जब जज्बे और जुनून ने दी दिव्यांगता को मात, वो 5 कहानियां, जो पैदा करती हैं जीने की ललक Haryana News & Updates

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जब जज्बे और जुनून ने दी दिव्यांगता को मात, 5 कहानियां, जो देती हैं जीने की चाह

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जब जज्‍बा और जुनून कूट-कूटकर भरा हो तो द‍िव्‍यांगता का हर पहाड़ ढह जाता है. यह बात साब‍ित की है देश के उन द‍िव्‍यांगों ने, जो शरीर से भले ही लाचार हैं लेक‍िन उन्‍होंने इसको कमजोरी नहीं बनने द‍िया, उल्‍टा मजबूती से सफलता की ऐसी इबारतें ल‍िख दी हैं जो सामान्‍य लोगों में परेशान‍ियों से न घबराने और जीने की उम्‍मीद जगाती है, आइए पढ़ते हैं वे 5 कहान‍ियां….

हमारे पास अच्छा शरीर है, दिमाग है, भी सुरक्षित अंग हैं लेकिन हम परेशानियों से घबरा जाते हैं, जबकि दिव्यांग, जिनके पास शारीरिक रूप से कुछ अधूरा है, चाहे पैर, हाथ, आंख या कुछ और, लेकिन उनका हौसला शायद आसमान से भी ज्यादा विशाल है. आज हम आपको दिव्यांगता को मात देने वाली ऐसी 5 कहानियां सुनाने जा रहे हैं जो न केवल जीने की ललक पैदा करती हैं बल्कि बताती हैं कि इनके समंदर जैसे जज्बे के आगे पहाड़ जैसी रुकावटें भी सर झुकाती हैं.

सबसे पहले बताते हैं आपको उज्जैन के इंद्रानगर निवासी इमरान के हौसले की कहानी. जिनकी लाइफ किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है. दोनों पैरों से लाचार इमरान खुद की मेहनत से पैसे कमा रहे हैं. इमरान बॉडी बिल्डिंग में भी कई मेडल हासिल कर चुके हैं और अब दोनों पैर न होने के बावजूद डिलीवरी बॉय बनकर न केवल लोगों को खाना और सामान डिलिवर करते हैं, बल्कि अपनी मेहनत के दम पर उन लोगों को आईना भी दिखा रहे हैं जो परेशानियों का बहाना बनाकर मेहनत से जी चुराते हैं.

सबसे पहले बताते हैं आपको उज्जैन के इंद्रानगर निवासी इमरान के हौसले की कहानी. जिनकी लाइफ किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है. दोनों पैरों से लाचार इमरान खुद की मेहनत से पैसे कमा रहे हैं. इमरान बॉडी बिल्डिंग में भी कई मेडल हासिल कर चुके हैं और अब दोनों पैर न होने के बावजूद डिलीवरी बॉय बनकर न केवल लोगों को खाना और सामान डिलिवर करते हैं, बल्कि अपनी मेहनत के दम पर उन लोगों को आईना भी दिखा रहे हैं जो परेशानियों का बहाना बनाकर मेहनत से जी चुराते हैं.

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झारखंड के हजारीबाग जिले के चाणो गांव की इस बेटी ने वो कर दिखाया है जो कोई सोच भी नहीं सकता. जन्म से ही दोनों हाथों से महरूम लक्ष्मी कुमारी के स‍िर से बचपन में ही प‍िता का साया भी छ‍िन गया ले‍क‍िन इन्‍होंने कभी अपने हाथों या प‍ि‍ता की कमी को कमजोरी नहीं बनने दिया और दोनों पैरों की मदद से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने हजारीबाग में विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कैंपस में फूड कैंटीन शुरू की. उनके हाथ के स्वाद के दीवाने बच्चे आज उन्हें कैफे वाली दीदी के नाम से बुलाते हैं.

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जो शरीर से ठीक से चल फिर भी न पाए लेकिन देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी परीक्षा को क्रैक कर ले, तो यह ऐतिहासिक ही है और हरियाणा के महेंद्रगढ़ के गांव खटोटी कला के रहने वाले दिव्यांग नितीश कुमार ने पांचवी बार में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर सच में इस पल को हासिल कर लिया है. नितीश के सफलता की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो परिस्थितियों को कारण बताकर अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं.

जो शरीर से ठीक से चल फिर भी न पाए लेकिन देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी परीक्षा को क्रैक कर ले, तो यह ऐतिहासिक ही है और हरियाणा के महेंद्रगढ़ के गांव खटोटी कला के रहने वाले दिव्यांग नितीश कुमार ने पांचवी बार में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर सच में इस पल को हासिल कर लिया है. नितीश के सफलता की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो परिस्थितियों को कारण बताकर अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं.

बिना हाथ-पैर के जन्मे बच्चे का जीवन कैसा होता है, जरा सोचकर देखिए, शायद आप दया और अफसोस के अलावा आगे नहीं सोच पाएंगे, लेकिन आपकी इसी सोच को तोड़ती हैं पायल नाग. ओडिशा की बिना हाथ और पांव की तीरंदाज पायल नाग ने हाल ही में वर्ल्ड चैंपियन और ओलंपिक पदक विजेता शीतल देवी को हराकर गोल्ड मेडल जीता है और पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. वह दिन दूर नहीं जब पायल अगले एशियन गेम्स में भारत के लिए स्वर्ण लेकर लौटें.

बिना हाथ-पैर के जन्मे बच्चे का जीवन कैसा होता है, जरा सोचकर देखिए, शायद आप दया और अफसोस के अलावा आगे नहीं सोच पाएंगे, लेकिन आपकी इसी सोच को तोड़ती हैं पायल नाग. ओडिशा की बिना हाथ और पांव की तीरंदाज पायल नाग ने हाल ही में वर्ल्ड चैंपियन और ओलंपिक पदक विजेता शीतल देवी को हराकर गोल्ड मेडल जीता है और पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. वह दिन दूर नहीं जब पायल अगले एशियन गेम्स में भारत के लिए स्वर्ण लेकर लौटें.

यूपी के सुल्तानपुर की रिशा वर्मा किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं, दुनिया को कदमों पर मोड़ने की कूबत रखने वाले चलते-फिरते 40 बच्चे आज उनकी पहचान बन चुके हैं. रिशा खुद दिव्यांग हैं लेकिन उनके हौसले इतने ऊंचे कि उन्होंने अपनी कमजोरी को पीछे छोड़कर 40 बच्चों का भविष्य संवारना शुरू कर दिया. रूरल इन्फार्मेटिव एंड सोशल हार्मोनी अकादमी नाम से 1998 में संस्था की स्थापना कर 2 बच्चों से शुरू कर वे वर्तमान में 40 मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पढ़ा रही हैं. सबसे खास बात है कि इन बच्चों में 6 साल से 45 वर्ष के मानसिक रूप से कमजोर लोग शामिल हैं.

यूपी के सुल्तानपुर की रिशा वर्मा किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं, दुनिया को कदमों पर मोड़ने की कूबत रखने वाले चलते-फिरते 40 बच्चे आज उनकी पहचान बन चुके हैं. रिशा खुद दिव्यांग हैं लेकिन उनके हौसले इतने ऊंचे कि उन्होंने अपनी कमजोरी को पीछे छोड़कर 40 बच्चों का भविष्य संवारना शुरू कर दिया. रूरल इन्फार्मेटिव एंड सोशल हार्मोनी अकादमी नाम से 1998 में संस्था की स्थापना कर 2 बच्चों से शुरू कर वे वर्तमान में 40 मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पढ़ा रही हैं. सबसे खास बात है कि इन बच्चों में 6 साल से 45 वर्ष के मानसिक रूप से कमजोर लोग शामिल हैं.

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