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“यह मेरा बेटा है, और मैं इसे आपकी देखरेख में छोड़ रही हूं, इसका ख्याल रखिएगा।’ मेरी मां इसी तरह से मेरा, हमारे बचपन के घर के बाहर खड़े उस बड़े-से गूलर के पेड़ से परिचय कराती थीं। वे मुझे उसकी दो मजबूत शाखाओं से बंधे साड़ी के एक झूले में लिटाया करती थीं। पेड़ बहुत घना और छायादार था। जब मैं झूले में सो रहा होता, तब मां पेड़ के नीचे बैठकर चावल, दाल आदि साफ करती थीं। जागने पर भी मैं रोता नहीं था, क्योंकि पेड़ मेरा मन बहलाए रखता था- अपनी हल्की हवा से मेरे चेहरे को सहलाकर, पक्षियों को अपनी शाखाओं पर बुलाकर और उनकी चहचहाहट से मुझे विस्मित करके। और जब सूरज अपनी दिशा बदलकर मेरी आंखों पर किरणें डालने लगता, तो वह पेड़ मेरा संरक्षक बन जाता- तेज हवा चलाकर अपनी किसी शाखा को मेरे चेहरे और तेज धूप के बीच खड़ा कर देता। मुझे धुंधली-सी याद है कि पांच-छह साल की उम्र में मैं उसी पेड़ के नीचे खेला करता था। मैं उसके तने की छाल को खुरचने की कोशिश में अपने नाखूनों को चोट पहुंचा लेता था और उसके पत्तों को मोड़कर उनसे कुछ बना लिया करता था। फिर एक गर्मी में, हमने देखा कि स्थानीय नगर प्रशासन ने सड़क बनाने के लिए उस पेड़ को काट दिया है। उसकी जगह सूनी पड़ी जमीन को देखकर मां और मैं शोक में डूब गए। उसके बाद मां वर्षों तक गांव नहीं गईं- और मैं भी नहीं। लेकिन उन तमाम वर्षों में वे उस पेड़ की बातें करती रही थीं और उससे जुड़ी अपने बचपन और मेरे बचपन की कहानियां सुनाती रही थीं, क्योंकि वह पेड़ मेरे परनाना ने लगाया था। हम में से कई लोगों ने अपने जीवन में किसी न किसी पेड़ से प्यार किया होगा। बाद के वर्षों में, जब मैंने पेड़ों और मनुष्यों के जुड़ाव पर कई शोध पढ़े, तो मुझे लगा कि किसी विशेष पेड़ से अपनापन महसूस करना असामान्य नहीं है। सामान्य दृष्टि से देखें तो पेड़ पालतू जानवरों की तरह हमें कोई प्रतिक्रिया देते नहीं दिखते। लेकिन जब हम उन चीजों की सूची बनाते हैं, जो वे हमें देते हैं- केवल लकड़ी, छाया और हवा ही नहीं- बल्कि वे वायु से प्रदूषकों को हटाते हैं, कार्बन सोखते हैं, वर्षाजल के बहाव को कम करते हैं- तो स्पष्ट होता है कि हमारा उनसे एक सहजीवी संबंध है। हालांकि ये तमाम कारण पेड़ों की सराहना के लिए हैं, लेकिन पेड़ों से प्यार करना एक अलग वजह से होता है। फिनलैंड के एक अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू की शोधकर्ता काल्सा वाइनियो तीन कारण बताती हैं। पहला, यह स्मृतियों (नॉस्टेल्जिया) से जुड़ा होता है, जैसा कि ऊपर के अनुभव में देखा गया। दूसरा, आप उसे बढ़ता हुए देखते हैं, क्योंकि कई जगहों पर किसी के जन्म के समय पेड़ लगाने की परम्परा होती है। और तीसरा, पेड़ों का आकर्षण- वे बहुत बड़े, प्रभावशाली, विचित्र आकार के और अत्यंत प्राचीन होते हैं- किसी स्मारक या दुर्लभ प्रजाति के जैसे। अमेरिका में एक फॉरेस्ट्री पाठ्यक्रम के लिए मेरी एक यात्रा के दौरान छात्रों को एक पेड़ का इंटरव्यू लेने का असाइनमेंट दिया गया था। विश्वविद्यालय आपको सिखाता है कि इसे कैसे करें। छात्र बाहर जाते हैं, एक पेड़ ढूंढते हैं और बोलकर अपना परिचय देते हैं। यह स्वयं के लिए एक स्वीकारोक्ति भी होती है कि आप एक अन्य जीवित अस्तित्व के पास जा रहे हैं। यह आपकी कल्पना के दरवाजे खोलता है। आपको महसूस होने लगता है कि पेड़ भी आपसे बातें कर रहा है। छात्रों से कहा जाता है कि वे पेड़ के विवरणों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें। इंटरव्यू का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है- पेड़ के साथ दस मिनट का मौन। बैठ जाइए, आंखें बंद कर लीजिए, अपने मन को जितने विचार लाने हों लाने दीजिए, और मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि आप पाएंगे पेड़ एक स्वतंत्र प्राणी के रूप में आपसे संवाद कर रहा है। अब वह केवल एक सुंदर दृश्य मात्र ही नहीं रह गया है। यही वह क्षण है, जब आप एक भावनात्मक जुड़ाव विकसित करते हैं, जिसे पर्यावरणीय संरक्षकता कहा जा सकता है। फंडा यह है कि यदि आप अपने आसपास की प्रकृति को जानने लगते हैं, तो आप उसका मूल्य समझते हैं, उसे पोषित करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और पेड़ों से जुड़ाव महसूस करते हैं। उसी क्षण, आपका अपने आप से संबंध भी एक दूसरे स्तर पर पहुंच जाता है। एक रविवार को इसे आजमाने में हर्ज ही क्या है?
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एन. रघुरामन का कॉलम: प्रकृति से जुड़ने पर हमारा खुद से संबंध बेहतर होता है



