NATO चीफ बोले-बिना अमेरिका अपनी रक्षा नहीं कर सकता यूरोप: वह बस सपने देख रहे, रक्षा बजट 10% तक बढ़ाने की मांग; अभी 2% खर्च करते Today World News

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वॉशिंगटन डीसी11 मिनट पहले

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नाटो के महासचिव मार्क रुट ने सोमवार को बेल्जियम के ब्रुसेल्स में यूरोपीय संघ की संसद की समितियों को संबोधित किया।

NATO के महासचिव मार्क रुट ने सोमवार को ब्रुसेल्स में यूरोपीय संसद को संबोधित करते हुए चेतावनी दी कि यूरोप अमेरिका के बिना खुद की रक्षा नहीं कर सकता।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक रुट ने कहा कि अगर वे वास्तव में अकेले ही ऐसा करना चाहते हैं तो उन्हें अपने रक्षा खर्च को 10% तक बढ़ाना होगा, अपनी परमाणु क्षमता का निर्माण करना होगा, जिसकी लागत अरबों यूरो होगी। अभी NATO के खर्च में यूरोपीय देशों का कुल योगदान केवल 30% है, जो देशों की GDP का औसतन 2% है।

रुट ने ट्रम्प के आर्कटिक क्षेत्र और ग्रीनलैंड की मजबूत रक्षा की रणनीति का समर्थन किया। रुट ने यह भी कहा कि उन्होंने ट्रम्प को उनकी बढ़ती धमकियों से पीछे हटने के लिए मनाया और ग्रीनलैंड को लेकर समझौते की दिशा में ले जाने की कोशिश की।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं की ट्रम्प से नाराजगी बढ़ी

डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेता इस बात से नाराज हैं कि ट्रम्प और रुट उनके पीठ पीछे ग्रीनलैंड के भविष्य पर बात कर रहे हैं। यूरोपीय संसद के कई सदस्यों ने रुट से पूछा कि उन्होंने ट्रम्प से ठीक क्या चर्चा की और इसका डेनमार्क व ग्रीनलैंड पर क्या असर होगा।

ट्रम्प ने पिछले हफ्ते दावा किया था कि ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर नाटो के साथ एक समझौते का ढांचा तैयार हो गया है, जिससे यूरोप में राहत मिली, हालांकि कई लोग चिंतित हैं कि ट्रम्प अपना मन बदल सकते हैं।

नाटो के महासचिव मार्क रुट ने सोमवार को कहा कि यूरोपीय देशों को अपना रक्षा बजट बढ़ाना चाहिए।

नाटो के महासचिव मार्क रुट ने सोमवार को कहा कि यूरोपीय देशों को अपना रक्षा बजट बढ़ाना चाहिए।

रुट बोले- ट्रम्प अच्छा काम कर रहे जिससे कई लोग चिढ़ रहे

रुट ने कहा कि 70 साल बाद भी यूरोप अमेरिकी सैन्य शक्ति पर निर्भर है। यूरोप को अपनी मजबूत रक्षा के लिए बहुत अधिक खर्च करना होगा, यहां तक कि अपना परमाणु हथियार बनाना पड़ेगा।

उन्होंने कहा, ‘2035 तक 5% जीडीपी रक्षा खर्च काफी नहीं, इसे 10% तक ले जाना होगा। उस स्थिति में आप हमारी स्वतंत्रता के अंतिम गारंटर यानी अमेरिकी परमाणु सुरक्षा कवच को खो देंगे। अगर यूरोप अकेला चल सके तो मेरी ओर से शुभकामनाएं।’

रुट ने ट्रम्प की बात दोहराई कि चीन और रूस आर्कटिक सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं। उन्होंने कहा, “ट्रम्प बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, मैं जानता हूं कि इससे कई लोग चिढ़ रहे हैं।” आर्कटिक रक्षा को लेकर उन्होंने कहा कि “ट्रम्प सही हैं।”

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और नाटो चीफ मार्क रूट ने मुलाकात की थी।

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और नाटो चीफ मार्क रूट ने मुलाकात की थी।

यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने से पीछे हटे थे ट्रम्प

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने से पीछे हट गए थे। ये टैरिफ 1 फरवरी से लगने वाले थे। ट्रम्प ने 21 जनवरी को कहा कि उन्होंने दावोस में NATO चीफ जनरल मार्क रुट के साथ बातचीत के बाद यह फैसला लिया।

ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उनकी NATO चीफ के साथ ग्रीनलैंड को लेकर होने वाले समझौते की बुनियादी बातें तय हो गई हैं। अगर यह समझौता पूरा होता है, तो यह अमेरिका और NATO के सभी देशों के लिए फायदेमंद होगा।

ग्रीनलैंड को लेकर NATO को मिल सकती है खास जिम्मेदारी

रुट ने ग्रीनलैंड मुद्दे के संबंध में दो फ्रेमवर्क प्रस्तुत की। यह फ्रेमवर्क पिछले हफ्ते ट्रम्प से मुलाकात के दौरान तय की गई थी।

  • पहली योजना: NATO का आर्कटिक की रक्षा के लिए अधिक सामूहिक जिम्मेदारी लेना शामिल होगा, ताकि रूस और चीन को सैन्य और आर्थिक दोनों तरीके से इस क्षेत्र तक पहुंचने से रोका जा सके।
  • दूसरी योजना: अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच त्रिपक्षीय वार्ता जारी रखना शामिल होगा। रुट ने कहा कि वह इन वार्ताओं में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने साफ किया कि उनके पास डेनमार्क की ओर से बातचीत करने का कोई अधिकार नहीं है और न ही वे ऐसा करेंगे, यह डेनमार्क का मामला है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) में कहा था कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा अमेरिका के अलावा कोई और देश नहीं कर सकता।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) में कहा था कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा अमेरिका के अलावा कोई और देश नहीं कर सकता।

NATO के अनुच्छेद 5 के तहत एक-दूसरे की रक्षा करते सदस्य देश

NATO के अनुच्छेद 5 के तहत किसी नाटो सदस्य देश पर हमला होता है, तो इसे सभी सदस्य देशों पर हमला समझा जाएगा। फिर सभी सदस्य देश मिलकर उस हमले का जवाब देने के लिए सहमत होते हैं। हालांकि, यह युद्ध की गारंटी नहीं देता।

हर देश अपनी संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। यह अनुच्छेद मुख्य रूप से सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ बनाया गया था, ताकि कोई भी देश अकेला न रहे। इसका मशहूर नारा है- एक पर हमला, सभी पर हमला।

ट्रम्प ने यूरोपीय देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने को कहा था

पिछले साल नीदरलैंड्स के द हेग शहर में हुई NATO समिट के बाद ट्रम्प ने यूरोपीय देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने को कहा था। ट्रम्प का मानना है कि अमेरिका NATO को बहुत पैसा देता है, लेकिन बाकी देश अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे हैं।

ट्रम्प चाहते हैं कि सभी सदस्य देश अपने GDP का 5% रक्षा पर खर्च करें। वहीं, स्पेन ने साफ कर दिया कि वह अपनी GDP का 5% रक्षा खर्च पर नहीं लगा सकता। स्पेन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वो 2.1% से ज्यादा खर्च नहीं करेगा।

बाकी यूरोपीय देश इस खर्च को पूरा करने में अभी काफी पीछे हैं। कई देशों के लिए यह खर्च बहुत बड़ा है और वे शायद 2032 या 2035 तक भी इस लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगे।

NATO से बाहर निकलना चाहते हैं ट्रम्प

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प NATO को लेकर कई बार नाराजगी जता चुके हैं। ट्रम्प ने बार-बार कहा कि यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे और सारा बोझ अमेरिका उठा रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर यूरोपीय देश 2% GDP रक्षा पर खर्च नहीं करते तो अमेरिका संगठन से हट भी सकता है।

डोनाल्ड ट्रम्प पिछले दो दशक से अमेरिका को नाटो से बाहर निकलने की वकालत करते रहे हैं। 2016 में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में ट्रम्प ने कहा था कि यदि रूस बाल्टिक देशों (एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया) पर हमला करता है, तो वे यह देखने के बाद ही मदद करेंगे कि उन्होंने अमेरिका के लिए अपना फर्ज पूरा किया है या नहीं।

ट्रम्प का मानना है कि यूरोपीय देश अमेरिका के खर्च पर नाटो की सुविधाएं भोग रहे हैं। 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद तो उन्होंने नाटो से निकलने की धमकी ही दे दी थी। ट्रम्प ने 2024 में एक इंटरव्यू में साफ कह दिया था कि जो देश अपने रक्षा बजट पर 2% से कम खर्च कर रहे हैं, अगर उन पर रूस हमला करता है तो अमेरिका उनकी मदद के लिए नहीं आएगा। उल्टे वे रूस को हमला करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।

सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद कमजोर हुआ यूरोप

सेकेंड वर्ल्ड वॉर (1939-45) के बाद यूरोप आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हो गया था। दूसरी तरफ जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरा।

अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना और परमाणु हथियार थे। उसने यूरोपीय देशों को परमाणु सुरक्षा मुहैया कराई। इससे यूरोपीय देशों को अपने परमाणु हथियार विकसित करने की जरूरत नहीं थी।

अमेरिका खासतौर पर रूस से परमाणु हमलों के खिलाफ यूरोपीय देशों को परमाणु सुरक्षा की गारंटी देता है। इससे यूरोपीय देशों का सैन्य खर्च कम होता है।

यूरोप में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी है। जर्मनी, पोलैंड और ब्रिटेन में 10 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। अमेरिका ने यहां मिलिट्री बेस बनाए हैं और मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात किए हैं। अमेरिका की मौजूदगी यूरोप को सुरक्षा का भरोसा देती है।

अमेरिका के नाटो से बाहर होने से क्या बदलेगा

यूरोप की सैन्य शक्ति सीमित है। ज्यादातर यूरोपीय देश अमेरिका की तुलना में रक्षा पर कम खर्च करते हैं। यूरोपीयन यूनियन (EU) के पास NATO जैसी संगठित सेना नहीं है। यहां तक कि जर्मनी और फ्रांस जैसे ताकतवर देश भी खुफिया जानकारी और तकनीक के लिए अमेरिका पर निर्भर है।

अगर अमेरिका गठबंधन छोड़ देता है तो यूरोप को अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए और ज्यादा खर्च करने की आवश्यकता होगी। उन्हें गोला-बारूद, परिवहन, ईंधन भरने वाले विमान, कमांड और नियंत्रण प्रणाली, उपग्रह, ड्रोन इत्यादि की कमी को पूरा करना होगा, जो वर्तमान में अमेरिका द्वारा मुहैया कराए जाते हैं।

यूके और फ्रांस जैसे नाटो सदस्य-देशों के पास 500 एटमी हथियार हैं, जबकि अकेले रूस के पास 6000 हैं। अगर अमेरिका नाटो से बाहर चला गया तो गठबंधन को अपनी न्यूक्लियर-पॉलिसी को नए सिरे से आकार देना होगा।

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