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- N. Raghuraman’s Column: Why It Is Essential To Have Selfless And Sensible People Around Us
2 घंटे पहले
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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
लीवेई ने अपने बच्चों के लिए सब कुछ दे दिया। उन्होंने दिन-रात मेहनत की ताकि बच्चों को किसी चीज की कमी न रहे। उन्होंने अपना आराम छोड़ा, ताकि बच्चों को बेहतर जीवन मिले। जब बच्चे बड़े हुए, उनके अपने परिवार हो गए और स्वतंत्र जिंदगी जीने लगे तो ली को लगा कि अंतत: उनका आनंद से जीने का समय आ ही गया। वे अपना घर बेचकर बेटे के साथ रहने चले गए। उन्हें लगा कि भरे-पूरे परिवार, पोते-पोतियों के बीच उन्हें उत्साह और जुड़ाव मिलेगा।
लेकिन वैसी खुशी उन्हें कभी नहीं मिली। घर भरा था, लेकिन उनका मन खाली था। बच्चों को उनकी सलाह खलने लगी। उनकी मौजूदगी वहां व्यर्थ समझी जाती। उनकी बातें बेमन से सुनी जातीं। ली जितना करीब आने की कोशिश करते, बच्चे उतने ही दूर हो जाते।
जवाब की खोज में ली एक विद्वान संत के पास गए और पूछा कि ‘ऐसा क्यों है कि पूरी जिंदगी बच्चों के लिए समर्पित करने के बाद भी हम बुढ़ापे में अकेला महसूस करते हैं?’ उस संत, कन्फ्यूशियस (जन्म ईसा पूर्व 551-मृत्यु 479 ईसा पूर्व) ने ली को सांत्वना के बजाय तीन सहज सीख दीं।
सीख 1 : संत ने पानी से पूरा भरा एक फूलदान उठा कर पूछा, ‘बताओ, अगर इसमें और पानी डालूं तो क्या होगा?’ ली ने कहा, ‘यह छलक जाएगा’। कन्फ्यूशियस ने कहा ‘रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। जब हम खुद को पहले से भरी जगह में जबरन डालने की कोशिश करते हैं तो असंतुलन होता है। तुमने बच्चों को बड़ा करने के लिए घर बनाया, लेकिन तुम फिर से उसका केंद्र बनना चाहते हो। जबकि उनके घर का तो पहले से अपना केंद्र है। उनकी अपनी जिंदगी, अपने बच्चे हैं। तुम खुद को ऐसे बर्तन में डाल रहे हो, जिसमें जगह नहीं बची।’
सीख 2 : संत ने एक-दूसरे से बहुत नजदीक उगे दो पेड़ों को दिखाया। उनकी शाखाएं आपस में उलझी थीं, क्योंकि वे धूप के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। उन्होंने पूछा कि ‘जब पेड़ बहुत पास-पास उगते हैं तो क्या होता है?’ ली ने कहा, ‘वे एक-दूसरे में दखल देते हैं, प्रतिस्पर्धा करते हैं।’ कन्फ्यूशियस बोले ‘क्या वे मजबूत बनते हैं? नहीं, बल्कि कमजोर हो जाते हैं। जीवन भी ऐसा ही है। हम सोचते हैं कि बहुत नजदीकी ही एकता है। लेकिन जरूरत से ज्यादा नजदीकी तनाव लाती है। विकास के लिए स्थान होना आवश्यक है।’
सीख 3 : मुट्ठी में कस कर रेत भर कर कन्फ्यूशियस ने पूछा कि ‘अगर मैं इसे ऐसे पकड़ूं तो क्या होगा?’ ली बोले, ‘यह उंगलियों से होकर फिसलेगी।’ कन्फ्यूशियस ने कहा ‘इंसानी रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। प्यार और सम्मान दबाव में नहीं पनपते। इन्हें जितना कसकर पकड़ोगे, जितनी नजदीकी मांगोगे, ये उतने ही हाथ से निकल जाएंगे। आजादी दोगे तो जो वास्तव में तुम्हारा है, बना रहेगा।’ सबसे अहम इसे समझो कि ‘जब तुम एक पेड़ लगाते हो तो उम्मीद नहीं करते कि वह बुढ़ापे में तुम्हें छाया देगा। फिर बच्चों से अलग उम्मीद क्यों? तुमने उन्हें अपने लिए नहीं, दुनिया के लिए बड़ा किया है। दुनिया का उन पर तुम्हारे बराबर हक है।’
ली को बात समझ आई। वे अपने गृह नगर लौटे। स्कूल के पास छोटा घर किराए पर लिया और बच्चों की मदद करने लगे। उनसे अपना ज्ञान साझा किया, उन्हें सिखाया, उनके साथ पेड़ लगाए और कहानियां सुनाईं। जल्द ही लोग उन्हें ‘मास्टर’ कहने लगे। जितना उन्होंने खुद को कम थोपा, उतनी ही तारीफ पाई। जितना उन्होंने कम अटेंशन मांगा, उतना ज्यादा मिलने लगा।
एक दिन उन्हें बेटे का पत्र मिला- ‘डैड, बहुत समय हो गया। हमें आपकी याद आती है। बच्चे भी आपके बारे में पूछते हैं। मिलने आइए- रहने के लिए नहीं, बस साथ में समय बिताने के लिए।’ जब मास्टर वहां पहुंचे तो गर्मजोशी से स्वागत हुआ। कई वर्षों में पहली बार उन्हें ऐसा लगा कि वे बोझ नहीं, बल्कि वांछित मेहमान हैं। ली को समझ आया कि प्रेम की उम्मीद छोड़ दो, वो लौट कर आप तक आएगा।
फंडा यह है कि नि:स्वार्थ लोग जीवन की बड़ी से बड़ी मुश्किलों को आसानी से सुलझा लेते हैं। इसलिए इस सबक की भांति उनकी सीखें 2500 वर्षों तक और उसके बाद भी प्रासंगिक रहती हैं।
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