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कच्ची घाणी। अब तो इसके लिए भी आधुनिक तरीके, मशीनें आ गई हैं। लेकिन पहले कोल्हू होता था और कोल्हू का बैल। जी, हम सब कच्ची घाणी के या कोल्हू के बैल ही तो हैं! कोल्हू चलता था तो ‘चक चूं’ करता था। बैल बस, सारी उम्र चलता रहता था। साल, महीने गिने बिना। गोल-गोल घूमता फिरता था। गले की घंटी बजती रहती थी, जिससे उसे लगता था कि इस गोल-गोल दुनिया के सिवाय भी कुछ है। जैसे आवाज, घंटी की या शोर किसी और चीज का। इसी धुन में, इसी भ्रम में, खींचता रहता था पुल्ली को। बीज सभी पिसते रहते थे। तेल निकलता रहता था। पीछे से चाबुक पड़ता था जब, खाल उधड़ जाती थी। कितने हजार मील चलता था, फिर भी वहीं पर। उसी जगह! मालिक तेल बाजार में बेचता था। बैल का कोई हिस्सा नहीं! यही तो है जिसका दु:ख है। तेल किसी का। खाल किसी की। उसके लिए बस सूखी घास! यू ही तो चलता है दुनिया का कोल्हू, बैल बनाकर आदमी को! जोत दिया है खांचों में। रातें लम्बी होती जा रही है। सांसें सिकुड़ रही हैं। जैसे कोई होली में अभ्रक छिड़क गया हो! अमेरिका वाले कोल्हू मालिक डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी जिद के कारण दुनियाभर को एक अजीब संकट में डाल दिया है। ईरान से युद्ध का हालांकि कोई ठोस कारण नहीं था लेकिन बिना उद्देश्य के हमला बोल दिया। ठीक है, आप ताकतवर हो, कुछ भी कर सकते हो, लेकिन कुछ तो भी मत करिए। क्या मिला आपको? होर्मुज के कारण पूरी दुनिया परेशान है। उनके जहाज निकल नहीं पा रहे। उनकी भैंसे-गाएं अपने खूंटों से बंधी रंभा रही हैं। मतलब सैकड़ों जहाज, एलपीजी गैस और कच्चा तेल लादकर खड़े हुए हैं। उनके लिए कोई रास्ता नहीं। कोई जगह नहीं। जाएं तो जाएं कहां? किससे कहें? किसकी सुनें? कुछ समझ नहीं आ रहा। दुनिया का थानेदार बनने या बने रहने की आकांक्षा या महत्वाकांक्षा ही है, जिसने ट्रम्प को आंदोलित किया होगा या इजराइल को उकसाया होगा। वरना तेल के सिवाय इस दुनिया में लालच ही क्या बचा है? वैसे इजराइल अपना मकसद अच्छी तरह जानता है। वो अपना विस्तार करने में या विस्तार करने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। लेबनान पर हमले और उसकी जमीन हथियाने के मामलों से चीजों को समझा जा सकता है। लेकिन इस समूचे पुलिस कर्म में अमेरिका का क्या हित है? वैसे भी अमेरिका के लिए ईरान में तेल के सिवाय रक्खा ही क्या है? इजराइल तो हमेशा से लड़ता रहा है और लड़-लड़कर ही उसने जमीन हथियाई है लेकिन अमेरिका अपना अरबों का नुकसान करने के बावजूद इस युद्ध में शामिल क्यों है, ये समझ से परे है। इधर भारत में हालांकि सरकार तमाम प्रयास कर रही है, लेकिन फिर भी तेल और रसोई गैस की किल्लत तो हर हाल में महसूस हो रही है। होने लगी है। अगर ईरान से युद्ध एक महीने और चला तो हो सकता है भारत में फिर से लॉकडाउन की नौबत आ जाए! हवाई यात्राएं बंद हो जाएं! सड़क पर वाहन चलाना सीमित हो जाए। लेकिन भारत हार मानने वाला नहीं है। दुनियाभर में जब 2008 में मंदी आई थी तब भी भारत पर उसका असर लगभग शून्य रहा था। कोविड के वक्त भी दुनियाभर को हमने वैक्सीन दी। दरअसल, भारत की परम्पराएं, उसके रीति-रिवाज उसे हर हाल में जिंदा रखते हैं। यही वजह है कि दुनिया के किसी भी और किसी भी तरह के संकट का असर हम पर नगण्य होता है। घर आए मेहमान को या उसके बच्चे को पैसे-रुपए देना, भारत के सिवाय दुनिया में कहीं नहीं होता! इस इकोनॉमी का पर्याय या विकल्प भला दुनिया में और कहीं कहां है? हम अमेरिका की तरह पेंशन कार्ड तक से उधार लेकर चबा जाने वाले लोग नहीं हैं। हम बचत में माहिर हैं। बचत करना हमारे जीन में है। पेट काटकर भी पैसा बचाते हैं। यही वजह है जिसके कारण भारत को महान कहा जाता है। इसीलिए हम महान हैं भी। अमेरिका इस युद्ध में क्यों?
अमेरिका के लिए ईरान में तेल के सिवाय रक्खा ही क्या है? इजराइल तो हमेशा से लड़ता रहा है और लड़-लड़कर ही उसने जमीन हथियाई है। लेकिन अमेरिका अपना अरबों का नुकसान करने के बावजूद युद्ध में क्यों है, समझ से परे है। इस तरफ मौसम पर आएं तो यहां युद्ध का तनाव तो दिख रहा है लेकिन बेमौसम बारिश ने सबकुछ थोड़ा आसान कर दिया है। ठंडा कर दिया है। मौसम, गर्मी का न सही, लेकिन बरसात का तो नहीं ही है। फिर भी मेह बरस रहा है। गर्मी के मुहाने ठंडक दस्तक दे रही है। रात को जब सोते हैं, पता नहीं चलता बारिश कब हुई, लेकिन सुबह जब सड़क गीली दिखती है तो समझ नहीं आता कि रात को बारिश हुई थी या सड़क को पसीना आया है!
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नवनीत गुर्जर का कॉलम: तुम सौदागर तेल के, हम कोल्हू के बैल!



