कौशिक बसु का कॉलम: देश में नई उम्मीदों के साथ ही कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं Politics & News

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पिछले छह वर्ष विश्व के लिए कठिन रहे हैं, जिसमें कोविड-19 महामारी और यूक्रेन तथा गाजा में युद्ध शामिल हैं। मध्य-पूर्व में इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर हमला करके शुरू किया गया अनावश्यक युद्ध तो विश्व को और गहरे संकट में डुबो चुका है। चूंकि हम एक वैश्वीकृत दुनिया में रहते हैं, इसलिए यह युद्ध हर जगह आर्थिक समस्याएं पैदा कर रहा है और भारत भी इससे प्रभावित है। एलपीजी की कमी का बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, विकास दर धीमी हो रही है, मुद्रास्फीति बढ़ गई है और भारतीय रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि यह और बढ़ सकती है। भारतीय रुपया अपनी सबसे तेज गिरावटों में से एक देख रहा है। वास्तव में, विश्व की प्रमुख मुद्राओं में भारतीय रुपया ही वह मुद्रा है जिसने सबसे तेज गिरावट दर्ज की है। भारत इस युद्ध के आर्थिक असर के प्रति इतना प्रभावित क्यों बनता जा रहा है? इसका छोटा-सा जवाब यह है : जहां भारत की बुनियादें मजबूत हैं, वहीं वह व्यावसायिक नीति-निर्माण में बहुत कम प्रयास कर रहा है। हाल में भारत की अपनी छह-सप्ताह की यात्रा के बाद मैं आशावादी महसूस कर रहा था। इस बार मैंने पिछले कई वर्षों की तुलना में अधिक शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों का दौरा किया। यह यात्रा पुणे में पहाड़ी पर बसे सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के खूबसूरत परिसर में एक सम्मेलन से शुरू हुई। मेरा अगला पड़ाव कोलकाता था। प्रेसिडेंसी कॉलेज में एक समृद्ध इतिहास की छाया में व्याख्यान देना और उत्साही छात्रों-शिक्षकों से बात करना विशेष अनुभव था। कोलकाता से मैं पुरुलिया भी गया, जहां मैंने फिलिक्स स्कूल के छात्रों से बात की। स्कूल अपना डिस्कवर द वर्ल्ड ऑफ इकोनॉमिक्स कार्यक्रम चला रहा था। पूरे भारत से छात्र आए थे ताकि वे गणितज्ञ महान महाराज, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और अन्यों के व्याख्यान सुन सकें। इस आदिवासी क्षेत्र के बीच, आसपास के गांवों के साथ-साथ बड़े शहरों के छात्रों के साथ अर्थशास्त्र, राजनीति और ज्यामिति पर चर्चा करते हुए आशावादी महसूस न करना असंभव था। अंतिम पड़ाव दिल्ली था, जहां मैंने गुरु गोबिंद सिंह कॉलेज ऑफ कॉमर्स में व्याख्यान दिया। वहां दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने के समय के अपने कई छात्रों से मुलाकात की। एक बार फिर प्रतिभाशाली छात्रों और शिक्षकों से मिलना, जो उत्साह से भरे थे, भारत के प्रति मुझे आशान्वित कर गया। इन सभी स्थानों पर लोगों से बात करते हुए उनकी गर्मजोशी और बौद्धिक प्रतिभा को देखते हुए यह साफ हुआ कि भारत में बड़ी मात्रा में मानवीय प्रतिभा और कई क्षमताएं मौजूद हैं। हालांकि, मुझे यह स्वीकार करना होगा कि जब मैं सरकार की नीति और भारत की अर्थव्यवस्था में जो हो रहा है, उसे करीब से देखता हूं (और मैं यहां ईरान युद्ध की बात ही नहीं कर रहा), तो मुझे चिंता होती है। केवल नारों पर ध्यान केंद्रित करके और जमीन पर वास्तविक नीति पर ध्यान न देकर हम अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचा रहे हैं। पिछले दस-बारह वर्षों में हम शोध और आंकड़ों के क्षेत्र में पीछे खिसकते जा रहे हैं। अब अधिकांश ध्यान हेडलाइन-जीडीपी पर है। जीडीपी देश के सभी लोगों द्वारा अर्जित कुल आय को संदर्भित करता है। लेकिन यह इस कुल राशि के जनसंख्या में बंटवारे के बारे में कुछ नहीं बताता। अगर दो-तीन परिवारों की आय बहुत बड़ी हो तो जीडीपी अच्छी वृद्धि दिखाएगा, भले ही बहुत बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हों और बुरी स्थिति में हों। आश्चर्य नहीं कि भारत के नेता प्रति व्यक्ति आय, युवा बेरोजगारी और आबादी के निचले 50 प्रतिशत की रहन-सहन की स्थिति के बारे में शायद ही कभी बात करते हैं। भारत अपनी विदेश नीति में भी स्वतंत्रता खोता जा रहा है। जबकि भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता रहा है और अपने बौद्धिक नेतृत्व के लिए अत्यधिक सम्मानित था। मेरी तीसरी चिंता उच्च शिक्षा की है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद शुरू किए गए आईआईटी, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और कई अन्य संस्थान उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान करते थे तथा विश्व प्रसिद्ध शोधकर्ता वहां काम करते और शोध पत्र प्रकाशित करते थे। लेकिन पिछले 75 वर्षों की उच्च शिक्षा की उपलब्धियों का सम्मान नहीं करके देश के साथ बड़ा अन्याय किया जा रहा है। मुझे आशा है कि भारत मौजूदा आर्थिक मुश्किलों से उभरेगा, अतीत की अपनी बौद्धिक उपलब्धियों को साकार करेगा और लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के उन आदर्शों को पूरा करेगा, जिन्होंने हमें विश्व में एक विशेष स्थान दिलाया था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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