विराग गुप्ता का कॉलम: ऑटोमेशन के दौर में विषमता और बेरोजगारी बढ़ सकती है Politics & News

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5 घंटे पहले

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक

यूपी में विधायकों के भत्ते पिछले 12 सालों में चार गुना बढ़कर लगभग 2.96 लाख मासिक हो गए। देश में सरकारी कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों और जजों को महंगाई भत्ते का सालाना लाभ मिलता है। लेकिन यूपी में संगठित क्षेत्र के मजदूरों की वेतन वृद्धि के लिए हर 5 साल में गठित होने वाले वेज बोर्ड का गठन अब 12 वर्ष बाद हो रहा है। इसी को लेकर श्रमिकों में असंतोष है। इससे जुड़ी चार बातों को समझना जरूरी है :

1. ईरान युद्ध के दौरान महंगाई और रसोई गैस की कालाबाजारी से परेशान असंगठित क्षेत्र के लाखों लोगों ने गांवों में पलायन किया है। खरबों की प्रॉपर्टी के लेन-देन, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और विदेशी निवेश वाले स्वर्ण जयंती शहर नोएडा में अकुशल श्रमिकों को अब 11313 के बजाय 13690 रुपए महीना मिलेंगे।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे जैसे राजमार्गों के विकास से उद्योगों के विकास और पलायन रोकने की बात कही गई थी। लेकिन हकीकत में चित्रकूट जिले में 8 फैक्ट्रियों में सिर्फ 222 लोगों को रोजगार मिला है। महंगाई बढ़ने और निवेश बाधित होने की वजह से एमएसएमई सेक्टर पहले से संकटग्रस्त है। श्रमिकों के बाद घरेलू सहायिकाओं, ड्राइवरों ने भी मोर्चा खोल दिया है। रेवड़ी और सब्सिडी बांटने वाली सरकारें वायदे के अनुसार कामगारों को कानूनी हक दिलाने में विफल हो रही हैं।

2. वायदों को हकीकत में बदलने के लिए कानून, नियम, सॉफ्टवेयर सिस्टम अपडेट, फंड आवंटन और राज्यों से विमर्श का रोडमैप जरूरी है। नए आपराधिक कानूनों से 3 साल में जल्द न्याय का सपना दिखाया जा रहा है, लेकिन उसके लिए सॉफ्टवेयर और फाेरेंसिक का सिस्टम अभी तक नहीं बना। डेटा सुरक्षा और आनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध के लिए संसद से पारित कानून अभी तक लागू नहीं हुए। 2019 में बने चार श्रम कानूनों की संहिता लागू करने के लिए दिसम्बर 2025 में ड्राफ्ट नियम जारी हुए। लेकिन उन्हें पूरे देश में लागू करने के लिए अभी तक नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ।

3. ई-श्रम पोर्टल में रजिस्टर्ड लगभग 30.48 करोड़ कामगारों को मनरेगा, स्किल इंडिया, श्रमयोगी मान-धन जैसे पोर्टल्स से जोड़कर वन स्टॉप सेंटर बनाने के लिए पिछले साल के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने वादा किया था। उसी तरह से करोड़ों गिग वर्कर्स के कल्याण से जुड़ी बातों पर अमल के लिए भी अभी तक नियम नहीं बने। मनरेगा का नाम बदल गया, लेकिन 11.03 करोड़ मजदूरों को साल में 125 दिन काम मिलना मुश्किल ही है। नौ घंटे की दिहाड़ी के बाद उन्हें यूपी में 252, बिहार और झारखंड में 255, मध्य प्रदेश में 261 और राजस्थान में 281 रुपए जद्दोजहद से मिलते हैं, जो न्यूनतम मजदूरी से भी कम हैं। मनरेगा, आंगनवाड़ी और आउटसोर्सिंग वाले कर्मियों को अगर सरकार ही न्यूनतम मजदूरी नहीं दे तो फिर निजी कंपनियों पर नियमों का डंडा कैसे चल सकता है?

4. सोशल मीडिया के माध्यम से नेतागण भी चुनाव प्रचार कर रहे हैं, इसलिए नोएडा में आंदोलन करने वाले मजदूरों पर इनके उपयोग का दोष मढ़ना ठीक नहीं। नए कानूनों के समय 2019 में सरकार ने दावा किया था कि इन सुधारों से 40 करोड़ श्रमिकों और कामगारों को नियुक्ति पत्र, न्यूनतम मजदूरी, महिलाओं को बराबर वेतन, ग्रेच्यूटी, फ्री मेडिकल चेकअप जैसी सुरक्षा मिलेगी। लेकिन राज्यों में पुराने कानून के अनुसार ही सरकारी सिस्टम चल रहा है।

सरकारी प्रचार तंत्र और हकीकत के बीच में फासला बढ़ने से कामगारों में असंतोष के साथ प्रशासन में अराजकता बढ़ रही है। श्रमिकों के कल्याण के लिए बने नए कानून के अनुसार न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी, ओवरटाइम, पीएफ और मेडिकल लाभ देने के लिए राज्यों को नियम लागू करना होगा। केंद्र सरकार को भी विशेष फंड देना होगा। श्रम कानूनों को मनमर्जी से लागू करने पर ऑटोमेशन के दौर में बेरोजगारी के साथ असमानता बढ़ सकती है।

श्रमिकों के कल्याण के लिए बने नए कानून के अनुसार न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी, ओवरटाइम, पीएफ और मेडिकल लाभ देने के लिए राज्यों को नियम लागू करना होगा। केंद्र सरकार को भी विशेष फंड देना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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