संजय कुमार का कॉलम: महिला आरक्षण पर निर्मित शंकाओं का समाधान जरूरी Politics & News

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यह तो स्पष्ट ही है कि महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन को लेकर भले कुछ आशंकाएं, शर्तें और चिंताएं हों, लेकिन विपक्ष की ओर से सुनाई देने वाली तीखी आवाजें महिला आरक्षण नहीं, परिसीमन विधेयक को लेकर हैं। चूंकि संसद के विशेष सत्र में दोनों विधेयकों को एक साथ चर्चा के लिए लाया गया, इसलिए यह धारणा बनाई गई कि विपक्ष महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन में बाधा डाल रहा है। परंतु क्या वास्तव में दोनों विधेयकों को साथ लाना आवश्यक था? क्या यह संभव नहीं था कि महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को अलग-अलग चर्चा और क्रियान्वयन के लिए प्रस्तुत किया जाता? शायद ऐसा किया जा सकता था, लेकिन सरकार ने उन्हें साथ लाने का निर्णय इसलिए लिया होगा क्योंकि ये दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं। 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अगली परिसीमन प्रक्रिया पूरी हुए बिना 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। और नवीनतम जनगणना के आधार पर ही परिसीमन प्रक्रिया पूरी हो सकती है। इस प्रकार, महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का क्रियान्वयन लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन तथा परिसीमन आयोग द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण से संवैधानिक रूप से जुड़ा हुआ है। पूर्व में पारित किए गए विधेयक के प्रावधानों के अनुसार यह तो ठीक है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण लागू करने से पहले परिसीमन प्रक्रिया का पूरा होना आवश्यक है, लेकिन दोनों विधेयकों को एक साथ प्रस्तुत करने से शक पैदा हुआ कि महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन को बिना स्पष्ट नियम तय किए परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह भ्रम मुख्यतः इस कारण उत्पन्न हुआ था कि प्रस्तावित लोकसभा सीटों की संख्या को बढ़ाकर 815 से 850 तक किए जाने के बारे में अलग-अलग स्रोतों से अलग-अलग आंकड़े सामने आए थे। लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए किस फॉर्मूले का उपयोग किया जाएगा, इस पर स्पष्टता के अभाव ने भी भ्रम को और गहरा किया। सदन में जो कहा गया (प्रत्येक राज्य में वर्तमान सीटों की संख्या को 50 प्रतिशत बढ़ाना), वह चर्चा के लिए प्रस्तुत विधेयक में दिखाई नहीं दिया। इसके अलावा, जहां मौजूदा नियम स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि अगला परिसीमन नवीनतम जनगणना के आधार पर होगा, वहीं विधेयक में इसे बदलकर 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने का प्रस्ताव रखा गया। यह तब है, जब 2026 की जनगणना प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और डेटा संग्रह में डिजिटल तकनीक के उपयोग के कारण इसके अतीत की जनगणनाओं की तुलना में अधिक शीघ्रता से पूरा होने की सम्भावना है। जहां सैद्धांतिक रूप से ऐसा जताया गया है कि महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर कोई खास विरोध नहीं है, फिर भी इससे जुड़ी चिंताएं बनी हुई हैं। एससी-एसटी के लिए सीटों के आरक्षण को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं, वहीं महिला उम्मीदवारों के लिए सीटों के आरक्षण में कौन-सा मानदंड लागू होगा, इस पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। माना जा रहा है कि दलित और आदिवासी समुदायों की महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी, लेकिन इस संबंध में संदेहों को दूर करने की आवश्यकता है। स्थानीय निकाय चुनावों की तरह ओबीसी महिलाओं के लिए भी सीटें आरक्षित करने की मांग उठ रही है। इन मुद्दों को स्पष्ट रूप से सामने रखना आवश्यक है, ताकि उनसे जुड़े संदेहों को दूर किया जा सके। विपक्षी दलों ने चिंता जताई है कि जहां एससी और एसटी के आरक्षण को संवैधानिक आधार प्राप्त है, वहीं महिलाओं के लिए ओबीसी आरक्षण का वर्तमान विधेयक में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। चूंकि ओबीसी समुदाय भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा है, इसलिए उन्हें महिला आरक्षण से बाहर रखना विधेयक के प्रस्तावित उद्देश्य के लिए बाधा बन सकता है। अब कुछ विपक्षी दल इस पर जोर दे रहे हैं कि इस कमी को दूर करने के लिए या तो संविधान संशोधन किया जाए या फिर एक स्पष्ट नीतिगत प्रतिबद्धता दी जाए। यह आवश्यक है कि सरकार व्यापक परामर्श के माध्यम से इन चिंताओं का समाधान करे। सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्षी दलों- दोनों को शामिल करते हुए द्विपक्षीय सहमति न केवल परिसीमन प्रक्रिया को अधिक वैधता प्रदान करेगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगी कि महिला आरक्षण अनावश्यक विवादों के कारण दब न जाए। सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्षी दलों- दोनों को शामिल करते हुए द्विपक्षीय सहमति न केवल परिसीमन प्रक्रिया को वैधता प्रदान करेगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगी कि महिला आरक्षण अनावश्यक विवादों में न फंस जाए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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संजय कुमार का कॉलम: महिला आरक्षण पर निर्मित शंकाओं का समाधान जरूरी