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- Pandit Vijay Shankar Mehta Column: Tradition Offers Shade In Worldly Sun
2 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
प्रकृति ने सुख और दु:ख का संतुलन दे रखा है। इंसान न तो केवल सुख पचा पाएगा, और न ही दु:ख। समझदारी इसी में है कि दोनों को लेकर चलें। कथा सुनने के बाद गरुड़ जी ने काकभुशुंडि जी से कहा था- जो अति आतप ब्याकुल होई, तरु छाया सुख जानइ सोई।
जो धूप से अत्यंत व्याकुल होता है, वही वृक्ष की छाया का सुख जानता है। आज हमारी युवा पीढ़ी की जो जीवनशैली है, वो भविष्य में उनको और परेशान करने वाली है। और यह भारत में ही है, ऐसा नहीं है।
रूस की सीमा से लगा एक देश है एस्टोनिया, जिसकी राजधानी का नाम है टालिन। मैं सुंदरकांड पर वहां बोल रहा था तो वहां के एक निवासी ने बताया राष्ट्रभक्ति और परिवार के प्रति जिम्मेदारी यहां की युवा पीढ़ी में कम हो गई है।
मैंने पूछा आप निदान क्या निकाल रहे हैं? इसका उनके पास कोई उत्तर नहीं था। लेकिन हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारे पास एक परम्परा है, संस्कृति है। तो क्यों ना हम अपने बच्चों को शास्त्रों से जोड़ें, जो सांसारिक धूप में छांव का काम करेंगे।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: सांसारिक धूप में छांव का काम करती है हमारी परम्परा




