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लोग इस बात पर शोर मचा रहे हैं कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में शामिल है और हम नहीं हैं। ऐसा क्यों? क्या हम महत्वहीन हो गए हैं? क्या हमने अपनी नैतिक ताकत खो दी है? विपक्ष सरकार पर हमला करेगा, क्योंकि उसका काम ही यही है। सरकार भी इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि हम पाकिस्तान जैसे ‘दलाल’ देश नहीं हैं। सरकार कड़वी सच्चाई क्यों नहीं बोल सकती, इसे समझना आसान है। सच यही है कि भारत इस मामले में पूरी तरह तटस्थ नहीं है। वह अरब-इजराइल-अमेरिका के साथ है। ईरान के साथ भी भारत के अहम हित जुड़े हैं, इसलिए वह उसके खिलाफ नहीं जा सकता, लेकिन खुलकर उसके साथ भी नहीं खड़ा हो सकता। मामला जटिल है। जब यह युद्ध खत्म होगा, तब भी भारत के हित जीतने वाले और हारने वाले दोनों से जुड़े रहेंगे। इसी वजह से चीन ने कभी बीच-बचाव की कोशिश नहीं की और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे को उठाया। वो समझदार है। वो देख रहा है कि उसके प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे को कैसे कमजोर कर रहे हैं। चीन पुरानी भावनाओं में नहीं फंसा है। वह अपनी ताकत बढ़ा रहा है। जिसको ‘ग्लोबल साउथ’ कहा जाता है, उसमें उसने ‘बीआरआई’ (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) के जरिए लगभग 32 देशों को अपने साथ जोड़ लिया है, उन्हें ऊंचे ब्याज पर कर्ज देकर। चीन शांत है। अगर भारत को मध्यस्थता के लिए बुलाया भी जाए या वह सिर्फ संदेश पहुंचाने का काम करे, जैसा अभी पाकिस्तान कर रहा है, तब भी चीन ईर्ष्या में कोई कदम नहीं उठाएगा। उसे यह सब मजाक जैसा लगेगा, क्योंकि वह जानता है कि भू-राजनीति भावनाओं का खेल नहीं है। यह धैर्य और लंबे समय की योजना का मामला है। ताकत बनाने में समय लगता है और पूरा ध्यान उसी पर देना पड़ता है। पाकिस्तान ने एक मामले में शुरुआती बढ़त ले ली थी- रणनीतिक स्पष्टता में। हालांकि, इतिहास बताता है कि यह अकसर उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ। उसने अपनी पूरी रणनीतिक ताकत एक ही लक्ष्य पर लगा दी- भारत को कमजोर करना, अगर खत्म नहीं कर सके तो। कम्युनिज्म से लड़ने के लिए वह 1950 के दशक में ही अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधनों में शामिल हो गया। नेहरू ने इसे गंभीरता से लिया और अय्यूब खान से कहा कि कम्युनिस्ट चीन से दोनों को खतरा है। उन्हें उम्मीद थी पाकिस्तान भारत का साझेदार बनेगा, लेकिन जल्द ही पाकिस्तान चीन के करीब चला गया और सीमा तय करने में लग गया, जिसमें ज्यादातर सीमा कश्मीर के उस हिस्से से गुजरती थी, जो उसके कब्जे में है। इसका नतीजा यह हुआ कि 1960 के दशक तक पाकिस्तान अमेरिका और चीन के साथ जुड़ गया। उसका मकसद सैन्य ताकत से कश्मीर हासिल करना था। इसी सोच से उसने 1965 की लड़ाई लड़ी, लेकिन हार गया। मुल्क में असंतोष बढ़ गया। आखिरकार अय्यूब को सत्ता छोड़नी पड़ी और जुल्फिकार अली भुट्टो चुनाव हार गए। अवामी लीग ने बहुमत हासिल किया और पाकिस्तान के पहले असली चुनाव के नतीजों को मानने से इनकार कर दिया गया। फिर पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के साथ अपने रिश्तों का इस्तेमाल किया और जुलाई 1971 में हेनरी किसिंजर को गुप्त रूप से चीन ले गया। इससे दुनिया भर में हलचल मच गई, भारत भी चौंक गया। उस समय पाकिस्तानी नेता याह्या खान और भुट्टो खुद को बहुत सफल मान रहे थे, लेकिन पांच महीने के भीतर ही मुल्क का आधा हिस्सा अलग हो गया। असल में उस समय पूर्वी पाकिस्तान आबादी में पश्चिम पाकिस्तान से आगे था। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। कराची में भारत के महावाणिज्यदूत मणिलाल त्रिपाठी ने एक पाकिस्तानी अखबार के संपादक को चिट्ठी लिखकर मजाक में कहा कि क्योंकि पाकिस्तान की जनता ने ही पाकिस्तान के विचार को खारिज कर दिया है, इसलिए बचे हुए मुल्क का नाम बदल देना चाहिए : हम सिंधुदेश नाम सुझाते हैं। यह उस लेख के जवाब में था जिसमें कहा गया था कि भारत को खुद को इंडिया नहीं कहना चाहिए क्योंकि बंटवारे के साथ उसका अस्तित्व खत्म हो गया। उसे सिर्फ भारत कहना चाहिए। पाकिस्तान ने 1979 में फिर ऐसा ही कदम उठाया और अफगानिस्तान में सोवियत संघ का विरोध करने के लिए अमेरिका के साथ जुड़ गया। इससे उसे फायदा भी मिला, लेकिन लाखों शरणार्थी आए और जिहादी संस्कृति फैल गई। पाकिस्तान या ‘एफ-पाक’ में पनपे जिहादियों ने अमेरिका में ट्विन टावर्स पर हमला किया। 2001 में पाकिस्तान फिर अमेरिका का ‘मजबूत साझेदार’ बना और अगले दशक तक 22 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद पाता रहा, जब तक कि ओसामा को एबटाबाद में नहीं ढूंढ लिया गया और मदद रुक नहीं गई। इसके बाद उसके पास क्या बचा? जिहादी संस्कृति, जो उसकी अपनी सत्ता के लिए खतरा बनी; गहरे और हिंसक धार्मिक विभाजन; आत्मघाती हमलों का चलन और अफगानिस्तान से तालिबान के खिलाफ लड़ाई। 1954 के बाद के इन 70 वर्षों में जिन चार बड़े कदमों ने दुनिया का ध्यान खींचा, उन्होंने पाकिस्तान को और कमजोर और गरीब बना दिया; वहां की एकता कमजोर हुई; उसके सबसे लोकप्रिय नेता को जेल में डाल दिया गया और एक कठपुतली जैसा फील्ड मार्शल सत्ता संभाल रहा है। अगर वे सोचते हैं कि वे फिर कोई करिश्मा कर रहे हैं, तो उन्हें मुबारक। पाकिस्तान किसिंजर की उस मशहूर बात को सच साबित करता दिखता है कि अमेरिका से दुश्मनी खतरनाक हो सकती है, लेकिन उससे दोस्ती घातक है। भारत को अपनी सीमाओं को मजबूत करने और दुश्मनों में डर पैदा करने की ताकत बनानी होगी। यही इस क्षेत्र में शांति की गारंटी हो सकती है। यह पाकिस्तान के लिए भी बेहतर होगा क्योंकि डर पैदा करने की पारंपरिक ताकत ही उसे खुद को नुकसान पहुंचाने से रोक सकती है। इस पूरे तर्क का सार यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में शामिल होने का पाकिस्तान का ‘करिश्मा’ रणनीतिक नहीं अल्पकालिक है और उन्हें यह नहीं पता कि आगे क्या करना है। बिना राष्ट्रीय ताकत के कोई सामरिक कदम रणनीतिक नहीं बन सकता। अमेरिका से दुश्मनी के बजाय दोस्ती ज्यादा घातक होती है…
अमेरिका और ईरान के बीच पाक का बातचीत में शामिल होना रणनीतिक नहीं अल्पकालिक घटना है और उन्हें नहीं पता कि आगे क्या करना है। बिना राष्ट्रीय ताकत के कोई सामरिक कदम रणनीतिक नहीं बन सकता। वैसे भी अमेरिका से दोस्ती घातक है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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शेखर गुप्ता का कॉलम: पाकिस्तान को नहीं पता आगे क्या करना है


