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फरीदाबाद: फतेहपुर बिल्लौच फरीदाबाद का एक गांव अपने अंदर इतिहास की लंबी परतें समेटे बैठा है. यहां के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं ये गांव हजारों साल पुराना है. समय के साथ इसने कई रंग देखे मुस्लिम हुकूमत देश का बंटवारा फिर हरियाणा राज्य बना और उसके बाद का विकास. आज इस गांव की खास पहचान है खेत-खलिहान, खासकर फूलों की खेती आपसी मेलजोल और पुराने किस्से-कहानियां.
Local18 से बात करते हुए गांव के सरकारी स्कूल के रिटायर्ड टीचर दलेर सिंह ने कई दिलचस्प बातें साझा कीं. दलेर सिंह का जन्म भी इसी गांव में 4 मई 1944 को हुआ था. उन्होंने गांव को बदलते देखा है जमाने के साथ.
कैसे पड़ा नाम
दलेर सिंह बताते हैं जब यहां मुसलमानों का राज था तब गांव में बिल्लौच जाति के मुसलमान ज्यादा थे. इसी वजह से गांव का नाम फतेहपुर बिल्लौच पड़ा. उस समय नंबरदार लोग ही लगान वसूलते थे. फिर 1947 में बंटवारे के बाद, कई बड़े जमींदार पाकिस्तान चले गए. पंजाब और सिंध से आए लोगों ने यहां बसना शुरू किया. बंटवारे के बाद गांव का पूरा प्रशासनिक ढांचा बदला राजस्व विभाग की नई व्यवस्था बनी.
साल 1952 में पहली पंचायत बनी और दलेर सिंह के पिता पहले मेंबर बने. दलेर सिंह कहते हैं गांव इतना पुराना है कि इसका इतिहास हजारों साल पीछे जाता है.
गांव में हैं कई सुविधाएं
आज फतेहपुर बिल्लौच काफी बदल चुका है. लड़कों-लड़कियों के लिए अलग-अलग गवर्नमेंट स्कूल हैं, बारहवीं तक पढ़ाई होती है. नया अस्पताल बन रहा है जल्दी ही तैयार हो जाएगा. गांव में आईटीआई, खेल स्टेडियम सब मौजूद है. 2003 के बाद जब नई पंचायत आई तब ये नए निर्माण हुए. अब गांव में 10 हजार से ज्यादा वोटर हैं और आबादी करीब 20 हजार के आस-पास है.
दलेर सिंह के मुताबिक आबादी तो बढ़ ही रही है. अब ऐसे लोग भी बसने लगे हैं जो मजदूरी या छोटे-मोटे काम करते हैं. गांव की सबसे अच्छी बात है यहां जात-पात का कोई झगड़ा नहीं. सब मिल-जुलकर रहते हैं.
1957 में गांव में बिजली आई
खेती की बात करें तो पहले यहां धान की खेती नहीं होती थी. सिंचाई के साधन कम थे तो धान उगाना मुश्किल था. 1957 में गांव में बिजली आई उस समय बाबू साह प्रसाद सरपंच थे. बिजली आते ही गांव की रफ्तार बदल गई. अब करीब 11-12 ट्यूबवेल हैं पर पहले खेती के तरीके अलग थे. गन्ने की खेती ज्यादा होती थी एक बार बो दिया तो तीन साल तक चलता था.
अब फतेहपुर बिल्लौच फूलों की खेती के लिए भी जाना जाता है. दलेर सिंह बताते हैं करीब 30 साल पहले फूलों की खेती शुरू हुई थी. पहले कई तरह के फूल उगते थे अब ज्यादातर रजनीगंधा और सनफ्लावर. इनमें भी रजनीगंधा सबसे ज्यादा.
एक समय यहां एक ऐतिहासिक पार्क भी था जो अब उजड़ चुका है. दलेर सिंह याद करते हैं जब हरियाणा बना भी नहीं था तब पंजाब के समय यहां कम्युनिटी प्रोजेक्ट के तहत कई विकास काम हुए थे.
गांव, धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर भी समृद्ध
गांव धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर भी समृद्ध रहा है. यहां कभी पांच पुराने मंदिर थे एक मस्जिद भी है. लोग हमेशा भाईचारे से रहते आए हैं. कभी कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ. होली की बात हो तो यहां त्योहार की रौनक अलग ही थी. आसपास के गांवों से ज्यादा धूमधाम से होली मनती थी. लोग दूर-दूर से यहां की होली देखने आते थे.
दलेर सिंह ने एक और रोचक बात बताई ईरान की बेगम सुरैया भी कभी गांव आई थीं. ऐतिहासिक पार्क में उनके स्वागत का इंतजाम हुआ था. उस जमाने में विदेशों से भी लोग गांव देखने आते थे.
पहले गांव में दो बड़े बाजार भी थे एक आम बाजार, जहां रोजमर्रा की चीजें मिलती थीं और दूसरा चमड़े का बाजार जो अब बंद हो चुका है. खास तौर पर यहां बनी जूतियां दूर-दूर तक जाती थीं. समय के साथ और भी चीजें मशहूर हुईं पूरा और बताशा. इनकी इतनी मांग थी कि दुकानदार साइकिल पर 20-20 किलोमीटर दूर तक बेचने जाते थे.
पुराने समय में गांव में मूक फिल्में भी दिखाई जाती थीं
एक और मजेदार बात कभी फतेहपुर बिल्लौच को बंगालियों का गांव भी कहते थे. गांव के लोग खुद तरह-तरह के टोटके जानते थे तो बाहर वाले अपनी कला नहीं चला पाते थे. पुराने समय में गांव में मूक फिल्में भी दिखाई जाती थीं. तब फिल्मों में आवाज नहीं होती थी इसलिए इन्हें मूक फिल्म कहते थे. 1952 में पंचायत बनने के बाद ऐसे कार्यक्रम खूब होते थे जो लोगों का बड़ा मनोरंजन थे.
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