[ad_1]
वे दोनों एक हल्की नीली रोशनी वाले कमरे में थे। याद कीजिए, कुछ लोग बार में बारमैन के सामने ऊंचे स्टूल पर बैठते हैं और जब उन्हें पता चलता है कि वे समान ड्रिंक ऑर्डर कर रहे हैं तो मुस्कराते हैं। फिर हर ड्रिंक के साथ गिलास चीयर्स करते हुए दोस्त बन जाते हैं। जब भी मैनेजर ने कहा ‘वाह’, ये दोनों हर 15 मिनट में चीयर्स कर रहे थे। यह तारीफ इसलिए नहीं कि उन्होंने ड्रिंक बहुत जल्दी खत्म कर दी, बल्कि इसलिए थी कि उन्होंने अपने-अपने ट्रेडमिल पर वांछित लक्ष्य हासिल कर लिया था। वैसे, जिस गिलास से वो चीयर्स कर रहे थे, उसमें गुनगुना पानी था। और वो बार में नहीं, एक जिम में थे। ‘वर्कआउट-हैंगआउट’ में आपका स्वागत है। यह जेन-जी के बीच नया कॉन्सेप्ट है, जो आजकल जिम में हैंग-आउट कर रहे हैं और घर जाने से पहले ‘कटिंग चाय’ पीते हैं। पारंपरिक तौर पर युवा ऑफिस के दिनभर के घटनाक्रम या जिंदगी की बातें करने के लिए सहकर्मियों से किसी स्थानीय बार में मिलते थे। किसी गतिविधि को एक साथ करना दोस्ती का बहुत मजबूत जरिया बनता है, क्योंकि इससे बार-बार मिलने और नजदीकी बढ़ाने के अवसर मिलते हैं। रिसर्च बताती है कि किसी गतिविधि में साझेदारी से दोस्ती के मौके बढ़ते हैं। सांस्कृतिक विभाजनों से परे यह चलन पूरी दुनिया में देखा जा रहा है। अब उनकी पीढ़ी के कई लोग बार में नहीं, बल्कि जिम और वेलनेस सेंटर में ज्यादा समय बिताना पसंद कर रहे हैं। 20 से 30 की उम्र के लोगों में यह बदलाव मानसिक और शारीरिक सेहत के प्रति चिंता को लेकर है। खाली समय में वर्कआउट पर पैसा खर्च करके उन्हें संतोष मिलता है और इससे अगले दिन काम पर जाते समय हैंगओवर भी नहीं होता। संक्षेप में, जेन-जी अब ज्यादा हेल्दी हॉबीज अपना रहे हैं। सहकर्मियों के साथ साइन लैंग्वेज क्लास में जाना ऐसी ही एक हॉबी है, जिसकी वजह से वे ऑफिस में खुलकर बात कर सकते हैं। उन्होंने महसूस किया है कि जिम या साइन लैंग्वेज क्लास से मिलने वाली ऊर्जा कॉकटेल गैदरिंग्स से बिल्कुल अलग होती है। विदेशों में 20-30 और 30-40 की उम्र के ज्यादातर लोग वेलनेस और फिटनेस पर खर्च को वैकल्पिक नहीं, जरूरी मानते हैं। भले ही पैसे की तंगी हो, लेकिन खासकर विकसित देशों में तो वे इस खर्च को अपने बजट से बिल्कुल आखिरी में हटाते हैं। भले ही यूके पब्लिक हेल्थ चैरिटी अल्कोहल कंसर्न (अब अल्कोहल चेंज यूके) ने ‘ड्राय जनवरी’ अभियान औपचारिक तौर पर 2013 में शुरू किया, लेकिन इस पीढ़ी के ज्यादातर सदस्य हालिया वर्षों में इससे जुड़े हैं। उन्होंने समझ लिया है कि वेलनेस को प्राथमिकता देने से उनकी सेहत बेहतर होती है। लेकिन इसका अतिरिक्त फायदा भी है- समान सोच वाले दोस्त मिलना। जैसे बचपन में साथ खेलना और अन्य गतिविधियां सामाजिक मेलजोल का प्रमुख जरिया होती हैं, वहीं वयस्क होने पर ये साझा पेशेवर माहौल, जीवनशैली की समानता और विशेष हॉबी-बेस्ड कम्युनिटी में बदल जाती हैं- जैसे किसी क्लब के सदस्य। मैनेजमेंट में इसे ‘डिल्ट्स न्यूरोलॉजिकल लेवल्स’ कहा जाता है। यह रॉबर्ट डिल्ट्स का एक फ्रैमवर्क है, जिसमें वह मानव अनुभव को छह स्तरों में बांटते हैं- माहौल, व्यवहार, क्षमताएं, धारणाएं/मूल्य, पहचान और उद्देश्य। यह कहता है कि पहचान जैसे ऊपरी स्तर, व्यवहार जैसे निचले स्तरों पर प्रभाव डालते हैं। ऐसे में यह किसी व्यक्ति के गहरे उद्देश्यों के साथ जुड़कर व्यक्तिगत विकास, लीडरशिप और समस्याओं को हल करने का ताकतवर टूल बन जाता है। फंडा यह है कि गतिविधि-आधारित दोस्ती एक उत्कृष्ट प्रेरक होती है, क्योंकि ये सह-भागीदारी और व्यवहार बनाने की जैविक आवश्यकताओं को पूरा करती है।
[ad_2]
एन. रघुरामन का कॉलम: ‘वर्कआउट-हैंगआउट’ दोस्त बनाने का नया तरीका है

