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आने वाले समय के चुनावों पर जरा एक नजर डालें। 2027 की शुरुआत में होने वाले यूपी के चुनावों में महिलाओं का वोट निर्णायक भूमिका निभाएगा। इसमें योगी आदित्यनाथ लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश करेंगे। हालांकि असली लक्ष्य 2029 का लोकसभा चुनाव है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की एकजुटता ने भाजपा को 240 सीटों तक सीमित कर दिया था, जो 2014 के बाद उसका सबसे कम आंकड़ा है। वहीं कांग्रेस का मानना है कि 2026 के केरल विधानसभा चुनाव में जीत उसे दक्षिण भारत में चुनावी तौर पर मजबूत पकड़ देगी। कर्नाटक और तेलंगाना में पहले ही उसकी सरकारें हैं, जबकि तमिलनाडु में वह गठबंधन सहयोगी है। यदि केरल भी उसके पक्ष में जाता है, तो एनडीए गठबंधन आंध्र प्रदेश (जहां उसकी सहयोगी टीडीपी की सरकार है) को छोड़ दक्षिण के चार राज्यों में सत्ता से बाहर हो जाएगा। 2027 में कांग्रेस को यह उम्मीद भी होगी कि वह उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश के साथ आम आदमी पार्टी-शासित पंजाब को भी अपने खाते में जोड़कर देशभर में अपने राज्यों की संख्या छह तक पहुंचा लेगी। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इससे राहुल गांधी 2029 में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए मजबूत स्थिति में आ जाएंगे। इंडिया गठबंधन के कांग्रेस के इर्द-गिर्द सिमटने के साथ ही पार्टी को विश्वास होगा कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा-नीत एनडीए को हराने का उसके पास एक वास्तविक अवसर होगा। इस रुझान को पलटने के लिए भाजपा ने दो रणनीतियां अपनाई हैं। पहली है हिंदुत्व पर और अधिक जोर देना। पार्टी ने संघ के साथ अपने कथित मतभेद खत्म कर लिए हैं। अब वह भारत के हिंदू बहुसंख्यकवाद को कम करके नहीं आंकती। भाजपा का दूसरा बड़ा दांव महिलाओं का जनसांख्यिकीय समूह है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को महिलाओं के वोटों का उल्लेखनीय हिस्सा मिला था। एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच वोट-शेयर का अंतर कम होने की स्थिति में महिलाओं का वोट एनडीए को निर्णायक बढ़त दिला सकता है। इसी के मद्देनजर गृह मंत्री अमित शाह ने भविष्य के भाजपा-नैरेटिव को गढ़ना शुरू कर दिया है। लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित न हो पाने के बाद उन्होंने इसीलिए विपक्ष को चेतावनी दी कि आप जहां भी वोट मांगने जाएंगे, आपको महिलाओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। इंडिया गठबंधन को भी एहसास है कि भाजपा ने महिलाओं के वोटर-समूह को साधने के लिए एक शक्तिशाली चुनावी नैरेटिव हासिल कर लिया है। अब राज्य और राष्ट्रीय स्तर के चुनाव दो परस्पर विरोधी कथानकों के इर्द-गिर्द घूमेंगे। भाजपा विपक्ष पर आरोप लगाएगी कि उसने उस विधेयक को हराकर महिलाओं को निराश किया, जो 2029 की प्रस्तावित 816 सीटों वाली लोकसभा में 272 महिला सांसदों को सशक्त बना सकता था। वहीं कांग्रेस, सपा, राजद, तृणमूल और अन्य विपक्षी दल अब अल्पसंख्यक वोटों पर अपनी निर्भरता बढ़ाने के लिए मजबूर होंगे। विपक्ष के लिए मुस्लिम वोट कितने अहम हैं, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के 21 प्रतिशत वोट-शेयर में से लगभग आधा हिस्सा अल्पसंख्यक वोटों से आने का अनुमान था। वहीं हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में पश्चिम बंगाल में तृणमूल के लिए मुस्लिम वोटों की अहमियत का विश्लेषण किया गया। अध्ययन का निष्कर्ष था कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में तृणमूल की जीत में मुस्लिम वोट निर्णायक रहे थे। अध्ययन ने पांच ऐसे जिलों की पहचान की, जहां बड़ी मुस्लिम आबादी ने तृणमूल को स्पष्ट बढ़त दिलाई : मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दीनापुर, बीरभूम और साउथ 24 परगना। इन जिलों में अल्पसंख्यक मतदाताओं के कारण तृणमूल का वोट शेयर 48 से 36.7 प्रतिशत के बीच रहा। क्या संविधान संशोधन विधेयक की विफलता का असर 23 और 29 अप्रैल को होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा? संभवतः नहीं, क्योंकि अधिकांश मतदाता पहले ही अपना मन बना चुके हैं। लेकिन आने वाले चुनावों में भाजपा का महिलाओं पर केंद्रित यह चुनावी तीर निशाने पर लग सकता है। भाजपा को भरोसा है कि विपक्ष को महिला-विरोधी करार देकर वह महिला वोटरों में अपनी अपील को बढ़ा पाएगी। यह अपील पहले ही मजबूत है, क्योंकि भाजपा-नीत सरकारों ने महिलाओं के पक्ष में कई नीतिगत कदम लागू किए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: महिलाओं को लेकर चुनावी तीर क्या निशाने पर लगेगा?


