एन. रघुरामन का कॉलम: दिल छूने वाली कहानियां नहीं सुनाई जातीं तो दिल तोड़ने वाली घटनाएं होती हैं Politics & News

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4 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

स्कूली दिनों में मैं न सिर्फ दयालु शिक्षकों के मार्गदर्शन में बड़ा हुआ, बल्कि बड़े होने पर भी मैंने उनकी दयालुता की कहानियां सुनी हैं। ‘द लेटर्स इन द ड्रॉअर’ ऐसी ही कहानी है। पिता के अंतिम संस्कार के 15 दिन बाद अरुण उनके कमरे में गया, क्योंकि बीते दिनों रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहा था।

कमरे में पुराने कागजों की गंध थी। खिड़की के समीप डेस्क पर स्याही के निशान थे, क्योंकि वहां वर्षों तक उत्तर पुस्तिकाएं जांची गई थीं। एक कोने में पुराने लेसन प्लान थे। दूसरे कोने में अनयूज्ड नोटबुक्स। 40 साल पुराना लैंप बाहर से फीका दिख रहा था, लेकिन उसकी रोशनी तेज थी।

अरुण एक शिक्षक के तौर पर अपने पिता के सुव्यवस्थित करिअर के बारे में सोचने लगा। उसने डेस्क की निचली दराज खोली। इसमें फीके-से लाल धागे से बंधे लिफाफों का बंडल था। जिज्ञासावश उसने धागा खोला और पहला पत्र पढ़ा।

लिखावट थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी, लेकिन दिल से लिखी गई थी- “आदरणीय सर, शायद आपको मैं याद न होऊं। मैं वही लड़का हूं, जो नौवीं में गणित में दो बार फेल हुआ था। मैंने स्कूल छोड़कर चाचा की दुकान पर काम करने का फैसला कर लिया था। लेकिन आप हमारे घर आए और मां से कहा कि एक विफलता पूरे जीवन का निर्धारण नहीं करती। आज मैं इंजीनियर हूं। जब भी निराश होता हूं तो आपकी कही बात याद करता हूं।’

अरुण कुछ पल ठहर-सा गया। फिर उसने पूरी रात हरेक पत्र को खोल कर पढ़ा। दूसरे पत्र में लिखा था कि कैसे उसके पिता कई किलोमीटर पैदल चल कर एक पिता को समझाने गए कि वह अपनी बेटी को आगे पढ़ने दें। तीसरा पत्र इस बारे में था कि कैसे एक परिवार के बुरे दौर में उन्होंने स्कूल फीस चुकाने की पेशकश की। ये सैकड़ों पत्र बता रहे थे कि उनके पिता ने कैसा महान जीवन जिया ​था।

उस दिन अरुण को एक सबक मिला। उसे महसूस हुआ कि असली विरासत धन, पद या सार्वजनिक पहचान से नहीं मापी जाती, जिसके पीछे वह भाग रहा था। सबसे स्थायी असर अकसर उन लोगों का होता है, जो चुपचाप अपना समय, सहानुभूति और भरोसा दूसरों को देते हैं।

यह कहानी याद दिलाती है कि महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य तब पूरा नहीं होता, जब वह हमें दूसरों से ऊपर उठाए। बल्कि तब होता है, जब वह दूसरों के ऊपर उठने की सीढ़ी बन जाए। किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी विरासत संपत्ति या पद नहीं, बल्कि वह विश्वास होता है जो उसने किसी के दिल में पैदा किया हो- यह विश्वास कि उसकी जिंदगी भी मायने रखती है।

मुझे यह कहानी तब याद आई जब मैंने जालंधर भास्कर में नौवीं कक्षा की छात्रा भुविका की दिल तोड़ देने वाली खबर पढ़ी। उसे पीनट बटर बहुत पसंद था। बीते शनिवार जब वह अपनी अंतिम यात्रा पर थी, तो उसकी मां पीनट बटर का डिब्बा लाईं और उसे खिलाते हुए बोलीं, ‘लै धीये खा लै आखिरी वार’।

मां के यह शब्द सुनते ही वहां किसी के आंसू नहीं रुक पाए। पूरा जालंधर शहर यह देख कर रो पड़ा कि मां श्मशान तक पीनट बटर का डिब्बा लेकर गईं, मानो भुविका कभी भी अपनी पसंदीदा चीज मांग सकती है।

इससे पहले, 14 साल की यह बच्ची सीसीटीवी में अकेले चलते दिखी और चंद मिनटों बाद एक हाई-सिक्योरिटी रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स में मृत मिली। इस रहस्यमयी मामले की जांच पुलिस संदिग्ध आत्महत्या मानकर कर रही है, जबकि परिवार इसे हत्या बता रहा है।

कथित तौर पर लड़की के टेनिस कोच को उसके टेनिस किट में एक सुसाइड नोट मिला, जिसमें लिखा था कि ‘मैं साइंस और मैथ्स में फेल हो गई, अच्छी बेटी नहीं बन पाई, गुड बाय।’ दुर्भाग्य से समाज ने एक उभरती लॉन टेनिस खिलाड़ी खो दी, जिसने लगातार दो साल जोनल स्तर पर ब्रॉन्ज मेडल जीता और परिवार ने अपनी लाड़ली बेटी खो दी।

फंडा यह है कि बच्चों को बताइए कि सफल जीवन का पैमाना यह नहीं कि किसी ने कितनी उपलब्धि या अंक हासिल किए। बल्कि यह है कि उसने दुनिया को क्या दिया- जैसे अरुण के पिता ने दिया।

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