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पिछले दिनों दो बड़े धमाके हुए। एक ईरान में। दूसरा नीतीश कुमार को लेकर!
नीतीश कुमार को सरेंडर करना पड़ा। ईरान अब भी मान नहीं रहा है- अपने सुप्रीम लीडर की मौत के बावजूद। दरअसल, क्षेत्रीय ताकतें जल्दी हार नहीं मानतीं। चाहे वो देश के स्तर पर हों या राजनीतिक स्तर पर। नीतीश कुमार की मजबूरी क्या रही होगी, ये तो कोई नहीं जानता। ईरान की कोई मजबूरी नहीं है। फिलहाल तो नहीं ही है। तेल की ताकत उसके पास है, इसलिए उसकी ताकत वैसी ही दुगनी है, जैसा कि वरदान बाली को मिला था। बाली के सामने आकर जो भी लड़ता था, उसकी आधी ताकत बाली में आ जाती थी। तेल दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है और तबाही के हजारों सबूत अमेरिका देता रहे, फिर भी ईरान के पास तेल की अब भी कोई कमी नहीं है। वैसे भी ईरान लड़कर शहीद होने में ज्यादा भरोसा रखता है, बजाय हार मानने के। जैसा इराक वाले सद्दाम हुसैन ने किया था। ये बात और है कि बिना किसी ठोस कारण के लड़ाई शुरू कर देने के बाद अमेरिका एक तरह से फंस गया है और किसी तरह युद्ध के इस मैदान से निकलने के रास्ते तलाश रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प कभी कहते हैं कि युद्ध जल्द खत्म होने वाला है, तो कभी कहते हैं रशिया वाले पुतिन साहब बातचीत के जरिए समझौता कराने के इच्छुक हैं। निश्चित तौर पर आप हर तरह से बलशाली हैं और हिम्मती भी। …तो लड़िए। लड़ते रहिए। किसने रोका है आपको? और कौन रोक सकता है? बीच युद्ध में बगलें क्यों झांक रहे हैं? आप कितने ही ताकतवर होंगे, लेकिन बांह चढ़ाकर वक्त को तो नहीं ही रोक सकते। आपके औजार खर्च होते जा रहे हैं, ये सही है लेकिन अब लगता है- औजारों से कहीं ज्यादा आप खुद खर्च हो चुके हैं। दुनियाभर में तेल और गैस का संकट खड़ा करके आपने क्या पाया? हमारे यहां रेस्तरां वाले अभी से चिल्लाने लगे हैं। कमर्शियल गैस पर संकट के चलते कह रहे हैं कि भले पैसा ज्यादा ले लो लेकिन गैस तो दो! कोई सुनने वाला नहीं है। संकट ही ऐसा है। सबसे पहले घरेलू उपभोक्ताओं का हित ही देखा जाएगा, जो कि देखा जा रहा है। अब आते हैं नीतीश कुमार पर। लालू यादव और उनके राजद पर वर्षों परिवारवाद का आरोप लगाते रहे नीतीश कुमार ने अपने बेटे को राजनीति में लाने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की बात मानी या कोई और मजबूरी रही होगी, ये उनके सिवाय कोई नहीं जानता। उनके बाद मुख्यमंत्री कौन होगा, इस बारे में अब कई कयास लगाए जा रहे हैं। वैसे केंद्र में जब से भाजपा का शासन आया है या कह सकते हैं कि जब से राजनीति में मोदी युग आया है, किसी नियुक्ति के बारे में कभी कोई कयास सटीक नहीं बैठा। हर बार कोई नया और हतप्रभ करने वाला ही नाम सामने आता है। मध्यप्रदेश के मोहन हों, राजस्थान के भजन हों या बिहार वाले नवीन हों। किसने सोचा था? …और ये भी आखिर किसने सोचा था कि मुख्यमंत्री पद के लिए कई बार इधर से उधर जाते रहे नीतीश कुमार अचानक राज्यसभा जाने के लिए तैयार हो जाएंगे? जबकि इस बार के चुनाव में नीतीश के दल की सीटें अप्रत्याशित तौर पर बढ़ी थीं। पिछली बार से लगभग दोगुनी। खैर राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है, यह बात हर कोई जानता है। कभी चौधरी चरण सिंह को अपना राम बताकर खुद को उनका हनुमान कहने वाले राज नारायण ही एक समय उन्हीं चरण सिंह को चेयर सिंह कहकर चिढ़ाने लगते हैं। चंद्रशेखर की मददगार बनकर केंद्र में उनकी सरकार बनवाने वाली कांग्रेस ही राजीव गांधी के घर के सामने हरियाणा के दो सिपाही देखकर समर्थन वापस ले लेती है। इसीलिए कहा जाता है कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। आखिर राजनीति है। इसमें किसी तरह की नैतिकता की गुंजाइश नहीं होती। हो सकता है पहले कभी रही हो, कम से कम अब तो नहीं रही। अब देखना यह है कि नीतीश कुमार को आने वाले विस्तार में केंद्र में कोई मंत्री पद मिलेगा या उनके बेटे को विधान परिषद के रास्ते राज्य में कोई मंत्रालय दिया जाएगा! इन दो संभावनाओं में से किसी एक पर तो मुहर लगेगी ही लगेगी, यह तय माना जा रहा है। नीतीश भी राजनीति के इतने कच्चे खिलाड़ी तो नहीं हैं कि कुछ लिए बिना ही आसानी से मान जाएं और यूं ही सस्ते में मुख्यमंत्री का पद छोड़कर राज्यसभा की राह पकड़ लें! नीतीश के बाद अब कौन?
लालू यादव पर वर्षों परिवारवाद का आरोप लगाते रहे नीतीश ने अपने बेटे को राजनीति में लाने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की बात मानी या कोई और मजबूरी रही होगी, ये उनके सिवाय कोई नहीं जानता। उनके बाद मुख्यमंत्री कौन होगा, इस बारे में कई कयास हैं।
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नवनीत गुर्जर का कॉलम: अमेरिका फंस गया है और किसी तरह युद्ध के मैदान से निकलने के रास्ते तलाश रहा है

