पहले सवाल को छोड़ बाकी के जवाब हां हैं।

इजराइल अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लंबे समय से लड़ रहा है। वह इसलिए निराश होगा कि ईरान में सरकार नहीं बदली। लेकिन ईरान कमजोर हुआ है, उसके परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा है और उसका मिसाइल सिस्टम काफी हद तक खत्म हो गया है- ये सब कम कीमत पर मिली बड़ी सफलताएं हैं। लेबनान में भी हिज्बुल्ला का कमजोर होना उसके लिए फायदा ही है।

अगर इजराइल अपने आसपास की स्थिति देखते हुए अपने लिए थोड़ा समय चाहता था, तो यह अच्छी रणनीति थी। लेकिन अमेरिका का क्या? वह ईरान में सत्ता बदलना चाहता था, उसके परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहता था और खाड़ी देशों (जीसीसी) को सुरक्षा का भरोसा देना चाहता था। इन तीनों में वह सफल नहीं हो पाया।

ईरान में वही सरकार बनी रही, बल्कि अब ज्यादा कट्टरपंथी लोग सत्ता में आ गए हैं। जहां तक यूरेनियम का सवाल है, ईरान उसे वापस करने या अपने परमाणु कार्यक्रम को निगरानी में लाने को तैयार नहीं है। उसके मिसाइल लॉन्चर जरूर कम हुए हैं, लेकिन उन्हें रोकने वाले सिस्टम भी कम हो गए हैं। जब-जब ट्रम्प या उनके ‘सेक्रेटरी ऑफ वार’ पीट हेगसेथ कहते हैं कि ईरान की नौसेना और वायुसेना खत्म हो गई है, तब हंसी आती है। असल में, ईरान के पास छोटी नौसेना ही थी और ठीक से वायुसेना थी ही नहीं।

और अरब देशों का क्या हुआ? छोटे लेकिन हिम्मती यूएई को छोड़ दें तो बाकी अरब देश डरे हुए और युद्ध से बचते हुए दिखे। लंबे समय से वे पश्चिमी देशों पर निर्भर रहे हैं। उन्होंने इजराइल को अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने दिया और फिलिस्तीन के मुद्दे पर सिर्फ औपचारिक बातें करते रहे। कुछ देश दोनों का साथ देते रहे हैं।

जैसे कतर, जिसने एक तरफ अमेरिका को अपना सबसे बड़ा सैन्य अड्डा बनाने दिया है और दूसरी तरफ ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’, हमास और ईरान से भी संबंध बनाए रखे हैं। सऊदी अरब को अमेरिकी सेना पर पूरा भरोसा था। अब ये सभी देश सदमे में हैं। ‘जीसीसी’ देशों को आधुनिक इतिहास में पहली बार हमला झेलना पड़ा, और उन्हें पूरी सुरक्षा नहीं मिली।

ध्यान से देखें तो पश्चिम एशिया की यह लड़ाई सिर्फ इजराइल और ईरान के बीच नहीं है। असल में यह ईरान और खाड़ी के अरब देशों के बीच प्रभाव की भी लड़ाई है, जिसमें इजराइल एक तरह से बीच का किरदार है। बड़े और गरीब मुस्लिम देशों- खासकर ‘ग्लोबल साउथ’ में- ईरान का इस्लाम अमीर खाड़ी देशों से ज्यादा सच्चा माना जाता है। यह सिर्फ शियाओं तक सीमित नहीं है। बहुत से लोग ईरान को ऐसा देश मानते हैं, जो फिलिस्तीन के लिए अमेरिका और इजराइल से लड़ रहा है, चाहे उसे खुद नुकसान क्यों न हो। यह सोच खाड़ी देशों के बारे में उनकी राय से बिल्कुल अलग है।

‘जीसीसी’ देशों को ईरान की सैन्य ताकत से ही नहीं, बल्कि इस डर से भी खतरा है कि वह उनके लोगों को भड़का सकता है। और अब यह डर और बढ़ सकता है क्योंकि कई लोग इसे इराक, अफगानिस्तान और सीरिया के बाद पश्चिम के खिलाफ पहली बड़ी प्रतिक्रिया मान रहे हैं।

खाड़ी देशों को डर है कि कहीं उनके अपने लोग विद्रोह न कर दें और नया ‘अरब स्प्रिंग’ न शुरू हो जाए। इसी डर के कारण सऊदी अरब ने पाकिस्तान से रक्षा समझौता फिर से सक्रिय किया और अपनी सेना को उसमें शामिल किया। लेकिन पाकिस्तान शायद ही ईरान या इराक के खिलाफ लड़ता दिखेगा। वह वहां पैसे के लिए मौजूद रहेगा।

क्या ईरान के नेतृत्व की हत्या सही रणनीति थी? अगर नेता जिंदा रहते, तो बातचीत में अमेरिका को फायदा मिलता। युद्ध में आखिरकार बातचीत ही करनी पड़ती है। इसलिए शीर्ष नेताओं को आमतौर पर निशाना नहीं बनाया जाता।

निष्कर्ष यह है कि अमेरिका के लक्ष्य पूरे नहीं हुए और उसके पास अब युद्ध दोबारा शुरू करने की ताकत और इच्छा दोनों कम हैं। हेगसेथ कहते हैं कि ईरान युद्धविराम चाहता है, लेकिन लगता है कि ट्रम्प ही समझौते के लिए बेताब हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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