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अंबाला जिले की 400 साल पुरानी कोस मीनारें आज उपेक्षा का शिकार होकर जर्जर हालत में पहुंच चुकी हैं. शेरशाह सूरी और मुगल काल से जुड़ी ये ऐतिहासिक धरोहरें कभी यात्रियों के मार्गदर्शन का प्रमुख साधन थीं.
अंबाला: हरियाणा के अंबाला जिले में स्थित मध्यकालीन ‘कोस मीनार’ आज अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रही हैं. दरअसल करीब 400 वर्ष पुरानी ये ऐतिहासिक धरोहरें कभी यात्रियों के मार्गदर्शन और विश्राम का प्रमुख साधन हुआ करती थीं, लेकिन वर्तमान में इनमें से अधिकांश उपेक्षा का शिकार होकर जर्जर स्थिति में पहुंच चुकी हैं.
क्यों बनवाया जाता था कोस मीनार
इतिहासकारों के अनुसार, कोस मीनारों का निर्माण प्रमुख रूप से शेरशाह सूरी के समय विकसित सड़कों पर किया गया था, जिन्हें बाद में मुगल शासक अकबर और जहांगीर ने व्यवस्थित रूप से विस्तार दिया. बता दें कि इन कोस मीनारों को प्रत्येक एक कोस, यानी लगभग 4.3 किलोमीटर की दूरी पर बनाया जाता था, ताकि यात्रियों को दूरी का अनुमान मिल सके और वे थोड़ी देर विश्राम कर सकें. ये मीनारें उस समय के प्रसिद्ध मार्ग ग्रैंड ट्रंक रोड का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं, जो आगरा से लाहौर तक फैला हुआ था.
अंबाला में है चार मीनार
वहीं अंबाला जिले में ऐसी चार कोस मीनारों का उल्लेख मिलता है, इनमें से पहली मीनार कोट कच्छवा खुर्द गांव में स्थित थी, जिसके अब केवल अवशेष ही बचे हैं. इसी तरह दूसरी मीनार मच्छौंडा से उगाड़ा मार्ग पर स्थित है, जो अब असंरक्षित है और इसका निचला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है. साथ ही तीसरी मीनार कांवला से मटेहड़ी जट्टां मार्ग पर थी, जो आज पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और केवल निशान मात्र शेष हैं.
वहीं अंबाला जिले की चौथी कोस मीनार अंबाला शहर के कपड़ा बाजार में रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है और इसे वर्ष 1918 में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था और यह आज भी खड़ी है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मरम्मत के दौरान इसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की गई, जिससे इसकी ऐतिहासिक संरचना प्रभावित हुई है.
जहांगीर के आत्मकथा में है जिक्र
वहीं लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए डीएवी कॉलेज के इतिहास विभाग में प्रोफेसर डॉ चांद सिंह ने बताया कि मध्यकालीन समय में जो यात्रियों के लिए जो रूट होते थे, उनपर यह कोस मीनार कुछ दूरी पर बनाई जाती थी. उन्होंने कहा यह वर्णन जहांगीर की आत्मकथा में देखने को मिलता है, जहां उसने जमीदारों को आदेश दिए थे कि वह अपने खेतों के पास से गुजरने वाले रास्ते में कोस मीनार और कुआं बनवाए.
लखोरी ईंटों से बनी थीं मीनारें
उन्होंने कहा वैसे तो जो लोगों के चलने के लिए रास्ते बनवाने का कार्य शेरशाह सूरी के समय में ही शुरू हो गया था, लेकिन अकबर ओर जहांगीर के समय में इनमें थोड़े बदलाव किए गए थे. उन्होंने बताया कि कोस मीनारें लखोरी ईंटों से निर्मित ठोस स्तंभ होती थीं, जो नीचे से अष्टभुजाकार और ऊपर से गोलाकार होती थीं. यह स्थापत्य शैली मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला की विशिष्ट पहचान मानी जाती है ओर समकालीन विदेशी यात्रियों ने भी अपने विवरणों में इन मीनारों का उल्लेख किया है, जिससे इनके ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि होती है.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें
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