रीटा कोठारी का कॉलम: हम हमेशा नई चीजें नहीं खोजते, जाने-पहचाने में भी सुकून है… Politics & News

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2 घंटे पहले

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रीटा कोठारी अशोका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर और भाषाविद्

कैसी है पिक्चर?- मैंने पूछा। ‘इट्स अ वन टाइम वॉच’- मुझे जवाब मिला। छोड़ो पैसे बचे, टाइम बचा, मैंने अपने आपसे कहा। बात आई-गई हो गई। कई फिल्में आती हैं और जाती हैं और इसी तरह के वाक्य सुनने को मिलते है। हालांकि मैं उस नस्ल की पैदाइश हूं, जब ‘शोले’ 20 बार और ‘दीवार’ 30 बार देखी जाती।

आप कहेंगे ऐसी फिल्में बनती कहां हैं आजकल, और आपका कहना बिलकुल जायज है। पर क्या ये सिर्फ अच्छी और खराब फिल्मों की बात है, या फिर फिल्मों से ही हमारा रिश्ता बदल गया है? ये भी पूछा जा सकता है कि हमारा समय से रिश्ता बदल गया है और फिल्मों को 10-20 बार न देखना उस बदलते रिश्ते का एक उदहारण है। मेरी जिंदगी सिर्फ फिल्में देख-देख कर नहीं, सिर्फ गाने सुनकर और गुनगुनाकर नहीं, पर फिल्मों द्वारा जिंदगी को देखने से बनी है।

टीएस एलियट कहते हैं- ‘आई हैव मेज़र्ड-आउट माय लाइफ विद कॉफी स्पून्स।’ यानी मैंने अपने जीवन को कॉफी की चम्मचों से नापा है। पर मैं यही बात अमिताभ बच्चन की फिल्मों के लिए कहूंगी। सत्तर और अस्सी के दशक के अमिताभ। उसके बाद फिर मेरी फिल्मों से दूरी हो गई! कोई पूछता है जब यह या वह वाकया हुआ, तब तुम कितने साल की थीं? मैं सोचने लगती हूं, जब ‘दीवार’ देखी थी तो शायद मैं इतने साल की थी।

कहने का मतलब है ​कि हमारे काल पर फिल्मों की छाप थी और हम फिल्म-काल में रहते थे। इस तीव्र और गहरे रिश्ते के कई फायदे थे, जिनमें से एक यह था कि हम फिजूल में वॉट्सएप्प और सोशल मीडिया पर वक्त बर्बाद नहीं करते थे। हमारे जेहन में कहानियां, गाने और डायलॉग भरे हुए थे और जिस तरह लोग कबीर या रहीम के दोहे दोहराते हैं, हम फिल्मी बातें दोहराते थे। हमारे लिए वे किसी दोहों से कम नहीं थीं। उन्हीं से हम सीखते कि दुःख सब पर आते हैं, कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना वगैरह-वगैरह।

जिस समाज में गरीबी, असमानताएं और हिंसा से भरे वाकये हों, उसे फिल्मों द्वारा एक सुकून मिलता। शायद इसलिए हम बार-बार उसकी तरफ जाते। कहानियां हमेशा नई नहीं थी और किस मोड़ पर आकर उनका अंत होगा, वह भी हमें पता रहता था। यह मानने की जरूरत नहीं है कि हम हमेशा नई चीज ढूंढते हैं। अगर ऐसा होता तो लोग बार-बार रामलीला देखने क्यों जाते? जाना-पहचाना देखने में भी एक सुकून होता है।

बहरहाल, बोलचाल की जबान में फिल्म के डायलाॅग आ जाते तो उसे झूठ नहीं माना जाता। शायद वह अलंकार ही समझा जाता! मुझे याद है मां गुस्सा होकर पिताजी से कहतीं- ‘मैं चुप नहीं रहूंगी। जैसे मीना कुमारी कहती मुझे भी वही कहना है!’ यह सुनकर कोई हंस नहीं देता, परंतु उस गुस्से को ज्यादा दमदार समझता। अब आप सोचिए कि एक बार फिल्म देखने पर इतनी गहरी बात कैसे कही जा सकती है!

फिल्मों के शीर्षक, गीतों के बोल, प्यार और रुस्वाई की अभिव्यक्तियां- यानी एक सम्पूर्ण शब्दावली ने हमारी भाषा को बनाया, सजाया और संवारा। इसी से हमने समझा कि दर्द मीठा भी हो सकता है, कि जब गुस्ताखी करनी हो तो दिल के बहाने हम कर सकते हैं। अपने साहसी प्रयोजनों को ‘दिल बेकरार है’ कहकर जता सकते हैं। जरा सोचिए, ऐसे कितने ही गाने हैं जिनमें दिल को माध्यम बना दिया गया है- ‘मेरे दिल मैं आज क्या है, तू कहे तो मैं बता दूं’ वगैरह।

कभी-कभी आंखें भी काम कर जातीं, क्योंकि जो होठों पर इनकार होता, वह आंखों में इकरार बन जाता। जिस समाज में प्राइवेसी नहीं और घर-परिवार की निगाहें आप पर हों, वहां आप कैसे ठीक से किसी पर निगाह डालेंगे? बात आंखों पर आकर रुक जाती। समझदार के लिए इशारा काफी था।

तो चलिए, मैं वहीं लौटती हूं, जहां से शुरुआत की थी। फिल्मों को बार-बार देखना, उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेना- यह एक ऐसी नजदीकी को दर्शाता है, एक ऐसा बहाना, जिसकी हमें उस दौर में जरूरत थी, जिसमें हम जी रहे थे। हमारा शरीर, हमारी अपनी पहचान का एहसास, समय को लेकर हमारी सोच- ये सब कुछ बदल गया है। शायद मेरे लिए इन दो अलग-अलग दौरों की तुलना करना बेकार ही है। गुजरा हुआ जमाना, आता नहीं दोबारा, हाफिज खुदा तुम्हारा…

फिल्मों की कहानियां हमेशा नई नहीं थीं और किस मोड़ पर आकर उनका अंत होगा, वह भी हमें पता था। यह मानने की जरूरत नहीं है कि हम हमेशा नई चीज ढूंढते हैं। अगर ऐसा होता तो लोग बार-बार रामलीला देखने क्यों जाते? (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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