एन. रघुरामन का कॉलम: स्मॉल टॉक, बड़े परिणाम देती है Politics & News

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अजनबियों से बातचीत कभी हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा होती थी, लेकिन टेक्नोलॉजी ने इसे खत्म कर दिया है। अच्छा लगे या नहीं, लेकिन सच यही है। किसी भी सार्वजनिक जगह पर जाइए, हम एक-दूसरे का अभिवादन करने के बजाय आपस में भिड़ते रहते हैं और फिर झगड़े के डर से तुरंत ‘सॉरी’ कह देते हैं, वह भी बिना आंख मिलाए। पिछले हफ्ते मैं भी ऐसी ही स्थिति में फंसा, जब सभी फ्लाइट्स बहुत देरी से चल रही थीं और एयरपोर्ट लाउंज ऐसे लोगों से भरा था, जो खाना खत्म होने से पहले अपना लंच लेना चाहते थे। मेरी नजर 2 बाय 2 की एक टेबल पर पड़ी। उस पर एक व्यक्ति पहले से लंच ले रहा था और टेबल पर इतनी ही जगह बची थी कि कोई अपना गिलास तो रख सके, प्लेट नहीं। अगर दोनों लोग साथ में भोजन करना चाहे तों उन्हें प्लेटें किनारों पर रखनी पड़ेंगी। अगर पहले के पास पानी का गिलास, दही और मिठाई का कप भी हो तो दूसरा अनजान व्यक्ति उसी टेबल पर बैठने की हिम्मत नहीं करेगा, क्योंकि उसे पता है कि पहला व्यक्ति बुरा-सा मुंह बना कर मानो कहेगा कि ‘यहां जगह कहां है?’ तभी मैंने देखा कि ऐसी ही एक टेबल के सामने एक कुर्सी खाली थी। मेरी आंखों ने वहां बैठे व्यक्ति को स्कैन किया और मेरे अनुभवी दिमाग ने उस तस्वीर को देखकर कहा कि वो ‘तमिलियन’ हैं, जाओ उनसे तमिल में बात करो। शायद मेरा दिमाग उनके माथे पर लगी ‘विभूति’ को देखकर ऐसा समझा होगा। बिना किसी अन्य भाषा की मिलावट के मैंने शुद्ध ​तमिल में बोलना शुरू किया। आंखों में प्रसन्नता लिए उन्होंने अपनी प्लेट खिसका ली, क्योंकि उन्हें टेबल शेयर करने के लिए एक और शाकाहारी मिल गया था। उसी क्षण से नवी मुंबई के नेरुल स्थित भगवान मुरुगन (भगवान गणेश के भाई) मंदिर के सेक्रेटरी के. गणेशन मेरे मित्र बन गए। चूंकि उनका जुड़ाव मंदिर में आने वाले सैकड़ों भक्तों से है, इसलिए कोई काम करवाने की उनकी नेटवर्किंग क्षमता मेरे जैसे कम्प्यूटर पर स्टोरी लिखने वाले लोगों से कहीं तेज और असरदार है। मुझे यह घटना तब याद आई, जब मैं जल्द रिलीज होने वाली एक किताब का रिव्यू पढ़ रहा था। इसका शीर्षक है ‘वंस अपॉन अ स्ट्रेंजर : द साइंस ऑफ हाउ ‘स्मॉल’ टॉक कैन एड अप टु अ बिग लाइफ’। इसे यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स में साइकोलॉजी की एसोसिएट प्रोफेसर और ससेक्स सेंटर फॉर रिसर्च ऑन काइंडनेस की डायरेक्टर डॉ. गिलियन सैंडस्ट्रोम ने लिखा है। छोटे सोशल इंटरेक्शन और वेल-बीइंग में उनका स्पेशलाइजेशन है। सैंडस्ट्रोम की रिसर्च कहती है कि किसी कॉफी शॉप में बरिस्ता के साथ महज 10 सेकंड की छोटी-सी बातचीत भी हमारी समुदायिक भावना मजबूत कर सकती है और सकारात्मकता बढ़ा सकती है। उनकी रिसर्च का निचोड़ है कि छोटी बातचीतों का महत्व बड़ा है और आज हमें इसकी सर्वाधिक जरूरत है। याद करिए कि हम कितना पहले ही न सिर्फ समय और रास्ता पूछना छोड़ चुके, बल्कि मुस्कराते हुए एक-दूसरे को विश करना भी हमने बंद कर दिया है। ऐसा इसलिए नहीं कि हम सामने वाले का सम्मान नहीं करते, बल्कि इसलिए कि हमारी नजरें लगातार फोन पर रहती हैं। किसी प्लेन, ट्रेन, शादी या किसी सोशल गैदरिंग में अपने प्रियजनों से मिलना अब बीती बात हो गई है। सैंडस्ट्रोम की रिसर्च यह भी बताती है कि बुजुर्गों में उन 20 साल के युवाओं की तुलना में कम एंग्जायटी होती है, जो अकसर सोचते हैं कि ‘किसी अजनबी से बात क्या करें?’ अचम्भे की बात नहीं कि उनकी रिसर्च बताती है कि अजनबियों या परिचितों से छोटी, सतही बातचीत भी गहरे और लंबे सामाजिक रिश्ते बना सकती है। 9 अप्रैल 2026 को रिलीज होने वाली यह किताब कहती है कि ऐसी छोटी बातचीतें हमारी खुशी बढ़ाती हैं, अकेलापन घटाती हैं और ओवरऑल मेंटल हेल्थ बेहतर करती हैं। यह उस धारणा को गलत साबित करती है कि छोटी बातचीतें बेकार या समय की बर्बादी होती हैं। फंडा यह है कि हफ्ते में एक बार अपना फोन घर पर छोड़ कर किसी मॉल, पार्क या सोशल प्लेस पर जाइए और किसी से छोटी-सी बातचीत कीजिए। कौन जाने, यही किसी समस्या को हल करके आपके जीवन में बड़ा बदलाव ले आए।

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एन. रघुरामन का कॉलम: स्मॉल टॉक, बड़े परिणाम देती है