एन. रघुरामन का कॉलम: देना ही पाना भी है: वॉलंटियरिंग आपको दूसरों से कहीं अधिक मदद करती है Politics & News

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49 मिनट पहले

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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

लक्ष्मी रोज पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद 3 घंटे की वॉलंटियरिंग के लिए घर से निकल जाती हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी की पढ़ाई तो की, पर काम का कोई अनुभव नहीं है। वे नियमित रूप से एक स्थानीय निजी अस्पताल की चैरिटी विंग में लगन से उन मरीजों की मदद करतीं, जो इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे।

जरूरतमंद लोगों को कम खर्च या कई बार मुफ्त में इलाज दिलाकर उन्हें संतोष मिलता। धीरे-धीरे उनका चैरिटी का काम बढ़ा तो इलाके में उनकी पहचान बनने लगी। वे स्टाफ रखने लगीं, फंडिंग के लिए मल्टीनेशनल कंपनियों से जुड़ीं, कॉरपोरेट डोनर्स से मिलने यात्राएं करने लगीं। साथ ही अपने मूल स्थान पर चल रहा काम भी संभालती थीं। आप जानते हैं​ कि वे चुपचाप क्या बना रही थीं?

यह था- अपना सीवी। वे लीडरशिप, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और स्ट्रैटेजिक टीम बिल्डिंग जैसे पेशेवर स्तर के काम कर रही थीं। यह वास्तविक अनुभव कई महंगे कॉरपोरेट ट्रेनिंग प्रोग्राम्स से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। करीब 50 हजार लोगों पर हुए ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के अध्ययन में सामने आया कि वॉलंटियरिंग एकमात्र वर्कप्लेस इंटरवेंशन है, जो व्यक्ति की वेलबीइंग को बेहतर बनाता है और यह कर्मचारियों की पारंपरिक ट्रेनिंग या अन्य सहायता कार्यक्रमों से काफी आगे है।

लक्ष्मी के लिए भी ये सच साबित हुआ। काम शुरू करने के 5 साल बाद उनके जीवन में कठिनाई आई। पति की नौकरी चली गई। पर लक्ष्मी ने आत्मविश्वास नहीं खोया। उन्होंने पति का हौसला बनाए रखा, दोस्तों-पड़ोसियों के सामने भी माहौल सहज रखा। वॉलंटियरिंग ने जल्द ही बेहद व्यावहारिक तरीके से घरेलू स्थिति संभाल ली। कैसे?

अब तक उन्होंने मजबूत व विविध नेटवर्क बनाया था। वे प्रभावशाली लोगों को कॉल कर सकती थीं, सीधे उनके ऑफिस जा सकती थीं। लक्ष्मी की निस्वार्थ सेवा-पेशेवर रवैए के कारण वे लोग उनका सम्मान करते।

इन चर्चाओं में उन्होंने परिवार की आपात स्थिति बताई और सहायता भी तत्काल मिली। न सिर्फ उनके पति को नई नौकरी मिली, बल्कि उन्हें भी उसी चैरिटी में वेतन वाली स्थायी नौकरी ऑफर हुई। आज भी ऑफिस की नौकरी के अलावा वे तीन घंटे अतिरिक्त वॉलंटियरिंग करती हैं। वॉलंटियरिंग दूसरों की मदद का तो बेहतर तरीका है ही, आज के जॉब मार्केट में ये खुद की मदद का भी सबसे अच्छा जरिया बन गया है।

रिक्रूटर्स शैक्षणिक उपलब्धियों से ज्यादा प्रामाणिक कौशल को प्राथमिकता देते हैं, इसलिए वॉलंटियरिंग प्रोफाइल मजबूत बनाती है। बहुत-से रिक्रूटर्स मानते हैं कि वॉलंटियरिंग में अनुभवी कैंडिडेट्स ज्यादा खुश रहते हैं, इंटरव्यू को अधिक सहजता से हैंडल करते हैं। उनके अनुभव अधिक प्रामाणिक होते हैं। यूके जैसे देशों में कंपनियां वॉलंटियरिंग को बढ़ावा देती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि इसका कर्मचारियों के प्रदर्शन व कार्यस्थल की संतुष्टि पर सकारात्मक असर होता है।

मुझसे मार्गदर्शन लेने वाले विद्यार्थियों को मैं हमेशा सलाह देता हूं कि काम यदि अत्यधिक तकनीकी भरा न हो तो सामान्य इंटर्नशिप के बजाय वॉलंटियरिंग करें। इससे नेटवर्क बनता है, अनौपचारिक माहौल में लाभार्थियों व कॉरपोरेट लीडर्स से सीधे बात का मौका मिलता है। ये उन्हें प्रोफेशनल टर्मिनोलॉजी-व्यवहारिक कामकाज सिखाती है, जिससे उनके पास इंटरव्यू में बात करने के लिए ठोस विषय होते हैं।

2005 की मुंबई बाढ़ में मदद करने वाले मेरे विद्यार्थियों को उनके साथियों से पहले नौकरी मिली। वजह सिर्फ चैरिटी नहीं थी, बल्कि उन्होंने साबित किया था कि वे परिपक्वता से आपदाओं को संभाल सकते हैं। हर सक्षम व्यक्ति, खासकर कॉलेज छात्रों को वॉलंटियरिंग जरूर करनी चाहिए। इससे आत्मसंतुष्टि मिलती है और संकट के वक्त में वे पेशेवर की तरह सहायता करना सीखते हैं।

फंडा यह है कि वॉलंटियरिंग के जरिए आप स्वयं का ही सबसे मजबूत रूप तैयार करते हैं। सुनिश्चित करते हैं कि आप भविष्य की हर चुनौती के लिए तैयार हैं। …और तब देना ही पाना भी बन जाता है।

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