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हिसार। गोबर से बनने वाली मीथेन गैस को शुद्ध कर कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) बनाई जा रही है जो वैकल्पिक ऊर्जा का नया स्रोत बन सकती है। फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर गुजरात से इसकी शुरुआत हो चुकी है। सब कुछ ठीक रहा तो देश के अलग-अलग हिस्सों में प्लांट और सीएनजी पंप स्थापित किए जाएंगे। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह ने वीरवार को यह बात कही।
लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) में दो दिवसीय 15वीं इंडियन डेयरी इंजीनियर्स एसोसिएशन कन्वेंशन एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने पहुंचे मीनेश शाह ने कहा कि गोबर को समस्या के बजाय ऊर्जा और उर्वरक संकट के समाधान के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि गोबर से निकलने वाली मीथेन को शुद्ध किया जाए तो इसे वाहनों में सीएनजी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। बायोगैस में 70 से 80 प्रतिशत मीथेन होती है जिसे कंप्रेस कर 95 प्रतिशत शुद्धता वाली मीथेन तैयार की जा सकती है। गुजरात के बनासकांठा में ऐसे तीन प्लांट शुरू किए जा चुके हैं और जल्द ही 10 और प्लांट लगाए जाएंगे। हरियाणा में भी ऐसा एक प्लांट प्रस्तावित किया जा रहा है।
80 हजार छोटे पोर्टेबल बायोगैस प्लांट वितरित किए जा चुके
डॉ. शाह ने बताया कि जिस प्रकार पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाया जा रहा है उसी तरह सीएनजी बनाने के लिए कंप्रेस्ड बायोगैस का उपयोग किया जा सकेगा। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत भी विकसित होंगे। देश में अब तक करीब 80 हजार छोटे पोर्टेबल बायोगैस प्लांट वितरित किए जा चुके हैं जिन्हें जरूरत के अनुसार स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी पशु संपदा है लेकिन अभी इसका उपयोग मुख्य रूप से दूध उत्पादन तक ही सीमित है। गोबर का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए तो ऊर्जा और उर्वरक के क्षेत्र में भी देश काफी हद तक आत्मनिर्भर बन सकता है। गोबर की स्लरी से तैयार खाद डीएपी की जरूरत को काफी हद तक पूरा कर सकती है।
अमेरिका के साथ ट्रेड डील में डेयरी उत्पाद शामिल नहीं
डॉ. शाह ने कहा कि अमेरिका के साथ होने वाली ट्रेड डील में डेयरी उत्पादों को शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि देश में जितने डेयरी उत्पाद तैयार होते हैं लगभग उतनी ही खपत है। डेयरी उत्पादों की मांग हर साल करीब छह प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। भविष्य में उत्पादन बढ़ता है तो निर्यात के लिए भी योजना बनानी होगी।
लुवास के साथ भ्रूण प्रत्यारोपण व आईवीएफ पर होगा सहयोग
डॉ. मीनेश शाह ने बताया कि लुवास के कुलपति प्रो. विनोद कुमार के साथ भ्रूण प्रत्यारोपण और आईवीएफ तकनीक को लेकर चर्चा हुई है। इस दिशा में जल्द ही एमओयू किया जाएगा और एनडीडीबी की ओर से पूरा सहयोग दिया जाएगा। डेयरी साइंस कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए भी कुछ परियोजनाओं पर विचार किया जा रहा है।
60 से 65 प्रतिशत दूध खुले में बिक रहा
डॉ. शाह ने बताया कि देश में अभी 30 से 35 प्रतिशत दूध संगठित क्षेत्र के माध्यम से बाजार में आता है जबकि 60 से 65 प्रतिशत दूध असंगठित क्षेत्र में खुले तौर पर बिकता है। मिलावट की आशंका भी इसी क्षेत्र में अधिक रहती है। सहकारी समितियों या कंपनियों के माध्यम से मिलने वाले दूध में मिलावट की संभावना बहुत कम होती है।
चार साल में दो लाख गांवों में बनेंगी सहकारी समितियां
डॉ. शाह ने बताया कि देश के लगभग 3.5 लाख गांवों में सहकारी समितियां बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें से करीब 1.5 लाख गांवों में पहले से कार्य कर रही हैं। शेष दो लाख गांवों में नई सहकारी समितियां स्थापित की जाएंगी। ये समितियां डेयरी, मत्स्य और कृषि क्षेत्र में काम करेंगी। अगले चार वर्षों में इस लक्ष्य को पूरा करने की योजना है।
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Hisar News: गोबर गैस से बनेगी सीएनजी, देशभर में लगेंगे पंप




