रुचिर शर्मा का कॉलम: तेल-संकट ने दुनिया की नई कमजोरियों को उजागर किया Politics & News

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ईरान युद्ध से उपजे तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई कमजोरी को उजागर किया है। इससे पहले दुनिया ने कभी भी इतने ऊंचे राजकोषीय घाटे और कर्ज के स्तरों के साथ किसी संकट में प्रवेश नहीं किया था। यह बोझ एनर्जी की ऊंची कीमतों के प्रभाव को कम करने की सरकारों की क्षमता घटाएगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के पहले तेल-झटके 1970 के दशक में लगे थे और एक नए युग की शुरुआत के साथ जुड़े थे, जब सरकारों ने बजट-घाटे को कभी-कभार के बजाय नियमित रूप से चलाना शुरू किया। लेकिन उस समय अमेरिका और अन्य प्रमुख देशों में सामान्य घाटा जीडीपी का लगभग 2% था। आज औसत घाटा इसके दोगुने से अधिक हो चुका है और इसके परिणामस्वरूप जी-7 देशों का औसत सरकारी कर्ज-स्तर जीडीपी के 20% से बढ़कर 100% से अधिक हो गया है। सरकारें अतीत की तरह ही इन झटकों का सामना करने की कोशिश कर रही हैं। यूके और फ्रांस से लेकर ब्राजील और भारत तक- सरकारें परिवहन से लेकर खाना पकाने तक विभिन्न प्रकार के ईंधनों पर मूल्य नियंत्रण, राशनिंग योजनाएं और सब्सिडी लागू कर रही हैं। लेकिन इस बार वे इन राहत उपायों को वहन करने की स्थिति में नहीं हैं और वैश्विक बांड-बाजार खर्चों में बढ़ोतरी को लेकर चेता रहे हैं। आम तौर पर संकट के समय दीर्घकालिक ब्याज दरें घटती हैं, क्योंकि बाजार धीमी ग्रोथ और आसान मौद्रिक नीति की अपेक्षा करते हैं। आज दीर्घकालिक मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन बाजार को आशंका है कि ईरान से जुड़े तेल-झटके के कारण पहले से तेजी से बढ़ रहे घाटों और कर्ज के ऊपर अतिरिक्त सरकारी खर्च बढ़ेगा, जिसके चलते बांड पर उच्च टर्म प्रीमियम की मांग हो रही है। पिछले वर्ष, कुल वैश्विक कर्ज रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो वैश्विक जीडीपी के तीन गुना से भी अधिक है। इससे बहुत कम सरकारें ऐसी स्थिति में बची हैं, जो नए प्रोत्साहन पैकेज लागू कर सकें। केंद्रीय बैंक भी इसी तरह की दुविधा में हैं। हाल के दशकों में वे सरकारों के साथ मिलकर संकट के पहले संकेत पर प्रोत्साहन उपायों का विस्तार करते रहे हैं, लेकिन अब ऐसा करना आसान नहीं रह गया है। फेडरल रिजर्व अपने 2% मुद्रास्फीति लक्ष्य को 60 महीनों से हासिल नहीं कर पाया है। हाल के समय में विकसित देशों के चार में से तीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हर दो में से एक केंद्रीय बैंक अपने लक्ष्य से चूक रहे हैं। अगर तेल-संकट अर्थव्यवस्थाओं की गति धीमी कर दे, तब भी केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करने में सक्षम नहीं होंगे, क्योंकि यही संकट मुद्रास्फीति को भी बढ़ाता है। सबसे ज्यादा मुश्किल में वे देश हैं, जहां सरकारी कर्ज और राजकोषीय घाटा ऊंचा है और जिनके केंद्रीय बैंक अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य को हासिल नहीं कर पा रहे हैं। विकसित दुनिया में इनमें अमेरिका और यूके शामिल हैं; जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक जोखिम ब्राजील, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों को है। भारत भी कोई बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है, क्योंकि उसका सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय घाटा ऊंचा है। सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि बढ़ती तेल कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर न पड़े, विशेषकर विधानसभा चुनावों के मद्देनजर। जहां अन्य सभी प्रमुख तेल-उपभोक्ता देशों में फरवरी के बाद से कीमतें 25% या उससे अधिक बढ़ चुकी हैं, वहीं भारत ऐसा एकमात्र देश है जहां अभी तक कोई वृद्धि नहीं हुई है। लेकिन यह मूल्य-नियंत्रण टिकाऊ नहीं है और इससे युद्ध से निर्मित हुई अनिश्चितता के प्रभावों को भी रोका नहीं जा सका है। हालांकि अमेरिका एनर्जी पर अपनी आत्मनिर्भरता के कारण तेल-संकट से अपेक्षाकृत सुरक्षित है, फिर भी वह लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, क्योंकि पिछले वर्ष उसका राजकोषीय घाटा विकसित दुनिया में सबसे अधिक, लगभग 6% जीडीपी के बराबर था। अमेरिका अब इस तरह से खर्च करने का आदी हो चुका है, मानो कोई सीमा ही न हो। पिछले वर्ष ट्रम्प ने रक्षा व्यय में 150 अरब डॉलर की बढ़ोतरी की, और अब इसे तीन गुना और बढ़ा दिया। इससे राजकोषीय घाटा जीडीपी के 7% तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष, कुल वैश्विक कर्ज रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो कि वैश्विक जीडीपी का तीन गुना से भी अधिक है। इससे आज बहुत कम सरकारें ऐसी स्थिति में बची हैं, जो नए प्रोत्साहन पैकेज लागू कर सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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रुचिर शर्मा का कॉलम: तेल-संकट ने दुनिया की नई कमजोरियों को उजागर किया