शशि थरूर का कॉलम: ‘प्रहार’ से सुरक्षा-व्यवस्था में समन्वय को मजबूती मिलेगी Politics & News

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पिछले महीने गृह मंत्रालय ने देश की पहली आधिकारिक आतंकवाद-रोधी रणनीति जारी की थी। इसे ‘प्रहार’ कहा गया है। यह महत्वपूर्ण दस्तावेज टुकड़ों में बंटी हुई और केवल प्रतिक्रियाएं देने वाली सुरक्षा व्यवस्था को एक संगठित ढांचे में बदलने का दृष्टिकोण दर्शाता है। इसका उद्देश्य भारत की सुरक्षा संस्थाओं को एक साझा प्लेबुक उपलब्ध कराना है। भारत लगभग साढ़े तीन दशकों से आतंकवाद से जूझ रहा है। यह तब शुरू हुआ ​था, जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ अपने मुजाहिदीन अभियानों की सफलता से उत्साहित होकर वही रणनीति भारत के खिलाफ अपनाने का फैसला किया था। जम्मू और कश्मीर में सीमा-पार के विद्रोहों से लेकर वामपंथी उग्रवादियों और अल-कायदा तथा इस्लामिक स्टेट जैसे वैश्विक नेटवर्क तक- आतंकवाद के साथ भारत का अनुभव किसी भी अन्य देश से अधिक विविधतापूर्ण और दीर्घकालिक रहा है। ऐतिहासिक रूप से भारत ने आतंकवाद का सामना स्थानीय सैन्य प्रतिक्रियाओं, यूएपीए जैसे विशेष कानूनी साधनों और विभिन्न एजेंसियों की अलग-अलग प्रक्रियाओं के माध्यम से किया है। आईबी से लेकर राज्य-स्तरीय एंटी-टेररिज्म स्क्वाड्स (इंडिया) तक, संबंधित एजेंसियां अकसर अलग-अलग दायरों में काम करती थीं और जानकारी का आदान-प्रदान प्रायः किसी हमले के बाद ही होता था। इससे ऐसी व्यवस्था बनी, जो एक समन्वित सुरक्षा कवच मुहैया कराने के बजाय जीरो-टॉलरेंस की बयानबाजी तक ही सीमित रहती थी। ‘प्रहार’ का उद्देश्य इस प्रतिक्रियात्मक और बिखरे हुए दृष्टिकोण को बदलकर एक समग्र सिद्धांत स्थापित करना है, जो देश की सुरक्षा व्यवस्था में एकता और समन्वय को मजबूत करे। किसी विदेशी पर्यवेक्षक को यह केवल नौकरशाही का एक साधारण पुनर्गठन लग सकता है। लेकिन जिस देश ने 1993 के मुम्बई धमाके, 2001 में संसद पर हमला और 2008 में 2611 जैसी त्रासदियां झेली हैं, उसमें यह इस बात की देरी से की गई स्वीकारोक्ति है कि खतरा राज्य की सुरक्षा रणनीतियों से कहीं तेजी से विकसित हुआ है। ‘प्रहार’ क्राइसिस-रिस्पॉन्स मॉडल की जगह प्रिवेंशन-फर्स्ट के मॉडल पर काम करता है, यानी संकट की स्थिति में प्रतिक्रिया देने के बजाय इस पर जोर देना कि वैसी नौबत ही न आए। इसमें खुफिया-सूचना आधारित कार्रवाई पर बल दिया गया है और मल्टी एजेंसी सेंटर (मैक) को रियल-टाइम डेटा-एकीकरण प्रणाली के केंद्र में रखा गया है। जॉइंट टास्क फोर्स ऑन इंटेलिजेंस के साथ मैक की भूमिका को केंद्रीकृत करके इस रणनीति का उद्देश्य अलग-अलग इकाइयों में काम करने की प्रवृत्ति को समाप्त करना और यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां एक समन्वित कमान के तहत कार्य करें। ‘प्रहार’ आधुनिक खतरों- जैसे ड्रोन-आधारित घुसपैठों और संचार एन्क्रिप्शन को भी स्पष्ट रूप से संबोधित करता है और संगठित अपराध व आतंकवादी नेटवर्क के गठजोड़ को पहचानता है। साथ ही यह जांच की हर अवस्था- प्रारम्भिक रिपोर्ट से लेकर अंतिम अभियोजन तक में विधि-विशेषज्ञों को शामिल करने की व्यवस्था करता है, ताकि कानून का राज केवल एक नारा न रह जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करने का साधन बने कि प्रक्रियागत त्रुटियों के चलते हाई-प्रोफाइल संदिग्ध लोग जवाबदेही से बच न सकें। यह दृष्टिकोण समस्या के मूल कारणों को भी संबोधित करता है। मानवाधिकारों पर दिया गया जोर इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कठोर और दमनात्मक उपाय कभी-कभी आतंकवाद को उलटे बढ़ावा दे सकते हैं। इसके अलावा यह दस्तावेज डिजिटल कट्टरपंथीकरण के बढ़ते खतरे पर भी ध्यान देता है- खासकर तब, जब वह डार्क वेब, क्रिप्टोकरेंसी वालेट्स और ड्रोन जैसी तकनीकों के साथ मिलकर काम करता है। बहरहाल, ‘प्रहार’ की सफलता के लिए 30 राज्य पुलिस बलों का सहयोग भी जरूरी है, जिनमें से कई संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, तकनीकी रूप से पीछे हैं और स्थानीय राजनीति के प्रभाव में रहते हैं। इन राज्यों में आतंक-रोधी तंत्र को मानकीकृत करने के लिए प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की आवश्यकता पड़ेगी। अतीत में भारत की सुरक्षा रणनीतियां गोपनीय दस्तावेजों में दबा दी जाती थीं। लेकिन केंद्र सरकार ने ‘प्रहार’ दस्तावेज को खुले तौर पर साझा करके नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय- दोनों को अपनी प्रतिबद्धता का संकेत दिया है।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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शशि थरूर का कॉलम: ‘प्रहार’ से सुरक्षा-व्यवस्था में समन्वय को मजबूती मिलेगी