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यदि मैं आपसे पूछूं कि आपके जीवन में किन-किन चीजों की कमी है, तो आपकी सूची कितनी लंबी होगी? मेरी तो बहुत लंबी है। सबसे पहले तो मुझे कावेरी नदी की कमी खलती है। 60 से 90 के दशक के बीच यह बारहों महीने बहने वाली नदी हुआ करती थी, लेकिन अब यह कभी-कभी सूख जाती है। मुझे लगता था कि तमिलनाडु के कुम्भकोणम स्थित मेरे गृहनगर में यह हमेशा यूं ही लबालब बहती रहेगी। मुझे वह पोंगल भी बहुत याद आता है, जो मुझे हर सुबह 6 बजे कावेरी के किनारे स्थित गणपति मंदिर में प्रसाद के रूप में मिलता था। नदी में तैरने के बाद उस गरम पोंगल का स्वाद दो कारणों से हमेशा दिव्य लगता था- एक, तैरने से भूख बढ़ जाती है और दो, भगवान का आशीर्वाद उनके प्रसाद को और स्वादिष्ट बना देता है। मुझे वह वडा-सांभर भी याद आता है, जो बचपन में रविवार को मेरे नाना मुझे खिलाते थे। वेंकटा लॉज नाम के एक रेस्तरां में वह एक आने (छह पैसे) का मिलता था। वहां वेटर एल्युमीनियम की एक बाल्टी लेकर खड़ा रहता था और वह बिना मुंह बनाए जितना चाहो उतना सांभर परोस देता था। ये मेरे जीवन के छोटे-छोटे आश्चर्य थे। मैंने हमेशा इन्हें हल्के में लिया, लेकिन आज जब मैं अतिरिक्त सांभर की एक छोटी कटोरी के लिए 5 रुपये देता हूं, तो मुझे वह बाल्टी और उस वेटर का चेहरा याद हो आता है। समय के साथ ये सब धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में विलीन हो गए। वह रेस्तरां अभी तक अपने मूल मालिकों के बाद तीन नए मालिक देख चुका है, और नए मालिक के बच्चे इसे किसी और बिजनेस में बदल सकते हैं। इससे और बड़े स्तर पर मुझे अरब सागर और उसके समुद्र तटों की कमी खलती है। ऐसा नहीं कि समुद्र कहीं चला गया है- वो अब भी वहां मौजूद है- लेकिन मेरा काम मुझे अकसर- यहां तक कि रविवार को भी- उस समुद्रतटीय-मुम्बई से दूर ले जाता है, जहां मैंने रहने का चयन किया है। लोग जीवन के आश्चर्यों को हल्के में लेते हैं। लेकिन वे हर रूप और आकार में हमारे सामने आते हैं। बड़े आश्चर्य विस्मयकारी हो सकते हैं, लेकिन छोटे आश्चर्यों से हमारा जीवन बनता है। हमारी जीवन-यात्रा का दु:खद पहलू यह है कि इन छोटे-छोटे आश्चर्यों की गुम हो जाने की बुरी आदत होती है। गांव की छोटी-छोटी झोपड़ियों का सड़क किनारे बने प्रवेश-द्वार वाले दो-तीन मंजिला कंक्रीट के ढांचों में बदल जाना एक ग्रामीण सौंदर्य को हमसे दूर ले गया है- नगर पालिका की बस के तेज गति से गुजरने पर उड़तीं मुर्गियां; सुबह के समय ताजे भोजन की प्रतीक्षा में घर के बाहर बैठी गाय; इधर-उधर सुस्ताता, अपने पैरों को खींचता और कभी-कभी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए भौंकता कोई कुत्ता; गुजरती हुई साइकिलों की घंटियों की आवाजें और बाहर खड़े दशकों पुराने पेड़ पर चहचहाते पक्षी। हाल ही में जब मेरी बेटी आई तो मैं उसे विशेष रूप से नागपुर में अपने स्कूल ले गया और उसे उसी बेंच पर बैठाया, जहां मैं पढ़ता था। मैंने उससे स्कूल के बाहर टोकरी लेकर बैठी बुजुर्ग महिला से बेर खरीदवाए। उससे एक छोटे-से हनुमान मंदिर के सामने उसी तरह खड़े होकर प्रार्थना करवाई, जैसे मैं परीक्षा देने से पहले किया करता था। और उसे यह सब बहुत पसंद आया। अतीत की याद जगाने वाली जगहों के बारे में भावुक हो जाना और उनकी स्मृति को जीवन भर संजोए रखना सहज है। उम्र बढ़ने के साथ मुझमें यह प्रवृत्ति और गहराती चली गई है। यही कारण है कि जीवन के छोटे-छोटे आश्चर्यों को पहचानना और जहां तक संभव हो, उन्हें संजोए रखना बहुत जरूरी है। एक उदासीन, अनाम दुनिया और एक ऐसी दुनिया, जिसमें जीवन और मौलिकता की दमक हो और जिसे जीने का आनंद लिया जा सके- इन दोनों में बहुत फर्क है। लेकिन याद रखने वाली इकलौती बात यह है कि गांव के स्कूलों के बाहर बेर बेचने वाली बुजुर्ग महिला केवल नकद ही स्वीकार करेगी, क्योंकि वह सीमित लाभ पर काम करती है और डिजिटल भुगतान लेकर कमीशन नहीं दे सकती। फंडा यह है कि हमारे स्थानीय, छोटे-छोटे आश्चर्यों को हल्के में न लें। रविवार को बच्चों को साथ ले जाएं और उन्हें दिखाएं कि आप इन आश्चर्यों के बीच कैसे बड़े हुए हैं!
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एन. रघुरामन का कॉलम: हमारे जीवन के छोटे-छोटे आश्चर्यों को हल्के में न लें




