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- Jean Dreze Column: Rich Wait Not Needed For Poor Countries To Improve Lives
7 घंटे पहले
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ज्यां द्रेज प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री व समाजशास्त्री
कई वर्षों बाद पिछले महीने केरल जाना मेरे लिए सुखद अनुभव रहा। 1980 के दशक में जब मैं पीएचडी कर रहा था तो केरल अपने बेहतरीन सामाजिक संकेतकों के लिए जाना जाने लगा था। मसलन, 1981 की जनगणना के समय केरल में 71% वयस्क महिलाएं साक्षर थीं, जबकि पूरे भारत में सिर्फ 26% थीं। शिशु मृत्यु दर 1,000 जन्मों पर 37 थी, जबकि भारत में यह 110 थी। ये उपलब्धियां तब थीं, जब केरल देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक था।
इससे पता चलता है कि गरीब देशों को लोगों का जीवन सुधारने के लिए अमीर बनने का इंतजार करने की जरूरत नहीं। विकास के शुरुआती दौर में भी सरकार और समाज ऐसे कदम उठा सकते हैं, जिनसे हर व्यक्ति की बुनियादी जरूरतें पूरी हों। सभी को अच्छी शिक्षा देना इसका उदाहरण है, जो ‘केरल मॉडल’ का आधार है।
याद रखें, पुराने दिनों में केरल का सामाजिक ढांचा बेहद दमनकारी था। जब स्वामी विवेकानंद 19वीं सदी के अंत में केरल गए तो जाति-भेद की कठोरता देखकर विचलित हुए थे। वंचित जातियों को शिक्षा के अधिकार के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है
1980 के दशक में जब केरल दुनिया में चर्चित होने लगा, तब कुछ विद्वानों ने चेतावनी दी कि केरल मॉडल टिकाऊ नहीं है। आर्थिक निवेश के बजाय सामाजिक विकास को प्राथमिकता देने की केरल को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन इन भविष्यवाणियों के विपरीत, केरल में सामाजिक संकेतक बेहतर होते रहे और लोगों की आय भी तेजी से बढ़ी। इसका कारण था कि राज्य की अर्थव्यवस्था बढ़ने लगी थी और बहुत से केरलवासी दुबई, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों में काम करने लगे। राज्य के अंदर और बाहर, दोनों ही जगह केरल ने अपने मानव संसाधन विकास का फायदा उठाया।
कई मायनों में आज केरल का जीवन-स्तर तथाकथित विकसित देशों के बराबर है। उदाहरण के लिए, शिशु मृत्यु दर अब 1,000 जीवित जन्मों पर सिर्फ 5 है, जो अमेरिका से थोड़ी ही कम है। पूरे भारत में यह लगभग 25 है। इसी तरह, केरल में अधिकतर बच्चों को तीन साल की उम्र से ही प्री-स्कूल शिक्षा मिल जाती है, जबकि अमेरिका में यह सुविधा मुश्किल से आधे बच्चों को मिलती है।
केरल कई क्षेत्रों में देश से भी आगे निकल गया है। देश की सबसे मजबूत और सक्रिय ग्राम पंचायत, स्वयं-सहायता समूह और सहकारी संस्थाएं केरल में हैं। इनमें यूएलसीएसएस नामक एक सहकारी निर्माण कंपनी भी शामिल है, जहां 18,000 मजदूर बिना किसी मालिक के काम करते हैं। केरल में प्रवासी मजदूरों और निराश्रित परिवारों के लिए प्रगतिशील नीतियां भी हैं। 2018 की भयानक बाढ़ और कोविड संकट में भी केरल ने सामाजिक एकजुटता की मिसाल पेश की थी।
पिछले महीने केरल जाने पर मैंने एक और गुण देखा- जिम्मेदार नागरिकता की भावना। सुविधाघरों समेत सार्वजनिक जगहें बहुत साफ-सुथरी थीं। गाड़ियां जेब्रा क्रॉसिंग पर रुकती हैं। लोग लाइन में खड़े होते हैं। कूड़ेदान का सही उपयोग होता है। और यह सब बिना किसी जोर-जबरदस्ती के होता है, क्योंकि समाज में सार्वजनिक जिम्मेदारी की भावना विकसित हो चुकी है।
मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि केरल हर तरह से आदर्श है। वहां भी कई समस्याएं हैं, जैसे आत्महत्या की ऊंची दर और शिक्षित बेरोजगारी। लेकिन जब भारत 2047 तक विकसित बनने की कोशिश कर रहा है, तो उसे केरल से सीख लेनी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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