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फिल्मों का वह आम-सा सीन याद कीजिए, जब अस्पताल का स्टाफ किसी मरीज को तेजी से ऑपरेशन थिएटर में ले जाता है। तुरंत लाल लाइट जलती है और कैमरा उस लाइट, पास की घड़ी और बाहर खड़े परिजनों के चेहरों पर जाता है। चेहरों पर तनाव, एंग्जायटी और मानसिक थकान दिखती है। म्यूजिक डायरेक्टर भी कुछ ऐसा ही म्यूजिक बजाता है। जब तक लाल लाइट जलती है, कोई भी अंदर नहीं जा सकता। भीतर डॉक्टर शांति से काम कर रहा होता है। वह हाथ फैलाता है और नर्स उसे कैंची, कॉटन, उपकरण देती है। वह शरीर से गोली निकालता है। अंत में फिर से कॉटन, टांके लगाने का औजार और घाव बंद करने के लिए प्लास्टर मांगता है। इस पूरे समय में लाल लाइट जली रहती है और वहां एप्रन पहनी उस नर्स के अलावा कोई और नहीं आ सकता, जो ऑपरेशन की जरूरी चीजें लाने के लिए आती-जाती रहती है। इस लाल लाइट का मतलब है, ‘डॉक्टर को डिस्टर्ब मत करो’, क्योंकि उसे मरीज की जान बचाने के लिए फोकस चाहिए। अगले सीन में घड़ी कुछ घंटे आगे बढ़ चुकी होती है और डॉक्टर बाहर आकर परिजनों से बात करने के लिए मास्क हटाता है। ठीक ऐसा ही एक प्रयोग ‘फोकस ऑन-ऑफ : फ्यूल योर अटेंशन, गेट मोर डन’ किताब के लेखकों ने किया। उन्होंने ऑफिस के कर्मचारियों पर एक प्रयोग किया, जिसमें वे काम करते समय लाल लाइट जला सकते थे- जिसका मतलब था ‘डु नॉट डिस्टर्ब’। उनके पास हरी लाइट भी थी, जो दूसरों को बताती थी कि अब वो उनसे बात कर सकते हैं। जब प्रयोग समाप्त हुआ तो ज्यादातर सहकर्मियों ने पूरा दिन लाल लाइट जलाए रखी। यह बताता है कि लोग फोकस पाने के लिए कितने बेचैन हैं। लेखक ऑस्कर डे बॉस और मार्क टिगचेलार कहते हैं कि ओपन ऑफिस का कॉन्सेप्ट दरअसल ध्यान भटकाने वाली भूल-भुलैया जैसा है। आज ज्यादातर कंपनियां यही सोच रही हैं कि कर्मचारियों का फोकस कैसे बढ़ाया जाए। दोनों लेखक प्राइजवाटरहाउसकूपर, लोरियल और कई बड़े बैंकों व लॉ फर्मों के लिए सेशन आयोजित करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्क्रीन पर महज एक घंटे में हमारा ध्यान हैरतअंगेज तरीके से 77 बार बदल जाता है। हम एक से दूसरे टैब पर जाते रहते हैं और दिनभर में 74 बार इनबॉक्स देखते हैं। 2004 में स्क्रीन के एक काम में हम 2.5 मिनट तक ध्यान केंद्रित कर लेते थे, जबकि 2016 में 47 सेकंड से ज्यादा नहीं टिक पाए। 2026 का फोकस स्पैन अभी उपलब्ध नहीं, लेकिन लेखक आश्वस्त हैं कि हम में से ज्यादातर लोग किसी काम के बजाय बोरियत के चलते फोन को अधिक उठाते हैं। टेक्नोलॉजी, फोकस और स्ट्रेस पर अध्ययन करने वाली रिसर्चर और लेखिका ग्लोरिया मार्क के ये गंभीर निष्कर्ष हमारे अटेंशन स्पैन में आ रही कमी को बताते हैं। जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी हमारा ध्यान भंग कर रही है, समय खा रही है और सार्थक अनुभवों को कमजोर कर रही है, वैसे-वैसे थेरेपिस्ट सच में मायने रखने वाली चीजों पर लोगों का फोकस लौटाने के नए तरीके आजमा रहे हैं। चूंकि लगातार व्यवधानों की वजह से चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी, थकान, नींद की समस्या और कम आईक्यू जैसी कॉग्निटिव क्षमताओं में कमी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं तो हम इसे लेकर परेशान हैं कि स्क्रीन पर हमारा समय कहां उड़ जाता है। इसके लिए लोग थेरेपी ले रहे हैं, कंपनियां कर्मचारियों से फोकस बढ़ाने को कह रही हैं। हर कोई शर्मिंदा है कि एल्गोरिद्म हमेशा जीत रहा है और हम फोकस के साथ जीवन के जरूरी काम भी नहीं कर पा रहे। फंडा यह है कि एम्प्लॉयर्स उसी कर्मचारी को चाहेंगे, जो लाल लाइट जला कर या अन्य तरीकों से काम पर फोकस दिखा पाएगा। इन्क्रीमेंट का भविष्य फोकस पर टिका है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: फोकस पर ध्यान देकर इंक्रीमेंट को बढ़ाएं



