एन. रघुरामन का कॉलम: बिगिनर्स के लिए नौकरी का पहला कदम ही अब आसान नहीं रहा Politics & News

[ad_1]


‘क्या आप रिज्यूमे को लेकर मेरी मदद कर सकते हैं?’ आपके बारे में तो मुझे पता नहीं, लेकिन यह बात मैंने उन कई युवाओं से सुनी है, जो अकसर तंग जॉब मार्केट में रिजेक्शन या साइलेंस की हतोत्साहित करने वाली स्थिति का सामना करते हैं। ऐसी दुनिया में जहां युवा सोशल मीडिया पर एक ‘स्माइली’ मिलने से खुश हो जाते हैं, वहीं हल्का-सा रिजेक्शन झेलना भी उनके लिए कठिन होता जा रहा है। खासकर, जब उन्हें लगता है कि वे सब ठीक कर रहे हैं, लेकिन लगातार प्रयास के बावजूद रोजगार नहीं मिल पा रहा। भीषण गर्मी के बीच जब फाइनल एग्जाम खत्म हो चुके या होने वाले हैं और नौकरी पाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है तो जॉब नहीं मिलने की निराशा के चलते कई युवा पैरेंट्स, काउंसलर, प्रोफेसर और मेंटर्स से मदद लेने को मजबूर हो गए हैं। कई परिवारों में जब यह संघर्ष दिख रहा है तो हम शुतुरमुर्ग की भांति रेत में सिर गाड़ कर नहीं रह सकते। हाल ही में कॉलेज से पास-आउट या फाइनल ईयर में पढ़ रहे युवाओं के लिए नौकरी ढूंढना अब पहले जैसा नहीं रहा। राह स्पष्ट नहीं है। योग्यता का पैमाना ऊंचा हो गया है और पहली सीढ़ी ही कठिन हो गई है। इन सभी समस्याओं के बावजूद हमें सराहना करनी चाहिए कि यह पीढ़ी अब भी नौकरी तलाश रही है, न कि यह कह रही है कि ‘आप मेरे लिए नौकरी ढूंढ दीजिए, मैं कल से शुरू कर दूंगा।’ कोविड-19 के बाद न सिर्फ कामकाज का तरीका बदला है, बल्कि नियोक्ताओं की उम्मीदें भी कई गुना बढ़ी हैं। यदि आपके पास भी इस गर्मी में नौकरी तलाश रहा कोई युवा है तो आप शायद पैरेंट के तौर पर उसे प्रयास करते रहने के लिए प्रोत्साहित कर रहे होंगे और रिजेक्शन के दौरान सहानुभूति भी रख रहे होंगे। लेकिन यह महज मोटिवेशन का मामला नहीं है। इसलिए विशेषज्ञ कुछ और सुझाव भी देते हैं कि आप नौकरी ढूंढने में कैसे उनकी मदद कर सकते हैं। ये सुझाव रिज्यूमे सुधारने, उन्हें अपने नेटवर्क से जोड़ने या यह बताने से अलग हैं कि कहां भर्ती चल रही है। यह उससे आगे की बात है। कुछ सुझाव यहां पेश हैं। 1. जॉब सर्च में शामिल रहें, लेकिन युवाओं की आजादी न छीनें।
2. उन्हें बाजार की हकीकत दिखाएं कि नौकरियां कम और प्रतिस्पर्धा अधिक है। इससे खुद को दोष देने जैसी भावना कम होगी और बाजार को लेकर वास्तविक उम्मीदें बढ़ेंगी।
3. अपने अनुभव के आधार पर बताते रहें कि उन्हें कब और कैसे फॉलो-अप कॉल करनी चाहिए।
4. एक युवा आवेदक, खासकर जब आपका बच्चा जरूरत से ज्यादा सोचता है तो उसके लिए आवेदन का जवाब नहीं मिलना कठिन परिस्थिति हो सकती है। पैरेंट्स के तौर पर इसे समझना जरूरी है, ताकि वे रिजेक्शन को ओवर-इंटरप्रेट न करें।
5. उनकी छोटी-छोटी सफलताओं को मानें। यदि इंटरव्यू में एचआर ने बच्चे से ज्यादा देर बात की तो सराहना करें। उनसे कहें कि उस बातचीत को याद करें और उनकी यह समझने में मदद करें कि क्यों एचआर ने बातचीत में रुचि दिखाई। इससे युवाओं को इंटरव्यू में विफलता के कारण जानने में मदद मिलेगी। समय निकालकर समझें कि इंटरव्यू में क्या अच्छा हुआ और अगली बार वे कहां सुधार कर सकते हैं। याद रखिए, पहली नौकरी मिलने के बाद राह और कठिन होगी। जब वे काम से लौटें तो रोज उनके साथ बैठकर बात करें कि दिन कैसा रहा और उन्होंने क्या सीखा। जैसे एक शिक्षक विद्यार्थी को अपने विषय से जोड़ने की कोशिश करता है, वैसे ही पैरेंट्स को भी बच्चे को यह गर्व कराना चाहिए कि अब वह रोजगारशुदा है। फंडा यह है कि खासकर बच्चा जब नौकरी तलाश रहा है या प्रोबेशन के शुरुआती दिनों में है, तो पैरेंट्स यदि जॉब सक्सेस से ज्यादा एक्सपोजर पर जोर देंगे तो इससे युवा को नौकरी पाने में मदद मिलेगी और वह बेहतर कर्मचारी बन सकेगा।

[ad_2]
एन. रघुरामन का कॉलम: बिगिनर्स के लिए नौकरी का पहला कदम ही अब आसान नहीं रहा