नवनीत गुर्जर का कॉलम: ईरान और अमेरिका के युद्ध से पश्चिम बंगाल तक… Politics & News

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युद्ध शुरू क्यों हुआ था- ये तो शायद खुद डोनाल्ड ट्रम्प भी नहीं जानते होंगे। लेकिन देर से ही सही, आखिर रुक गया। लड़ते-लड़ते थक चुके अमेरिका को युद्ध रोकने के लिए एक आड़ चाहिए थी। चालीस दिन बाद सचमुच उसने एक दिव्य आड़ तलाशी, जिसका नाम है- पाकिस्तान। ईरान से बात करने की स्थिति में वही था। फिर पाकिस्तान को श्रेय देकर अफगानिस्तान और आस-पास अमेरिका को अपने कुछ काम भी कराने होंगे। हालांकि इस अमेरिकी श्रेय से पाकिस्तान को खुश होने की जरूरत नहीं है। वैसे भी ट्रम्प के करीब जो भी गया, उसने मुंह की ही खाई है। कब मूड बदल जाए, कह नहीं सकते। जो भी हो, ईरान ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को नाकों चने चबवा दिए। खूब छकाया। खूब रुलाया। अब जब सीजफायर पर सहमति हो गई है तो होर्मुज खोलने के नाम पर हर हाल में ईरान अपनी सारी शर्तें भी मनवा लेगा। सीजफायर से पहले ही वो अपनी दस शर्तें रख चुका था। जहां तक तीसरे खिलाड़ी यानी इजराइल का सवाल है, वह फिलहाल तो कुछ शर्तों के साथ हमले रोकने पर राजी हो गया है लेकिन लेबनान को जैसे-तैसे आंख दिखाए बिना वो मानने वाला नहीं है। लेबनान पर हमले जब-तब होते रहेंगे, ऐसी आशंका बनी हुई है। खैर, युद्ध रुकने से दुनिया का भला हो गया। अब तेल-गैस और इनसे जुड़ी चीजों का संकट जो नजर आ रहा था, करीब एक महीने में दूर हो जाएगा। सब पटरी पर आ जाएगा। अगली वार्ता भी सफल हो ही जाएगी, क्योंकि अमेरिका को युद्ध रोकने की ज्यादा जल्दी है। इधर भारत में एक अलग ही युद्ध चल रहा है। चुनावी युद्ध। असम, केरल, पुडुचेरी में आज वोट डाले जा रहे हैं। दो बड़े राज्यों तमिलनाडु में 23 अप्रैल और पश्चिम बंगाल में 23 व 29 अप्रैल को चुनाव हैं। केरल में वामपंथियों का डंका बजता है। तमिलनाडु में लोकल पार्टियां हैं- द्रमुक और अन्ना द्रमुक। जहां तक चुनावी युद्ध की बात है, वो हो रहा है पश्चिम बंगाल में। यहां 71 वर्षीय ममता बनर्जी मुख्यमंत्री हैं। तृणमूल कांग्रेस की सरकार का वे 15 साल से नेतृत्व कर रही हैं। यहां की लम्बे कार्यकाल वाली वामपंथी सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने के बाद 2011 में ममता पहली बार राज्य की सत्ता पर काबिज हुई थीं। हालांकि माकपा सरकार की जिन खामियों को दूर करने के नारे से वे सत्ता में आईं, वे ही सब उनके कार्यकाल में भी पल्लवित-पोषित होती रहीं। भाजपा शुरुआत से इन्हीं सब खामियों को मुद्दा बनाकर ममता को हटाने की लोगों से अपील करती रही है। युद्ध ममता और भाजपा के बीच ही है। कभी भारत के हर राज्य, हर खेत की मिट्टी में रची-बसी कांग्रेस अब यहां नाम मात्र की रह गई है। वामपंथियों का तो यहां पूरा कैडर ही एक तरह से तहस-नहस हो चुका है। पिछले चुनाव में भाजपा ने खूब ताकत लगाई थी। बहुत हद तक सफलता भी मिली लेकिन ममता से जीत नहीं पाई। इस बार उसे जीत की उम्मीद है। पंद्रह साल की एंटी इन्कम्बेन्सी भाजपा के लिए आशा बनी हुई है। हालांकि इतना आसान नहीं है। यहां भाजपा की दो ही दिक्कतें हैं- पहली भाषा और दूसरी लोकल लीडरशिप। भाजपा के स्टार प्रचारकों को बांग्ला बोलनी नहीं आती। यही वजह है कि भाषा के जरिए जो कनेक्ट बन सकता है, उसकी मुश्किलें साफ दिखाई देती हैं। दूसरा, वहां पार्टी के कैडर का कोई बड़ा लोकल चेहरा नहीं है। शुभेंदु अधिकारी जो तृणमूल कांग्रेस से ही आए हैं, वे ही भाजपा की मजबूरी बने हुए हैं। जीत किसकी होगी, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन है बड़ा कड़ा मुकाबला। 15 साल के तृणमूल राज में पल्लवित हुए उसके कार्यकर्ता ऐड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। आखिर उन्हें भी इतने सालों में सत्ता की लत तो लग ही गई है। वे हर हाल में जीतना चाहते हैं। भाजपा की तरफ से भी मेहनत में कोई कमी नहीं है। युद्ध जारी है! अमेरिकी श्रेय से पाकिस्तान को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। वैसे भी ट्रम्प के करीब जो भी गया, उसने मुंह की ही खाई है। कब मूड बदल जाए, कह नहीं सकते। जो भी हो, ईरान ने अमेरिका को नाकों चने तो चबवा ही दिए।

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