[ad_1]
ट्रम्प के निर्णयों से दुनिया को चाहे जो नुकसान हुआ हो, एक फायदा यह हुआ है कि उनसे हमें आधुनिक जीवन की एक खतरनाक कमी को समझने में मदद मिली है। यह है ऊर्जा के उपयोग पर हमारी अत्यधिक निर्भरता, जो आज हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था सभी को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। ईरान, यूक्रेन और पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्षों के बीच दुनिया फिर से ऊर्जा संकट की चर्चा कर रही है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, आपूर्ति घटाने की घोषणाएं हो रही हैं, कई देशों में ईंधन को लेकर चिंता दिखाई देने लगी है। भारत में भी एलपीजी की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव की खबरें सामने आने लगी हैं। हर बार जब ऐसा होता है, हमें याद आता है कि आधुनिक दुनिया कितनी गहराई से ऊर्जा पर निर्भर हो चुकी है। आज मानव जीवन का लगभग हर कार्य ऊर्जा से संचालित होता है। सुबह उठकर दांत साफ करने से लेकर मोबाइल पर संदेश भेजने तक, खाना पकाने से लेकर यात्रा करने तक- हर गतिविधि के पीछे कहीं न कहीं ऊर्जा का उपयोग छिपा हुआ है, फिर भले वो हमें नजर आए या न आए। आधुनिक अर्थव्यवस्था, उद्योग, परिवहन और संचार- सब ऊर्जा पर आधारित हैं। बिना ऊर्जा के जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है। समस्या यह है कि आज भी दुनिया की अधिकांश ऊर्जा कार्बन आधारित स्रोतों से आती है- जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस। यह ऊर्जा पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं है। कुछ देशों के पास इन संसाधनों का भंडार है, जबकि अधिकांश को अपनी जरूरतों के लिए इनका आयात करना पड़ता है। यही असमान वितरण वैश्विक निर्भरता और असुरक्षा की जड़ है। जब कोई देश ऊर्जा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होता है, तो ऊर्जा केवल आर्थिक संसाधन नहीं रहती, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक हथियार भी बन जाती है। तेल और गैस की आपूर्ति में बदलाव पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, और कर रहा है। कई बार ऊर्जा आपूर्ति पर नियंत्रण देशों के बीच तनाव, संघर्ष और युद्ध की स्थितियां भी पैदा कर देता है। कार्बन आधारित ऊर्जा पर यह निर्भरता केवल राजनीतिक असुरक्षा ही नहीं पैदा करती, बल्कि पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है। कोयला, तेल और गैस का उपयोग बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषकों को हमारी पृथ्वी के वातावरण में छोड़ता है। यही कार्बन उत्सर्जन फिर वैश्विक तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण बन रहा है। बढ़ती गर्मी, असामान्य वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं इसी का परिणाम हैं। इस तरह कार्बन ऊर्जा हमें दोहरी समस्या में डालती है- एक ओर तो यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है, दूसरी ओर यह देशों के बीच निर्भरता और अस्थिरता को बढ़ाती है। दुनिया जितनी कार्बन ऊर्जा पर निर्भर होती चली जाती है, उतनी ही अधिक वह असुरक्षित और वल्नरेबल (कमजोर) बनती जाती है। इसी संदर्भ में ऊर्जा स्वराज की अवधारणा महत्वपूर्ण है। ऊर्जा स्वराज का अर्थ है- ऊर्जा के मामले में स्वयं का राज, ऊर्जा में आत्मनिर्भरता। इसका मतलब यह नहीं कि हम पूरी तरह से बाहरी ऊर्जा स्रोतों से कट जाएं, बल्कि यह कि हम जितना संभव हो सके, अपनी ऊर्जा स्थानीय स्तर पर उत्पन्न करें और उसका विवेकपूर्ण उपयोग करें। कहते हैं ना- हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। जब कोई समाज और देश अपनी ऊर्जा का उत्पादन स्थानीय स्तर पर करने लगता है, जब वह ऊर्जा के दुरुपयोग को रोकता है, वह ऊर्जा की बहुमूल्यता को समझता है, तो उसकी बाहरी निर्भरता घटती है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान कम होता है, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता भी बढ़ती है। मेरी ऊर्जा स्वराज यात्रा, जो 2020 में शुरू हुई, इसी विचार पर आधारित है। इस यात्रा का उद्देश्य लोगों तक यह संदेश पहुंचाना है कि हमें केवल नई ऊर्जा तकनीकों की ओर ही नहीं जाना है, बल्कि ऊर्जा के प्रति अपने व्यवहार और सोच को भी बदलना है। आज जब दुनिया बार-बार ऊर्जा संकट और संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना आवश्यक है कि समाधान केवल अधिक ऊर्जा खोजने में नहीं, बल्कि सही ऊर्जा चुनने और उसका विवेकपूर्ण उपयोग करने में है। यदि हम ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनते हैं, तो हम न केवल जलवायु संकट को कम कर सकते हैं, बल्कि दुनिया को अधिक स्थिर और सुरक्षित भी बना सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
[ad_2]
प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम: एनर्जी के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता में है कई समस्याओं की जड़

