शशि थरूर का कॉलम: भारत में दुनिया की इनोवेशन- राजधानी बनने की क्षमता है Politics & News

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भारत को लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय व्यवसायों के लिए एक कम-लागत वाले बैक-ऑफिस के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा था। आज के संदर्भ में यह गलत साबित हो चुका है। भारत अब इंवेंशन, प्रोडक्ट-डेवलपमेंट और तकनीकी महत्वाकांक्षा के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक के रूप में उभर रहा है। भारत पहले ही उस स्थान के रूप में एक केंद्रीय भूमिका हासिल कर चुका है, जहां वैश्विक कंपनियां अपने उत्पाद विकसित करती हैं, लचीलापन बढ़ाती हैं और अपनी महत्वपूर्ण प्रणालियों का विस्तार करती हैं। इस कहानी की शुरुआत ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) के उदय से होती है, जिन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने दो दशक पहले स्थापित करना शुरू किया था। उनके कारण स्पष्ट थे- दक्षता बढ़ाना और लागत कम करना। अपने बड़े, शिक्षित और अंग्रेजी-भाषी वर्कफोर्स के कारण भारत जीसीसी का एक स्वाभाविक केंद्र बन गया। यहां भारतीय कर्मचारी दुनिया भर की कंपनियों के लिए नियमित आईटी कार्य और व्यावसायिक प्रक्रियाओं का संचालन करते थे। लेकिन भारतीय वर्कफोर्स की क्षमता इससे कहीं अधिक थी, इसलिए कंपनियों ने अधिक जटिल कार्य- जैसे एनालिटिक्स, समस्या-समाधान, साझा सेवाएं भी स्थानांतरित करने शुरू कर दिए। धीरे-धीरे जीसीसी केवल सहायक इकाइयां नहीं रहे; वे अब रणनीति बना रहे थे, परियोजनाएं डिजाइन कर रहे थे और बौद्धिक संपदा का सृजन कर रहे थे। आज भारत-आधारित जीसीसी की पहचान एंड-टु-एंड स्वामित्व से होती है, जहां भारतीय टीमें परिकल्पना से लेकर निर्माण, परीक्षण और डिप्लॉयमेंट तक हर चरण का नेतृत्व करती हैं। भारत में अब 1,800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनमें लगभग 20 लाख पेशेवर इंजीनियरिंग, फाइनेंस, लीगल, डिजाइन और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं। यह नेटवर्क एक शक्तिशाली इनोवेशन-चक्र तैयार करता है। आज यह स्थिति बन गई है कि सिलिकॉन वैली में जिस प्रोडक्ट की कल्पना की गई हो, उसे बेंगलुरु में विकसित किया गया हो, हैदराबाद में उसका परीक्षण किया गया हो, पुणे में उसे सुरक्षित रखा गया हो और कुछ ही दिनों में उसे वैश्विक स्तर पर डिप्लॉई किया जा सकता है। कम लागत का लाभ तो अब भी मौजूद है, लेकिन अब उससे भी बढ़कर जो चीज हो गई है, वह है इस सबकी स्पीड से मिलने वाला एडवांटेज। और यह सब गुणवत्ता से समझौता किए बिना हो रहा है। दुनिया की कुछ सबसे उन्नत एआई प्रयोगशालाएं और महत्वाकांक्षी सेमीकंडक्टर-डिजाइन टीमें आज भारत में स्थित हैं। भारत के लगभग 60% जीसीसी आज एजेंटिक एआई में भारी निवेश कर रहे हैं। ये मुख्य एंटरप्राइज़ प्रणालियां हैं। गोल्डमैन साक्स बेंगलुरु से लेकर वॉलमार्ट ग्लोबल टेक इंडिया तक, कई कंपनियों के भारत स्थित शैडो मुख्यालय आज उनके अधिकृत मुख्यालयों से भी अधिक तकनीकी गहराई रखते हैं। वास्तव में भारत का यह जीसीसी-बूम 1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद से सबसे परिवर्तनकारी आर्थिक विकासों में से एक है। इसने पेशेवरों का एक नया वर्ग तैयार किया है, जिनका कार्य बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण है, जो पारंपरिक सेवा-क्षेत्र की नौकरियों की तुलना में कहीं अधिक वेतन प्रदान करता है और वैश्विक नेतृत्व तक पहुंच के रास्ते खोलता है। इसका प्रभाव केवल टियर-1 शहरों तक सीमित नहीं है। टियर-2 और टियर-3 शहर- जैसे कोयम्बटूर, इन्दौर, कोच्चि, जयपुर, भुबनेश्वर, त्रिवेंद्रम आदि भी हाई-वैल्यू वर्क के केंद्र के रूप में उभर रहे हैं। इससे महानगरों पर दबाव कम होता है, साथ ही स्थानीय रियल एस्टेट बाजार, खुदरा अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में निवेश को भी प्रोत्साहन मिलता है। परिणामस्वरूप, भारत का आर्थिक मानचित्र अधिक संतुलित बन रहा है। आज यह स्थिति है कि सिलिकॉन वैली में जिस प्रोडक्ट की कल्पना की गई हो, उसे बेंगलुरु में विकसित किया गया हो, हैदराबाद में उसका परीक्षण किया गया हो, पुणे में उसे सुरक्षित रखा गया हो और कुछ ही दिनों में उसे वैश्विक स्तर पर डिप्लॉई किया जा सकता है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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शशि थरूर का कॉलम: भारत में दुनिया की इनोवेशन- राजधानी बनने की क्षमता है