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गर्मियों की आहट के साथ ही प्यास भी जैसे बढ़ जाती है ओर ऐसे में ठंडे पानी की तलाश हर घर, हर गली में शुरू हो जाती है. दरअसल, इन तलाश में एक पुरानी याद भी धीरे-धीरे लौटती है मटके का पानी जिसमें वो सोंधी खुशबू, वो हल्की-सी ठंडक, जो सिर्फ शरीर ही नहीं, बल्कि मन को भी तृप्त कर देती है.
मटके का पानी सेहत के लिए अच्छा
वहीं जहां बचपन में आंगन के कोने में रखा मटका सिर्फ पानी का बर्तन नहीं होता था, वो घर की सादगी और सुकून की पहचान होता था. आज भी लोग मानते हैं कि मटके का पानी सेहत के लिए अच्छा होता है ओर इसमें कोई मिलावट नहीं होती हैं, न कोई केमिकल बस मिट्टी की ठंडक और प्रकृति का स्पर्श शामिल होता है. वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक की बोतलों में रखा ठंडा पानी भले ही तुरंत राहत दे, लेकिन लोगों का मानना है कि वह अंदर ही अंदर शरीर को नुकसान पहुंचाता है,ओर इस तुलना में मटका हमेशा बेहतर लगता है.
परंपरा के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई
बता दें कि इस सुकून भरी तस्वीर के पीछे एक दर्दनाक सच्चाई भी छिपी हुई है, जिसे शायद हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. जब इस सच्चाई को जानने की कोशिश लोकल 18 की टीम ने की तो कुम्हारों की आंखों में छिपी थकान और बेबसी साफ दिखाई दी. कुम्हारों का कहना है कि आज वह अपनी इस संस्कृति को बचाने में लगे हुए हैं, लेकिन बावजूद इसके कच्चा माल महंगा मिलने से उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
मेहनत ज्यादा, दाम कम
उनका मानना है कि इस काम में मेहनत काफी ज्यादा है लेकिन दाम उन कारीगरों को सही नहीं मिल पा रहे हैं. वही धर्मपाल प्रजापति ने बताया कि वह पिछले कई पीढ़ियों से कुम्हार का काम करते आ रहे हैं ओर गर्मियों के मौसम में वह मिट्टी के मटके ओर हांडी बनाते हैं. उन्होंने कहा कि आज के समय में उन्हें मिट्टी को लेकर काफी ज्यादा परेशानी हो रही है और वह काफी दूर से खासतौर पर यह चिकनी मिट्टी मंगवा रहे हैं.
उन्होंने बताया कि वह ये मटका 35 रूपये से लेकर 60 रुपये में होलसेल रेट पर बेच देते हैं, लेकिन वही यह मटका बाजार में 80 रूपये से 150 रुपये तक बिकता है. उन्होंने कहा कि अपने हाथों से मटका दिन-रात मेहनत करके तैयार करने वाले कुम्हारों को उनका उचित दाम नहीं मिलता है और अब इस महंगाई के दौर में यह काम जारी रखना भी मुश्किल हो गया है. उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में इन मिट्टी के मटको की डिमांड तो काफी ज्यादा बढ़ जाती है,ओर साथ में लोग दूर-दूर से इन्हें खरीदने के लिए पहुंचते हैं.
नई पीढ़ी का घटता रुझान
वहीं कुम्हार बबल ने बताया कि आबादी बढ़ने के साथ-साथ अब मिट्टी मिलने में भी उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और साथ में उन्हें जगह को लेकर भी काफी समस्या आ रही है. उन्होंने बताया कि पिछले लगभग 250 सालों से वह यह काम करते आ रहे हैं और अब उचित दाम नहीं मिलने से उनकी नई पीढ़ी इस काम को करने से मना कर रही है.
बढ़ती मांग, लेकिन सीमित सुविधाएं
उन्होंने कहा कि गांवों में तो सरकार ने कुम्हारों को जगह दी है लेकिन शहरों में इस काम को करने के लिए उन्हें कोई भी सुविधा नहीं मिल रही है. उन्होंने बताया कि पंजाब,हिमाचल और हरियाणा के कई जिलों से लोग मिट्टी के बने मटके व हंडिया उनसे खरीदने के लिए आते हैं, क्योंकि इसमें काफी ज्यादा ठंडक होती है और यह काफी लाभकारी माना जाता है.
सरकार से मदद की उम्मीद
उन्होंने बताया कि अब वह चाहते है कि सरकार उनके इस काम की ओर ध्यान दें और उन्हें मिट्टी व काम करने के लिए जगह अलॉट करवाएं.वहीं कांतादेवी की कहानी भी कुछ अलग नहीं है,क्योंकि यह काम उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा, और आज भी उसी परंपरा को निभा रही हैं. उनके हाथों की कला में वर्षों का अनुभव है, लेकिन उस कला की कीमत आज भी बहुत कम आंकी जाती है. वे मटके और कुल्हड़ बनाती हैं, लोगों तक पहुंचाती हैं, लेकिन फिर भी उनका जीवन संघर्ष से भरा रहता है. वह मांग करती है कि उन्हें सरकार की तरफ से कुछ सुविधाएं मिले ताकि वह नहीं पीढ़ी के युवाओं को भी इस काम के साथ जोड़ सके.
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