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- Harshita Arora: From Saharanpur Dropout To Y Combinator General Partner
13 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
हर्षिता अरोड़ा की कहानी ‘एमएडी’ (MAD) फिलॉसफी का एक बेहतरीन उदाहरण है। उनमें हाई-वैल्यू फाउंडर की ‘मनीड’ क्षमता, तेजी से बढ़ने की ‘एबिलिटी’ और हासिल करने की अटूट ‘डिजायर’ है। यूपी के एक छोटे शहर से सिलिकॉन वैली के वाय-कॉम्बिनेटर (वाय-सी) में उच्च स्तर तक पहुंचने का हर्षिता का सफर महज टेक्निकल टैलेंट की कहानी नहीं, बल्कि इस बात का ब्लूप्रिंट है कि गैर-परंपरागत रास्ते भी ऐतिहासिक मुकाम तक पहुंचा सकते हैं।
2016 में जब हर्षिता सिर्फ 14 साल थीं तो उन्होंने ऐसा निर्णय किया, जो ज्यादातर पारंपरिक भारतीय परिवारों को हैरान कर देगा। उन्होंने 8वीं में स्कूल छोड़ दिया। सहारनपुर में उनके सहपाठी उन्हें ‘डिस्ट्रैक्टेड’ समझते थे, लेकिन हकीकत में वो ज्यादा ‘फोकस्ड’ थीं। 13 की उम्र तक उन्हें कोडिंग का गहरा शौक लग चुका था। वे समझ चुकी थीं कि स्कूल का तय सिलेबस उनकी जिज्ञासा शांत नहीं कर पाएगा। इसलिए उन्होंने होमस्कूलिंग चुनी। यह पढ़ाई से भागना नहीं, बल्कि उसे तेजी से बढ़ाने की रणनीति थी।
16 की उम्र आते-आते हर्षिता बेंगलुरु में ‘सेल्सफोर्स’ में इंटर्नशिप कर रही थीं और तकनीक की पेशेवर दुनिया को करीब से समझ रही थीं। फिर उन्होंने एमआईटी में चार हफ्तों का आंत्रप्रेन्योरशिप प्रोग्राम किया। यहीं से उनके मन में अपने पहले आईओएस एप्लीकेशन का विचार आया।
सहारनपुर लौटकर स्टॉकब्रोकर पिता और होममेकर मां की इस बेटी ने बेडरूम को क्रिप्टोकरेंसी और प्रोग्रामिंग की लैब बना लिया। उन्होंने क्रिप्टोकरेंसी पोर्टफोलियो ट्रैकिंग एप लॉन्च किया, जो न सिर्फ काम करता था, बल्कि छा गया। 2016 में यह अमेरिका और कनाडा में दूसरा सबसे पॉपुलर फाइनेंस एप बन गया। इसके लिए उन्हें यंग अचीवर्स श्रेणी का भारत का शीर्ष ‘बाल शक्ति पुरस्कार’ मिला। और यहीं से स्टार्टअप जगत में उनकी एंट्री हो गई।
लेकिन हर्षिता की पाने की ललक इसी एक एप पर पूरी नहीं हुई। तकनीकी जगत के केंद्र तक पहुंचने की तलाश में हर्षिता ओ-1 वीजा पर सैन फ्रांसिस्को चली गईं। यह वीजा असाधारण क्षमता वाले लोगों को मिलता है। 2019 में वे फिनटेक स्टार्टअप ए-टु-बी की को-फाउंडर बनीं, जिसने मॉडर्न फ्लीट कार्ड्स और इंस्टेंट पेआउट्स के जरिए ट्रकिंग इंडस्ट्री में क्रांति ला दी।
हर्षिता का ए-टु-बी स्टार्टअप, वाई-सी की मदद के साथ सफलता की बेहतरीन मिसाल बन गया। दुनिया के सबसे प्रभावशाली स्टार्टअप एक्सेलेरेटर वाय-सी ने हर्षिता में एक फाउंडर की सहज वृत्ति को पहचाना। वाईसी की मेंटरशिप और सीड फंडिंग से ए-टु-बी तेजी से बढ़ा। आज यह 30 हजार से ज्यादा फ्लीट्स को सेवाएं देता है और जनरल कैटलिस्ट और ब्लूमबर्ग बीटा जैसे बड़े निवेशकों से इसने 150 मिलियन डॉलर की राशि जुटाई है। कंपनी की वैल्यूएशन आज करीब 700 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई है।
इस कहानी का सबसे अहम मोड़ वाई-सी में ही आता है। वाई-कॉम्बिनेटर लंबे समय से अपारंपरिक रास्ते अपनाने वाले ‘बिल्डर्स’ को सपोर्ट करता रहा है। उन्होंने हर्षिता में ऐसी टीन-एजर देखी, जो बाजारों का अध्ययन ही नहीं करती, उन्हें बनाती भी है। विजिटिंग पार्टनर रहने के बाद 25 साल की हर्षिता को हाल ही में वाईसी में जनरल पार्टनर बनाया गया है।
यह पद पाने वाली वे सबसे कम उम्र की व्यक्ति हैं। वाई-सी के प्रेसिडेंट और सीईओ गैरी टैन ने कहा कि हर्षिता का नजरिया अनोखा है- एक ऐसे व्यक्ति की ‘फाउंडर्स इंस्टिंक्ट’, जो किशोरावस्था से ही कंपनियां बना रहा है। उनकी यह प्रगति सिलिकॉन वैली में आए बदलाव को बताती है, जिसमें ‘एमएडी’- यानी मनीड, एबिलिटी और डिजायर का महत्व पारंपरिक डिग्री से कहीं ज्यादा है।
सहारनपुर ड्रॉपआउट से सिलिकॉन वैली का ताकतवर नाम बनने तक का हर्षिता का सफर साबित करता है कि कई बार ‘डिस्ट्रैक्टेड’ होना भी क्रांतिकारी बनने का पहला कदम होता है। अब वे वाई-सी इकोसिस्टम की महज लाभार्थी नहीं, बल्कि उसे दिशा देने वालों में से एक हैं। उन्होंने साबित किया है कि जिनमें ‘एमएडी’ स्पिरिट होती है, उनके लिए उम्र और परंपरा कभी बाधा नहीं बनती।
फंडा यह है कि यदि आप धनवान बनना चाहते हें, जिसमें हर हाल में आगे बढ़ने और असंभव को भी हासिल करने की क्षमता हो तो आपको हर उस काम के लिए जुनूनी (mad) बनना पड़ेगा, जो जीवन में करना चाहते हैं।
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एन. रघुरामन का कॉलम: ‘MAD’ बनने के लिए ‘mad’ बनना पड़ेगा



