अगर TMC की कम आए सीट तो क्या नतीजों के बाद कांग्रेस देगी समर्थन? पार्टी का जवाब सुनकर चौंक जाएं Politics & News

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, कांग्रेस ने अपना चुनाव प्रचार तेज कर दिया है. बंगाल कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और बहरामपुर से उम्मीदवार अधीर रंजन चौधरी भी पूरी तरह चुनावी मैदान में सक्रिय नजर आ रहे हैं. वे लगातार लोगों के बीच जा रहे हैं और उनसे सीधा संपर्क बना रहे हैं. उन्होंने NDTV कि दिए एक इंटरव्यू में चुनाव से जुड़े कई अहम मुद्दों पर खुलकर बात की. अधीर रंजन ने बताया कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और रोज सुबह चलकर चुनाव प्रचार करते हैं.

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी से जब पूछा गया कि अगर चुनाव के बाद कांग्रेस की कुछ सीटें आती हैं और ममता बनर्जी को उनकी जरूरत पड़ती है तो क्या वे समर्थन देंगे. इस पर उन्होंने कहा कि यह एक काल्पनिक सवाल है और इसका जवाब अभी नहीं दिया जा सकता. इस तरह से उन्होंने अपनी पार्टी की भी मंशा जाहिर कर दी.

पश्चिम बंगाल में कब है चुनाव?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 इस बार दो चरणों में होने वाले हैं. पहला चरण 23 अप्रैल 2026 को होगा और दूसरा चरण 29 अप्रैल 2026 को आयोजित किया जाएगा. इसके बाद 4 मई 2026 को मतगणना होगी और उसी दिन नतीजे सामने आएंगे. राज्य की सभी 294 सीटों पर मतदान होगा और सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 148 सीटें जीतनी जरूरी हैं.

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से काफी दिलचस्प रही है.  इस समय राज्य की राजनीति मुख्य रूप से तीन बड़े पक्षों के बीच बंटी हुई है.

कैसी है पश्चिम बंगाल की राजनीती?

सबसे पहले बात करें तृणमूल कांग्रेस यानी TMC की, जिसकी नेता ममता बनर्जी हैं. फिलहाल राज्य में उनकी ही सरकार है और उनकी पकड़ खासकर गांवों और महिलाओं के बीच मजबूत मानी जाती है. उनकी राजनीति में बंगाल की पहचान यानी क्षेत्रीय गर्व को खास जगह दी जाती है. दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी है, जिसका प्रमुख चेहरा सुवेंदु अधिकारी को माना जा रहा है. 2021 के चुनाव में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया था और वह मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी.

पार्टी इस बार विकास, रोजगार और राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रही है और टीएमसी को कड़ी टक्कर देने की कोशिश कर रही है. तीसरा मोर्चा वाम दलों और कांग्रेस का है, जिसमें सीपीएम और कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. ये दल पहले लंबे समय तक यानी 1977 से 2011 तक सत्ता में रहे, लेकिन अब उनकी स्थिति कमजोर है. फिर भी वे वापसी की कोशिश में लगे हुए हैं.

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