नीरजा चौधरी का कॉलम: अचानक बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी का क्या कारण है? Politics & News

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भाजपा ने हाल में तीन ऐसी पहलकदमी की हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है। पहला कदम है महिला आरक्षण विधेयक, जिसका उद्देश्य मजबूत वोट बैंक के तौर पर उभर रहीं महिलाओं के बीच अपनी पैठ बनाना है। दूसरा कदम है परिसीमन के मुद्दे को शांत करना, जिस पर असंतोष के चलते दक्षिणी राज्य भाजपा से दूर हो रहे हैं। तीसरा मुद्दा है जाति-गणना का, जिस पर बेमन से ही सही, लेकिन भाजपा राजी हो गई। यह निर्णय विपक्ष के दबाव में लिया गया। लेकिन जाति-गणना अब जनगणना के दूसरे चरण में होगी, जो सम्भवत: 2029 के बाद होगा। 1 अप्रैल से शुरू हुए पहले चरण में सिर्फ परिवारों की सूची बनेगी। यानी व्यावहारिक तौर पर इसे फिलहाल टाल दिया गया है। सरकार ने महिला आरक्षण संबंधी ‘नारी शक्ति वंदन कानून’ पर विचार के लिए आज से संसद का विशेष सत्र बुलाया है। अतीत में सभी दल ऊपर से महिलाओं के प्रति सहानुभूति जताते थे, लेकिन आरक्षण का विरोध करते थे। लालू, मुलायम और उमा भारती महिला कोटे में ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोटे की मांग करते थे। लेकिन 2023 में इस विधेयक को दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित किया गया। राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिली। लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका, क्योंकि इसे 2026 की जनगणना पर आधारित परिसीमन से जोड़ दिया गया था। अब अचानक सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 की जाए और इसकी एक-तिहाई यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं। यह भी प्रस्तावित किया गया है कि 816 सीटें तय करने के लिए जून में ही परिसीमन आयोग का गठन कर इसे 2011 की जनगणना के आंकड़ों से जोड़ दिया जाए। 2026-27 की जनगणना का इंतजार न किया जाए, ताकि ज्यादा विलंब न हो। 2023 में जहां भाजपा सरकार जरूरत पड़ने पर विधेयक लागू करने के लिए कई साल इंतजार को तैयार थी, अब वह मई, यहां तक कि विधानसभा चुनाव पूरे होने तक भी ठहरने को राजी नहीं दिख रही है। इतनी ही अहम प्रधानमंत्री की केरल में की गई वह घोषणा है, जिसमें उन्होंने कहा कि परिसीमन में दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटें कम नहीं होंगी। उन्हें सिर्फ इसलिए दंडित नहीं किया जाएगा कि उन्होंने उत्तरी राज्यों की तुलना में जनसंख्या नियंत्रण में अधिक सफलता पाई है और इसी कारण वहां विकास भी अधिक हुआ। उनके ये शब्द उत्तर-दक्षिण के बीच बढ़ते तनाव और दक्षिण में भाजपा के प्रति बन रही नकारात्मक भावना, दोनों को कम कर सकते हैं। भाजपा को अपनी दक्षिण की सहयोगी टीडीपी की भावनाओं का भी ध्यान रखना होगा, जिसने संविधान के प्रावधान के अनुसार जनसंख्या आधारित परिसीमन पर आ​पत्ति जताई थी। इसे अब संविधान संशोधन से ही बदलना पड़ेगा, क्योंकि सरकार ने सीटों की संख्या 816 करने के अलावा राज्यों के बीच सीटों का अनुपात बरकरार रखने का प्रस्ताव भी दिया है। जाति-गणना खुद भाजपा के लिए जटिल मुद्दा है। इसमें ओबीसी की संख्या 1931 की जनगणना में रही 52% से अधिक आने पर अधिक प्रतिनिधित्व की मांग उठ सकती है। विपक्ष ओबीसी कार्ड खेल सकता है। गृह मंत्री अमित शाह स्वयं हाल ही में यह कहकर जाति-गणना की जटिलताओं को बता चुके हैं कि भारत में लगभग 81 लाख जातियां हैं। लेकिन इसके आंकड़े 2029 से पहले आने की संभावना नहीं है, तो भाजपा के पास अभी थोड़ा समय है। 2027 सियासी तौर पर एक निर्णायक साल होगा। इसमें यूपी, गुजरात, पंजाब और गोवा में चुनाव होंगे। इनके नतीजे आम चुनाव का रुझान भी बता सकते हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मध्यावधि चुनाव का विकल्प भी सामने है। शायद यही वजहें हैं कि सत्ताधारी दल जल्दबाजी में कदम उठा रहा है, ताकि अतिरिक्त समर्थन जुटा सके। अगले साल यूपी, गुजरात, पंजाब, गोवा में चुनाव हैं। इनके नतीजे 2029 के आम चुनाव का रुझान भी बता सकते हैं। कुछ लोग मध्यावधि चुनाव का विकल्प भी बता रहे हैं। शायद जल्दबाजी की यही वजहें हैं, ताकि अतिरिक्त समर्थन जुटा सकें।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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