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- Women In Naxalism: Struggle To Disillusionment | Shefali Shrivastava & Pankaj Shrivastava
1 घंटे पहले
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पिछले जुलाई में नक्सलियों की केंद्रीय समिति द्वारा कथित तौर पर जारी एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि पिछले एक वर्ष में एनकाउंटर्स में मारे गए 357 नक्सलियों में 136 महिलाएं थीं। यह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि इस प्रतिबंधित हिंसक आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाएं क्यों और कैसे शामिल हो रही हैं?
1960 के दशक में ‘नक्सलवाद’ की शुरुआत पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के ‘नक्सलबाड़ी’ गांव में हुई। यह गांव भूमिहीन किसानों द्वारा जमींदारों के विरुद्ध हिंसक विद्रोह की धुरी बना। 1980 के दशक में जब पीपुल्स वार नामक प्रतिबंधित संगठन के लोग बस्तर के जंगलों में पहुंचे तो स्थानीय आदिवासियों के मुद्दों के साथ-साथ उनकी महिलाओं से जुड़ी ऐसी कुछ प्रथाएं और समस्याएं सामने आईं जिसने उन्हें महिलाओं को जोड़ने का मौका दे दिया।
भारत में अनेकों पितृसत्तात्मक समाज की भांति इस क्षेत्र के आदिवासी समाज में भी पुरुषों और महिलाओं की परिवार और समाज में स्थितियों में अंतर विद्यमान रहा है। नक्सलियों ने इसका फायदा उठाया।
समाज में व्याप्त अंतर विरोधों को पहचानने और उन्हें मुद्दा बनाकर असंतुष्ट लोगों को अपने से जोड़ने में माहिर विद्रोहियों ने महिलाओं की अस्मिता से जुड़े मुद्दों को उठाना आरंभ कर दिया, जैसे कुछ समाजों में 1980 के दशक में यह कुप्रथा व्याप्त थी कि विवाहित महिलाएं ब्लाउज नहीं पहन सकतीं। इस कारण महिलाओं को शर्मिन्दगी उठानी पड़ती थी। इस मुद्दे को नक्सलियों ने एक अभियान की तरह चलाया एवं अनेक महिलाएं उससे जुड़ती चली गईं।
पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ मार-पिटाई आदि का भी विरोध मुखर हो गया। आदिवासी महिला संगठन, नाट्य मंच इत्यादि नक्सली संगठनों के झंडे के नीचे महिलाएं एकत्रित होने लगीं। परिवार में पुरुष सदस्यों के नक्सल आंदोलन में जुड़ने से प्रेरित होकर महिलाएं भी जुड़ने लगीं।
चूंकि महिलाएं परिवार की धुरी रहती हैं, अत: जब परिवार का पुरुष नक्सली पकड़ा जाता है या एनकाउंटर में मारा जाता है तब महिलाएं बढ़-चढ़कर इन घटनाओं का विरोध करती हैं। सलवा जुडूम के दौर में भी बड़ी संख्या में महिलाएं इस हिंसक आंदोलन से जुड़ीं।
माओवादी विचारधारा में सतह पर दोनों लिंगों को समानता देना, अवैध जन अदालतों में त्वरित फैसले सुनाना, हथियार चलाने का रोमांच, दल का सदस्य होने पर भोजन मिलना, कभी-कभी कुछ धनराशि प्राप्त होना, एक-दूसरे का सहारा बनने की अनुभूति, समाज में वर्चस्व, इन सबने महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाया और इस तरह महिलाएं इस आंदोलन से जुड़ीं।
नक्सलियों के नारे जैसे ‘महिलाएं आधे आसमान की मालकिन हैं’, ’नक्सलवाद हमारा परिवार है,‘ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाना है एवं महिलाओं के सभी कार्यों में बढ़-चढ़कर भागीदारी इन सबने भी महिलाओं को इस आंदोलन की ओर आकर्षित किया है।
कई युवतियां हथियारों का प्रशिक्षण लेकर इनकी गुरिल्ला सेना में शामिल हो गई। महिलाएं न केवल युवक लड़ाकों के साथ मिलकर हमले करने और सशस्त्र लड़ाइयों में भाग लेती हैं बल्कि जंगल के जीवन की रोज की जिम्मेदारियों जैसे खाना बनाना, संतरी की ड्यूटी करना और ग्रामीणों विशेषकर ग्रामीण महिलाओं की मीटिंग लेकर अपनी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती हैं। परन्तु यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि महिलाओं की भागीदारी इस प्रतिबंधित संगठन में निचले स्तर या मध्यम स्तर तक ही रही है। ऊंचे पदों पर कम ही महिलाएं पहुंच सकी हैं।
प्रसिद्ध सायकोलॉजिस्ट फ्रायड के अनुसार, चूंकि महिलाएं शारीरिक तौर पर कमजोर होती हैं इसलिए उनका शारीरिक शोषण होना निश्चित है। स्वेच्छा से नक्सल आंदोलन से जुड़ी महिलाएं इस शोषण का प्रतिरोध नहीं कर पा रही हैं।
अंत में यह कहा जा सकता है कि शुरुआत में बदलाव की चाह से अनेकों महिलाओं ने बढ़-चढ़कर नक्सल आंदोलन में भाग लिया, परन्तु कुछ वर्षों पश्चात ही धीरे-धीरे यह जुनून अब उतरने लगा है। विगत कुछ समय में महिलाओं ने बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों के सामने आत्मसमर्पण किया है।
सरकारों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास की उदार नीति ने महिलाओं को हथियार छोड़कर वापस अपने गांव और परिवार के बीच आने का मौका दिया है। इसके अलावा अनेक सुविधाएं जैसे राशन, स्कूल, अस्पताल, जचकी, चिकित्सा की सुविधा एवं सम्मानपूर्वक जीवन शैली को बढावा दिया जाने लगा है।
इसके परिणामस्वरूप कई महिला नक्सलियों का मोह भंग होना शुरू हो गया और वह समाज की मुख्यधारा में वापस आ रही हैं। आधी दुनिया के इस विचलन की सामाजिक मानव शास्त्रीय दृष्टिकोण से और अध्ययन करने की आवश्यकता है।
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डॉ. शेफाली श्रीवास्तव और पंकज श्रीवास्तव का कॉलम: संघर्ष से मोहभंग तक; नक्सलवाद में महिलाओं की भूमिका और वापसी


