पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: संतुलित, मीठे और अर्थपूर्ण शब्द बोलें तो ये भी पूजा है Politics & News

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विवेकानंद कहते थे आपके शब्द आपके व्यक्तित्व के प्रतिनिधि हैं। वैसे तो आदमी आजकल ये कला सीख गया है कि बनाकर बात कैसे करना। तो भीतर कुछ और चल रहा है और बाहर बहुत मीठे शब्द बोले जा रहे हैं। लेकिन लंबे समय ऐसा चलता नहीं है। तो अध्यात्म कहता है- जो बोलो, दिल से बोलो। हृदय स्वच्छ रहता है तो वाणी भी पवित्र होगी। शब्दों में गजब की ताकत है। आप भीतर से जैसे हैं, वैसे ही शब्द बोल रहे हैं तो आपका आत्मबल और बढ़ जाएगा। आप शांत महसूस करेंगे। धीरे-धीरे नई पीढ़ी की शब्दावली और भ्रमित होने वाली है। विकृति की ओर तो चल ही रही है। सोशल मीडिया पर जो संदेश आदान-प्रदान होते हैं, उन्हें केवल आंखों से नहीं पढ़ा जा रहा, वे कानों से भी भीतर उतर रहे हैं। चूंकि उनमें सत्य नहीं होता, दुष्प्रचार होता है, लोगों को भ्रम में डालने के लिए आकर्षण होता है, इसलिए कम से कम अपने भीतर के शब्दों पर काम करिए और संतुलित, मीठे, अर्थपूर्ण शब्द ही बोलिए। ये भी अपने में एक पूजा और मेडिटेशन है।

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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: संतुलित, मीठे और अर्थपूर्ण शब्द बोलें तो ये भी पूजा है