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असम, केरल, तमिलनाडु, बंगाल और पुडुचेरी के चुनाव भाजपा के दबदबे वाले क्षेत्रों में नहीं हो रहे हैं। ये सच है कि पूर्वोत्तर में- असम सहित- भाजपा का अब काफी नियंत्रण है, लेकिन बंगाल जीते बिना कोई भी पार्टी यह नहीं कह सकती कि उसका पूर्वी भारत पर दबदबा हो गया है। जैसे महाराष्ट्र में प्रमुख स्थिति हासिल किए बिना हम यह नहीं कह सकते थे कि पश्चिम भारत में भाजपा का पूरा प्रभाव है, जबकि गुजरात में पिछले दो दशकों से उसकी मजबूत पकड़ रही है। ऐसा क्यों है? क्योंकि जनसंख्या के हिसाब से महाराष्ट्र और बंगाल हमारे दूसरे और तीसरे सबसे बड़े राज्य हैं- बिहार के विभाजन के बाद दोनों अब उससे आगे हो गए हैं। लेकिन ब्रिटिश राज के समय से ही इन राज्यों का एक ऐतिहासिक महत्व भी रहा है। दिल्ली के विपरीत- मुम्बई और कोलकाता- जो महाराष्ट्र व बंगाल की राजधानियां हैं- ब्रिटिश राज से पहले मछुआरों की बस्तियां हुआ करते थे। ब्रिटिश राज के बढ़ने के साथ ये भारत के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में बदल गए- राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से। इन्होंने आधुनिकता के आगमन का नेतृत्व किया, जिसमें उम्मीदें थीं और चुनौतियां भी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बंगाल में 42 में से केवल 2 सीटें मिली थीं और 2016 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 3 सीटें मिलीं। लेकिन उसके बाद भारी प्रचार और बाकी पार्टियों से बहुत ज्यादा खर्च करने के बाद उसने मजबूत आधार बना लिया और वह राज्य में टीएमसी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। उसने माकपा- जिसने 34 साल (1977-2011) तक बंगाल पर शासन किया, और कांग्रेस- जिसकी राज्य में अच्छी मौजूदगी थी- दोनों को पीछे छोड़ दिया। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें और 2021 के विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतीं और 38-40% वोट हासिल किए। भाजपा ने बंगाल पर इतना ज्यादा ध्यान क्यों दिया? हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा में सावरकर को सबसे बड़ा वैचारिक नेता माना जाता है, लेकिन बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को पहला हिंदू राष्ट्रवादी माना जाता है और वंदे मातरम् को पहला हिंदू राष्ट्रवादी गीत माना जाता है। बंकिम का साहित्यिक काम 1880 के दशक से जुड़ा है, जो सावरकर के हिंदू राष्ट्रवादी लेखन से लगभग चार दशक पहले का है। इसके अलावा, श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ के पहले अध्यक्ष थे, जो भाजपा की पूर्व पार्टी थी। भाजपा की विचारधारा के अनुसार, हिंदू राष्ट्रवाद की पहली शुरुआत बंगाल में हुई थी। लेकिन एक अहम मौजूदा कारण भी है। यह बंगाल में मुस्लिम वोटरों की संख्या से जुड़ा है। इस राज्य में भारत में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। राज्य की कुल आबादी में से लगभग 30% मुस्लिम हैं, जो 34% वाले असम के बाद दूसरे स्थान पर हैं। (जब जम्मू और कश्मीर एक राज्य था- जहां मुसलमान बहुमत में थे- तब बंगाल तीसरे स्थान पर था)। मुस्लिम वोटरों की संख्या बंगाल को बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है। अगर भाजपा बंगाल जीतती है, तो यह तभी संभव होगा जब हिंदू समुदाय काफी हद तक मुस्लिम विरोधी मंच पर एकजुट हो जाए। हिंदू एकता का विचार उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए बंगाल भाजपा के वैचारिक प्रोजेक्ट के लिए सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक है। यही एसआईआर प्रक्रिया के महत्व का भी कारण है। अगर इसके जरिए मुस्लिम वोटरों की संख्या काफी कम हो जाती है, तो बंगाल में भाजपा के जीतने की सम्भावना बढ़ जाएगी। बंगाल का महत्व सिर्फ भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में लोकतंत्र पर नजर रखने वाले विद्वानों और पर्यवेक्षकों के लिए भी यह रुचि का विषय है, जो खास तौर पर एसआईआर जैसे कदमों की निगरानी कर रहे हैं, जो इस समय बंगाल में पूरी तरह लागू है (और दूसरे राज्यों में भी फैल रहा है)। दुनिया भर के राजनीतिक अनुभवों पर आधारित लोकतंत्र के कमजोर होने (डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग) के सिद्धांत के अनुसार, आज के समय में लोकतंत्र को कमजोर करने की शुरुआत गैर-चुनावी अंकुशों से होती है, जैसे अभिव्यक्ति की आजादी, गैर-सरकारी सिविल सोसायटी की सक्रियता और अल्पसंख्यकों के अधिकार। इसके बाद आम तौर पर अगला निशाना चुनाव प्रक्रिया होती है। एसआईआर का असर कम आय और कम पढ़े-लिखे कई समुदायों पर पड़ सकता है। आम तौर पर उनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं होते। जब बहुसंख्यक विचार वाली पार्टियां वोटर पंजीकरण से जुड़े ऐसे कदम उठाती हैं, तो इसका असर गरीब, अल्पसंख्यक समुदायों पर बहुत पड़ता है। अगर बंगाल में एसआईआर से मुस्लिम वोटरों की संख्या काफी घट जाती है और भाजपा चुनाव जीत जाती है, तो यह सिर्फ व्यावहारिक राजनीति का मामला नहीं होगा। यह दुनिया में लोकतंत्र पर होने वाली बहसों का हिस्सा बनेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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