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- Rashmi Bansal’s Column A Little Worry Is Good, But What Is The Use Of Worrying Too Much?
1 घंटे पहले
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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर
रोज ऑफिस से निकलने के पहले आप मम्मी को मैसेज करती हो- निकल गई। एक दिन रिक्शे में बैठने के बाद पता चलता है कि फोन ऑफ हो गया है। कोई बात नहीं, मम्मी समझ जाएंगी। लेकिन आप घर में घुसे, तब जाकर मम्मी ने चैन की सांस ली। फोन ऑन किया तो देखा- 12 मिस्ड कॉल। अरे, चिंता तो होती है, न!-
मम्मी ने कहा, जैसे कि उनकी चिंता प्रकृति की देन हो। जैसे हम सांस लेते हैं, उसी तरह इस देश में हम 24 घंटे किसी न किसी चिंता में डूबे रहते हैं। बच्चों के एग्जाम- चिंता। घर पर मेहमान- चिंता। कामवाली आज लेट- चिंता।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि लव लैंग्वेज यानी कि प्यार जताने के पांच तरीके होते हैं। उन्हें क्या पता हमारे पास एक और तरीका है- चिंता। वैसे शायरों ने भी भले सीधे तरीके से इसका जिक्र नहीं किया हो, लेकिन उनके गाने अगर आप ध्यान से सुनें तो समझ जाएंगे- आंखों ही आंखों में इशारा हो गया, बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया। मतलब?
मतलब ये कि बीस साल बाद कोई होगा पूछने वाला- तुमने खाना खाया? दवाई ली? बिजली का बिल भरा? वैसे अंग्रेजी में इसे कहते हैं ‘नैगिंग’ और कई बार आप चिढ़ के जवाब भी दोगे- बस करो। लेकिन अगर कल ये सवाल बंद हो जाएं तो आपको बुरा भी लगेगा। कि किसी को मेरी पड़ी नहीं है, कोई पूछ नहीं रहा।
आज ज्यादातर शादियां इसी पूछ-ताछ के सहारे चल रही हैं। चाहे कोई ‘आई लव यू’ न कह रहा हो, कम से कम इस विशाल दुनिया में मेरे ब्लड प्रेशर की किसी को तो फिक्र है। वैसे कभी-कभी हंसी भी आती है।
प्लेन में जैसे ही अनाउन्स होता है- ‘आप मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हो’- आस-पास चार फोन बजेंगे। सवाल है- ‘पहुंच गए’? अब फोन बजा है, उठाया है, मतलब पहुंच ही गए होंगे। भगवान न करे, कोई हादसा हो जाए, तो सवाल-जवाब का मौका ही नहीं मिलेगा… अब यहां तक की चिंता तो चलो, एक तरह से ठीक है।
मगर मैंने ऑब्जर्व किया है कि हम में से कई लोगों ने अपनी चिंता का दायरा बहुत बढ़ा दिया है। दुबई में बम- चिंता। स्टॉक मार्केट डाउन- चिंता। पॉलिटिक्स में घोटाला- चिंता। इन टॉपिक्स पर चिंता से दुनिया को फर्क ही नहीं पड़ता, लेकिन असर होता है आप पर।
सुना होगा आपने ‘हॉन्टेड हाउस’ के बारे में। जैसे बंगले पर कब्जा करके भूत बेमतलब घूमता है, उसी तरह चिंता। यह एक भूत है, जिसने एक बार आपके दिमाग पर कब्जा कर लिया, तो फिर वो आपको डराता रहेगा। कोई भी सिचुएशन हो, आपको उसमें कुछ नेगेटिव ही दिखाई देगा।
मैं यह नहीं कह रही कि आप आंखें मूंद कर बैठिए। दुनिया में जो हो रहा है। उससे वाकिफ होना जरूरी है। लेकिन चिंता के बजाय चिंतन कीजिए। दोनों के बीच बस एक फर्क है- चिंतन करने वाला इंसान डरता नहीं। हालात आपके कंट्रोल में नहीं हैं, लेकिन हालात के प्रति आपका रिस्पॉन्स क्या होगा, यह आपके हाथ में है।
आजकल एग्जाम के पहले कुछ बच्चे बीमार पड़ जाते हैं, उल्टियां आने लगती हैं। डॉक्टर मानते हैं इसकी वजह है एंग्जायटी यानी कि घबराहट- जो है चिंता का बड़ा भाई। अजीब बात यह है कि ज्यादातर वो बच्चे घबराते हैं जिन्होंने पढ़ाई करी है, अच्छी तरह से। उनका डर यह है कि नंबर थोड़े कम आए तो क्या होगा?
उन्होंने अपने मन में एक लंबी कहानी लिख डाली है कि मेरा एडमिशन सही जगह नहीं होगा, मेरी लाइफ बर्बाद हो जाएगी। भाई, जीवन में सुख और सफलता पाने के एक नहीं, अनेक रास्ते हैं। लेकिन घबराए हुए इंसान को उन रास्तों पर चलने की हिम्मत न होगी। इसलिए पैरेंट्स को मेरी सलाह है, बच्चों को निडरता से जीना सिखाइए।
थोड़ी-बहुत चिंता ठीक है, लेकिन अगर वे आपको हर वक्त चिंतित देखेंगे, तो वे भी उस भूत को अपने मन में बसा लेंगे। जो ज्यादा चिंता करता है, कुछ भी करने से डरता है। सोच ही सोच में फंस जाता है, सुख में भी दु:ख ही पाता है। जो होना है सो होकर रहेगा, आपकी चिंता से कुछ न बदलेगा। चिंता से चिंतन का सफर तय कीजिए, जीवन अपना आनंदमय कीजिए।
- हम में से कई लोगों ने अपनी चिंता का दायरा बहुत बढ़ा दिया है। दुबई में बम- चिंता। स्टॉक मार्केट डाउन- चिंता। पॉलिटिक्स में घोटाला- चिंता। इन सब पर चिंता से दुनिया को फर्क ही नहीं पड़ता, लेकिन असर होता है आप पर।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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रश्मि बंसल का कॉलम: थोड़ी-बहुत फिक्र भली, पर ज्यादा चिंता किस काम की?


