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मोबाइल और टीवी को अब तक बच्चों की आंखों का दुश्मन माना जाता रहा है लेकिन नई रिसर्च बता रही है कि असली नुकसान कहीं ज्यादा गहरा है। स्क्रीन के सामने बढ़ता समय बच्चों की नींद, भाषा विकास, व्यवहार और शारीरिक सेहत पर सीधा असर डाल रहा है। खेल-कूद से दूर होता बचपन और बदलता व्यवहार इस बात का संकेत है कि स्क्रीन टाइम अब सिर्फ तकनीक नहीं बल्कि पूरे बचपन की चुनौती बन चुका है।
इस गंभीर सच्चाई का खुलासा इंडियन पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित एक रिव्यू स्टडी में हुआ है। इसे पीजीआई के कम्युनिटी मेडिसिन और पीडियाट्रिक सेंटर के विशेषज्ञों ने किया है। अध्ययन में डॉ. निर्मन कौर, डॉ. मधु गुप्ता, डॉ. प्रभजोत मल्ही और डॉ. संदीप ग्रोवर शामिल हैं। शोध के मुताबिक पांच साल से कम उम्र के बच्चों में जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। मिडिल इनकम देशों में 21 से 98 प्रतिशत तक बच्चे तय सीमा से अधिक स्क्रीन टाइम में हैं जबकि हाई इनकम देशों में यह आंकड़ा 10 से 93.7 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
अध्ययन में बताया गया है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की नींद की गुणवत्ता को सबसे पहले प्रभावित करता है। देर से सोना, बार-बार नींद टूटना और पूरी नींद न होना बच्चों को चिड़चिड़ा और थका हुआ बना रहा है। इसके साथ ही शारीरिक गतिविधि घटने से मोटापे का खतरा बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल भाषा विकास को भी प्रभावित करता है जिससे बच्चों की बोलने-समझने की क्षमता और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण
शोधकर्ताओं ने इस समस्या को सोशल इकोलॉजिकल मॉडल के जरिये समझाया है जिसमें बच्चे के साथ-साथ माता-पिता, घर का माहौल और डिजिटल वातावरण को जिम्मेदार माना गया है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की सिफारिशों का हवाला देते हुए बताया गया है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए जबकि दो से पांच साल के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम दिन में एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए।
विशेषज्ञों के सुझाव
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बच्चों को नियमित खेल, शारीरिक गतिविधि और बेहतर दिनचर्या की ओर प्रेरित किया जाए तो स्क्रीन टाइम में 30 से 45 मिनट तक की कमी लाई जा सकती है। भारत जैसे देशों में इस विषय पर सीमित डेटा को देखते हुए इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और नीति-निर्माताओं से बच्चों के स्क्रीन टाइम पर दिशानिर्देश बनाने की भी सिफारिश की गई है ताकि डिजिटल दौर में बचपन और सेहत दोनों सुरक्षित रह सकें।
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PGI की स्टडी: क्या आपका बच्चा भी देखता है ज्यादा मोबाइल-टीवी; स्क्रीन टाइम सिर्फ तकनीक नहीं बल्कि बचपन की चुनौती

