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- N. Raghuraman’s Column: If You Are Interested In The Healthcare Industry, Focus On Digitization
37 मिनट पहले
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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
अगर आप कभी शनिवार को हेल्थ चेकअप के लिए गए होंगे, तो गौर किया होगा कि ये अस्पतालों में सर्वाधिक भीड़ वाला दिन होता है और रजिस्ट्रेशन काउंटर पर लंबी कतार देखकर आप निराश हुए होंगे। इसके दो कारण हैं :
1. कोई भी मरीज रविवार की छुट्टी ऐसे काम में नहीं खपाना चाहता। 2. रजिस्ट्रेशन काउंटर पर महज मरीज का टेलीफोन नंबर डाल कर उसका पुराना रिकॉर्ड निकालना आसान नहीं होता, इसलिए नाम, पता और बीमारी जैसी वही पुरानी एंट्रीज फिर डालनी पड़ती हैं। मुझे तो यह कहने का अधिकार नहीं, लेकिन मेडिकल इंडस्ट्री की एक जानी-पहचानी हस्ती ऐसा कहती हैं। अपोलो हॉस्पिटल, हैदराबाद की जॉइंट एमडी डॉ. संगीता रेड्डी ने हाल ही में आधिकारिक तौर पर कहा कि ‘डॉक्यूमेंटेशन, अलग-अलग सिस्टमों में जानकारी ढूंढने, एक ही एंट्री बार-बार करने में और बिखरे हुए वर्कफ्लो को प्रबंधित करने में समय खर्च होता है। यह बोझ कम होने पर क्लिनिशियन उस पर ध्यान दे सकेंगे, जिसे इनोवेशन या पैसा नहीं खरीद सकता और वह है- मरीजों पर ध्यान देना।’
केयर इंडस्ट्री की इस विख्यात प्रतिनिधि की सोच के मुताबिक स्थिति बहुत जल्द बदलने वाली है, क्योंकि भारत का हेल्थकेयर सेक्टर रिकॉर्ड्स को डिजिटाइज करने में बड़ी प्रगति कर रहा है। अगर आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन से जुड़े अकाउंट्स की बात करें तो 2026 तक 80 करोड़ हेल्थ रिकॉर्ड्स लिंक हो चुके हैं।
अगला कदम इस डेटा में और आंकड़े जोड़ना ही नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम बनाना होगा, जिसमें चिकित्सकों को तत्काल और कम मशक्कत के मरीज के पुराने रिकॉर्ड मिल सकेंगे और वो बेहतर निर्णय कर सकेंगे। ऐसा तभी होगा, जब सारे सिस्टम बैकग्राउंड में काम करते रहें। केयर इंडस्ट्री अब ऐसे यूनिफाइड डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ओर बढ़ रही है, जो ऑपरेशनल गैप्स को भरना आसान करता है।
हर अस्पताल जी-तोड़ कोशिश करेगा कि टेक्नोलॉजी उनके क्लिनिकल जजमेंट को मजबूत करे, डेटा सुरक्षा बढ़ाए, विभागों में तालमेल रखे और हर मरीज की केयर को निजी और सम्मानजनक बनाए रखे। इस स्तर तक पहुंचने के लिए सेंट्रलाइज्ड आइडेंटिटी और एक्सेस मैनेजमेंट सिस्टम को सुनिश्चित करना चाहिए कि अस्पताल में अलग-अलग विभागों के कर्मचारी सिर्फ उसी डेटा तक पहुंचें, जो उनके लिए जरूरी है।
मसलन, एक यूरोलॉजिस्ट के पास सिर्फ यूरिन टेस्ट रिपोर्ट ही नहीं, सोनोग्राफी रिपोर्ट की एक्सेस भी हो। एआई टूल्स लगातार निगरानी और नेटवर्क गतिविधियों का विश्लेषण करेंगे और सभी एप्लीकेशंस और डिवाइसेज में असामान्य व्यवहार को रियल-टाइम में चिन्हित करेंगे।
केयर इंडस्ट्री का भविष्य अब रिएक्टिव एप्रोच से फ्यूचरिस्टिक प्रिडिक्शन की ओर जा रहा है। यानी अगले 5-10 वर्षों में मरीज के साथ क्या हो सकता है और वह अभी से क्या प्रिवेंटिव केयर अपना सकता है। विदेशों में मरीजों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे हेल्थकेयर को अचानक आई बीमारी के वक्त का मासिक या अल्पकालीन खर्च न मानें, बल्कि अपनी प्रोडक्टिविटी और स्टेबिलिटी सुरक्षित रखने वाले दीर्घकालीन निवेश की तरह देखें।
‘रिएक्टिव’ से ‘प्रिडिक्टिव’ केयर की ओर आ रहे इस बदलाव ने तकनीकी विशेषज्ञों की भारी मांग पैदा की है। इसमें एआई और मशीन लर्निंग इंजीनियर्स, हेल्थ डेटा साइंटिस्ट्स, साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ, टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म विशेषज्ञ और इंटरऑपरेबिलिटी आर्किटेक्ट्स शामिल हैं। डिजिटाइजेशन का मतलब सिर्फ कोडिंग नहीं है।
इस प्रक्रिया में नए डिजिटल वर्कफ्लो को संभालने वाले इंसान भी चाहिए। इससे नॉन-आईटी प्रोफेशनल्स के लिए भी अवसर बन रहे हैं। इनमें क्लिनिकल इंफॉर्मेटिक्स स्पेशलिस्ट, डिजिटल हेल्थ प्रोडक्ट मैनेजर्स, मेडिकल स्क्राइब्स, डॉक्यूमेंट स्पेशलिस्ट, टेलीहेल्थ ऑपरेशंस लीड्स और हेल्थ इंश्योरेंस व क्लेम्स एनालिस्ट आते हैं। इस विकास में कुछ हाइब्रिड भूमिकाएं भी सामने आ रही हैं, जैसे एआई सेफ्टी ऑडिटर, ईएचआर इम्प्लीमेंटेशन स्पेशलिस्ट्स और हेल्थ डेटा मैनेजर।
फंडा यह है कि भले ही एआई आज हमारे साधारण काम करने को तैयार हो, लेकिन हेल्थकेयर सेक्टर बांहें फैलाए हमारे सामने खड़ा है। डिजिटाइजेशन को ध्यान में रखकर इसमें घुसिए और भविष्य बनाइए।
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एन. रघुरामन का कॉलम: हेल्थकेयर इंडस्ट्री में रुचि है तो डिजिटाइजेशन पर फोकस रखें



