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तमिलनाडु लंबे समय से आध्यात्मिक भूमि रहा है। प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, गहरी समावेशी भावना और अद्वितीय बुद्धिमत्ता से संपन्न हमारे तमिल प्रदेश ने पूरे देश के धर्मों को खुलेपन के साथ अपनाया और उन्हें पोषित किया। यही कारण है कि तमिलनाडु के लोगों ने जैन धर्म को सहज भाव से अपनाया, जिसका जन्म वर्तमान बिहार में हुआ था। तमिल हमेशा धर्म को जीवन के मूल आधार के रूप में मानते आए हैं और उन्होंने ऐसे धर्मों को स्वीकार और समाहित किया है, जो इस बात को महत्व देते थे। जब जीवन की परिकल्पना अरम (सदाचार), पोरुल (धन) और इनबम (सुख) के सामंजस्यपूर्ण प्रयास के माध्यम से की जाती है, तो धन और सुख केवल सदाचार के मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किए जाने चाहिए। ‘अरथोडु नित्रल’- धर्म का अडिग पालन- जीवन के मूल व्याकरण का निर्माण करता है। तमिलनाडु के लोगों का हमेशा से यह मानना रहा है कि बिना सदाचार के धन की चाह रखना और बिना धर्म-परायणता के सुख-भोग करना अनुचित है। भले ही समाज में ऐसी प्रथाएं मौजूद रही हों, लेकिन उन्हें कभी भी परंपरा का हिस्सा नहीं माना गया। हमारी सभ्यता ने ऐसे नियम बनाए, जिनसे साहित्य द्वारा भी ऐसे आचरण का समर्थन न करना सुनिश्चित हो पाया- यह सिद्धांत प्राचीन ग्रंथ ‘तोलकाप्पियम’ में भी परिलक्षित होता है। भगवान महावीर ने शिक्षा दी कि ‘त्रिरत्न’- सम्यक दर्शन (सही विश्वास), सम्यक ज्ञान (सही ज्ञान) और (सम्यक आचरण)- ही जैन धर्म का मूल आधार है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि तमिलनाडु के लोगों ने- जो ऐसे नैतिक आदर्शों को बहुत महत्व देते थे- इस महान परंपरा का पूरे उत्साह के साथ स्वागत किया। भारत की सबसे प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में से एक होने के नाते जैन धर्म अहिंसा, सत्य, तपस्या और त्याग के नैतिक सिद्धांतों पर आधारित है। भगवान महावीर ने मानवता के उत्थान के लिए बारह वर्षों की गहन तपस्या से प्राप्त अपनी ज्ञान-संपदा को लोगों के साथ साझा किया। उनका शाश्वत संदेश स्पष्ट और अडिग था- मोक्ष केवल धर्म के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलने से ही प्राप्त किया जा सकता है, किसी अन्य माध्यम से नहीं। आश्चर्य की बात नहीं कि जैन धर्म दान पर जोर देता है, जो तमिल लोगों के स्वभाव के अनुरूप करुणापूर्ण लोकाचार के साथ गहराई से जुड़ा है। तमिलनाडु में जैन धर्म के प्रसार का प्रमुख कारण यह था कि इसकी शिक्षाएं तमिल भाषा में लोगों तक पहुंचाई गईं। जैन विद्वानों ने धर्मग्रंथों की रचना अपने कार्यक्षेत्र की मातृभाषाओं में करने का विकल्प चुना; इस प्रकार उन्होंने अपने दर्शन को आम लोगों के लिए सुलभ बना दिया। तमिल साहित्य में उनका योगदान अतुलनीय है। प्राचीन तमिल साहित्य में जैन विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। संगम काल के दौरान, ‘पुरनानूरु’ के कवि पक्कुडुक्कई नंकानियार ने कहा था, ‘यह संसार दु:ख और सुख का एक अप्रत्याशित मेल है, फिर भी जो लोग इसकी प्रकृति को समझ लेते हैं, वे इसमें निहित माधुर्य को भी पहचान लेते हैं।’ यह जैन दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करता है कि सुख और दु:ख जीवन के अभिन्न अंग हैं और सच्ची बुद्धिमत्ता इसी वास्तविकता की पहचान करने में निहित है। इसी प्रकार, कनियान पुंगुंद्रनार की प्रसिद्ध कविता ‘याधुम ऊरे, यावरुम केलिर’ एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण व्यक्त करती है- कि सभी स्थान अपने ही हैं और सभी लोग अपने ही बंधु-बांधव हैं; साथ ही, अच्छा और बुरा किसी और के कारण नहीं होता, बल्कि हमारे अपने कर्मों से ही निर्धारित होता है। कर्म के सिद्धांत पर आधारित यह गहन विचार जैन दर्शन के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। यही कारण है कि कनियान पुंगुंद्रनार को अकसर एक जैन कवि माना जाता है। ‘सिलप्पथिकारम’, ‘जीवक चिंतामणि’, ‘वलैयापति’ और ‘नालादियार’ जैसी कालजयी रचनाएं तमिल साहित्यिक विरासत के ऐसे स्थायी स्तंभ हैं, जिन पर जैन दर्शन की अमिट छाप है। आज तमिलनाडु में चालीस हजार से अधिक तमिलभाषी जैन रहते हैं, जो इस प्राचीन विरासत के साथ जीवंत संबंध बनाए हुए हैं। ‘दक्षिण की काशी’ कांचीपुरम को अकसर तीन अलग-अलग क्षेत्रों में बांटा जाता था- शिव कांची, विष्णु कांची और जैन कांची। इनमें से अंतिम क्षेत्र तिरुपरुत्तिकुनरम का इलाका है, जहां भगवान महावीर और भगवान चंद्रप्रभ के मंदिर हैं। यहां जैन भिक्षुओं ने धर्म, शिक्षा और समाज के क्षेत्रों में अमूल्य सेवाएं दी हैं। तिरुप्पुर जिले में जन्म लेने और वहीं पले-बढ़े होने के नाते, मेरे क्षेत्र की जैन विरासत के साथ मेरा एक गहरा और व्यक्तिगत संबंध भी है। भगवान महावीर के जन्म के इस पावन अवसर पर, आइए हम धर्मपरायणता, करुणा और शांति के मार्ग पर चलने के अपने संकल्प को पुनः दोहराएं। आज तमिलनाडु में चालीस हजार से अधिक तमिलभाषी जैन रहते हैं, जो इस प्राचीन विरासत के साथ एक जीवंत संबंध बनाए हुए हैं। प्राचीन तमिल साहित्य में भी जैन विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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सी.पी. राधाकृष्णन का कॉलम: जहां आध्यात्मिकता का परम्परा से मिलन होता है

