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फरीदाबाद के नवादा गांव में बारिश और ओलों से गेहूं, गेंदा और सब्जियों की फसल बर्बाद होने के बाद किसान कृष्ण भारी नुकसान और कर्ज के दौर से गुजर रहे हैं. तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और एक एकड़ में तोरी की खेती शुरू की है. करीब 25 हजार रुपये की लागत और लगातार मेहनत के सहारे अब उनकी पूरी उम्मीद इसी फसल पर टिकी है, जिससे घर चलाने और कर्ज चुकाने की आस है.
फरीदाबाद. नवादा गांव में इस बार किसान बड़ी मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. बारिश और ओलों ने ऐसी मार मारी कि गेहूं की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है. साथ ही कई सब्जियों और गेंदे की खेती भी खराब हो गई. मेहनत महीनों की थी लेकिन खेतों में कुछ भी नहीं बचा ऐसे हालात में किसान कर्ज में डूब गए हैं और परिवार चलाना तक मुश्किल हो गया है. अब इन्हीं हालात के बीच एक किसान ने हिम्मत नहीं हारी और नई उम्मीद के साथ तोरी की खेती शुरू की है. लोकल 18 से बातचीत में किसान कृष्ण ने बताया मैं पीछे से उत्तर प्रदेश के कासगंज का रहने वाला हूं और करीब 9 साल पहले ज्यादा मुनाफे की उम्मीद में फरीदाबाद आए थे. लेकिन इस बार मौसम की मार ने सब कुछ बिगाड़ दिया. कृष्ण ने बताया गेहूं, गेंदा और दूसरी सब्जियों में भारी नुकसान हुआ है और अब सारी उम्मीद तोरी की खेती पर टिकी है. कृष्ण ने बताया दोपहर की तेज गर्मी में जब लोग घरों में आराम कर रहे होते हैं, तब मैं और मेरी पत्नी खेत में नराई-गुड़ाई करते हैं. कृष्ण ने बताया नराई नहीं करेंगे तो फसल खराब हो जाएगी. हमें इसलिए सुबह, दोपहर और शाम हर समय खेत में लगे रहना पड़ता है. मैंने एकड़ में नामधारी वैरायटी की तोरी लगाई है, जिसमें सिर्फ बीज पर ही करीब 4500 रुपये खर्च हुए हैं और अब तक कुल लागत 25 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है. सिर्फ नराई में ही 9 हजार रुपये लग गए.
हर साल 45 से 50 हजार रुपये देने पड़ते हैं
कृष्ण ने बताया खेत में हर 20 दिन बाद घास उग जाती है, जिसे उखाड़ना पड़ता है. एक बार की नराई में ही 3 से 4 दिन लग जाते हैं. पहले की फसलों में हुए नुकसान के बाद अब यही तोरी की फसल हमारे लिए सहारा बनी हुई है. इसी से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई चलेगी घर चलेगा और जो कर्ज लिया है उसे भी चुकाने की उम्मीद है. कृष्ण ने बताया खेती करना आसान नहीं है. मैं अपने परिवार के साथ खेत में ही झोपड़ी बनाकर रहता हूं. रात में सांप निकल आने का डर बना रहता है लेकिन मजबूरी ऐसी है कि खेत छोड़ नहीं सकते. जमीन पट्टे पर ली हुई है जिसके लिए हर साल 45 से 50 हजार रुपये देने पड़ते हैं. कृष्ण ने बताया तोरी की खेती में 7 से 8 बार जुताई किया है और सिंचाई मौसम पर निर्भर करती है. अगर हवा चलती है तो हर तीसरे दिन पानी देना पड़ता है नहीं तो हफ्ते में एक बार सिंचाई करनी होती है. कंपनी के अनुसार फसल 45 से 60 दिन में तैयार हो जाती है जिसे फिर मैं मंडी में बेचने के लिए लेकर जाता हूं. कृष्ण ने बताया खेती में मेहनत बहुत है लेकिन मुनाफा नहीं मिल पाता. इसके बावजूद मैं उम्मीद नहीं छोड़ रहा हूं. इस बार मेरी पूरी आस तोरी की फसल पर टिकी है शायद यही मुझे कर्ज से बाहर निकाल सके.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें
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