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उनके पिता, मां, पत्नी, बच्चों और परिवार की यादें। कोठी की आग की तपिश ने अभिमन्यु के दिल को झुलसा दिया। कोठी जलाने के मामले में वे जैसे-जैसे कानूनी लड़ाई में आगे बढ़ रहे थे राजनीति में उनके कदम पीछे होते जा रहे थे।
आंदोलन के बाद हुए किसी भी चुनाव में कैप्टन अभिमन्यु को जीत नहीं मिली। सामाजिक रूप से अभिमन्यु पर समझौते दबाव बढ़ रहा था तो लंबी अदालती लड़ाई से परिवार भी थक चुका था। आखिरकार खापों के कहने पर उन्होंने समझौता कर लिया।
राजनीतिक मोर्चे पर भी नहीं मिली सफलता
कैप्टन अभिमन्यु को भाजपा में मंझा हुआ रणनीतिकार माना जाता है। एक समय में न सिर्फ प्रदेश बल्कि उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भी पहचान थी। वह दो बार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भी रह चुके हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले कैप्टन अभिमन्यु को भाजपा का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनाया गया था।
2014 के लोकसभा चुनाव में कैप्टन अभिमन्यु उत्तर प्रदेश के सहप्रभारी थे। 1998 और 2004 में रोहतक से कैप्टन अभिमन्यु ने लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें दोनों बार हार का सामना करना पड़ा। 2009 में उन्होंने नारनौंद से विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन इसमें भी उनके हिस्से हार ही आई।
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अभिमन्यु की संघर्ष गाथा: जाट आंदोलन की आग में जला घर, चुनावी हार से टूटा सियासी सफर; और खाली हाथ रह गए कैप्टन








