एन. रघुरामन का कॉलम: परिपक्व संगठन हमेशा पूछते हैं कि ‘क्या हो सकता है’, न कि ‘क्या हुआ’ Politics & News

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जो गुड़ी पड़वा उत्सव का दिन होना था, वह इंदौर शहर के लिए शोक का दिन बन गया। बुधवार को एक घर में लगी आग में मारे गए सात लोगों की चिताएं जब एक साथ जलीं तो इसकी पीड़ा पूरे शहर को सामूहिक तौर पर महसूस हुई। मृतकों में एक मासूम भी था। इस दर्दनाक हादसे के दिन मध्यप्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुपम राजन ने कहा कि ‘राज्य का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। हम आईआईटी और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से एक व्यापक फॉरेंसिक जांच करेंगे। ईवी विशेषज्ञों की बैठक भी बुलाई जाएगी, ताकि समझा जा सके कि चार्जिंग के दौरान ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं और इसके पीछे कौन-सी विशेष तकनीकी खामियां हैं।’ ऐसे बयान सोचने को मजबूर करते हैं कि क्यों अधिकतर संगठन शायद ही कभी इस पर चर्चा करते हैं कि ‘क्या हो सकता है’ और वे ‘क्या व क्यों हुआ’ पर ही क्यों अधिक ध्यान देते हैं। ज्यादातर बैठकों के एजेंडा में राजस्व अनुमान और उन्हें हासिल करने के तरीके, ऑपरेशनल टारगेट्स और उन्हें बढ़ाने के उपाय, एक्सपांशन प्लान्स और प्रोजेक्ट जल्दी पूरा करने की रणनीति को ही शामिल किया जाता है। और आखिर में सेल्स डिपार्टमेंट के वेंडर नेगोशिएशन, जहां चर्चा होती है कि उन्हें कम मार्जिन पर कैसे राजी करें। अधिकतर बैठकों में एक पैमाने पर चर्चा छूट जाती है, वह है ‘जोखिम’। कड़वी सच्चाई है कि ज्यादातर संगठन जोखिम के बजाय मुनाफे पर बारीकी से नजर रखते हैं और मैनेजमेंट की भाषा में इसे ‘खतरनाक असंतुलन’ कहा जाता है। एक बोर्डरूम की कल्पना कीजिए, जहां शीर्ष नेतृत्व बैठा है और अचानक टीम मेम्बर्स से पूछता है कि ‘इस तिमाही के लीडिंग सेफ्टी इंडिकेटर्स क्या हैं?’ यकीन मानिए, चंद पलों के लिए कमरे में सन्नाटा पसर जाएगा। चूंकि जवाब तो देना है तो कोई कहेगा कि ‘सर, हम सेफ्टी कंप्लायंट हैं’। दूसरे कहेंगे ‘सर, कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ।’ लेकिन यह तो लीडर का सवाल था ही नहीं। उसने पिछली घटनाओं के बारे में नहीं, बल्कि भविष्य के जोखिमों के बारे में पूछा था। अच्छे संगठन आम तौर पर यह आकलन करते हैं कि क्या हो सकता है और उसे कैसे टाल सकते हैं। मसलन, गर्मियों में बिजली बोर्ड की बैठकों में शहर में संभावित जोखिम और उसे टालने के उपायों पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन अकसर बिजली बोर्ड आपदा आने के बाद उससे निपटने वाले फायरफाइटर्स की तैयारियां करता है। सेफ्टी मैट्रिक्स दो तरह के होते हैं। 1. लैगिंग इंडिकेटर्स : इसमें घटनाओं की संख्या, मौत और घायलों की संख्या और अंतिम नुकसान शामिल होता है। 2. लीडिंग इंडिकेटर्स : यह खतरों की पहचान, सामने आई छोटी-सी चूकें, सेफ्टी ऑडिट्स की संख्या, सेफ्टी ट्रेनिंग का समय और अंतत: ड्रिल परफॉर्मेंस के अंकों की बात करता है। अधिकतर परिपक्व संगठन महज हादसों को नहीं मापते, क्योंकि वह तो विफलताओं का रिकॉर्ड और पोस्टमार्टम जैसा है। वे हमेशा अपने सिस्टम की ताकत मापते हैं, क्योंकि इसी से रोकथाम की क्षमता आंकी जा सकती है। वे रिव्यू मैकेनिज्म बनाते हैं, कठिन सवाल पूछते हैं और उस चीज को मापते हैं, जो कीमत चुकाए जाने से पहले सच में मायने रखती है। अगर नेतृत्व ‘सिस्टम हेल्थ’ की नियमित समीक्षा नहीं करता तो जोखिम चुपचाप बढ़ता रहता है और अंतत: एक दिन पूरा सिस्टम ढह जाता है। ऐसी घटनाएं पूर्व चेतावनी नहीं देतीं, बल्कि सीधे सुर्खियां बनती हैं। लैगिंग सेफ्टी मैट्रिक्स हमें केवल नुकसान बताते हैं, जबकि लीडिंग सेफ्टी मैट्रिक्स बताते हैं कि क्या करना चाहिए। देशभर में बढ़ती गर्मी को देखते हुए यह और जरूरी हो जाता है। याद रखिए, रिस्क एक्सपोजर बड़ा वित्तीय जोखिम भी है। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सेफ्टी मैट्रिक्स की समीक्षा उतनी ही गंभीरता से करनी चाहिए, जितनी फाइनेंशियल मैट्रिक्स की होती है। फंडा यह है कि सुरक्षा सिर्फ ऑपरेशनल टॉपिक नहीं, एक रणनीति भी है। इसलिए परिपक्व संगठनों का नारा होना चाहिए कि ‘सुरक्षा बोर्डरूम की चर्चा का विषय है।’ सुरक्षा किसी एक डिपार्टमेंट का अपडेट भर नहीं, बल्कि समूचे शासन की जिम्मेदारी है।

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एन. रघुरामन का कॉलम: परिपक्व संगठन हमेशा पूछते हैं कि ‘क्या हो सकता है’, न कि ‘क्या हुआ’